पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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होगा इस कारण बिना धुलोंसे यह धुले बदलती है" यह सुनकर उसने वह
तिल त्याग दिये । इससे मै कहताहूं-
"नाकस्माच्छाण्डिली मातः विक्रीणाति तिलैस्तिलान् ।
लुञ्चितानितरैर्यैन हेतुरत्र भविष्यति ॥ ८७ ॥"
"हे मातः अकस्मात् ही यह शाण्डिली धुले तिलोंसे काले तिल नहीं ग्रहण
करती है इसमें कोई कारण होगा ॥ ८७ ॥”
एतदुक्त्वा स भूयोऽपि प्राह, - "अथ ज्ञायते तस्य क्रमण-
मार्गः" । ताम्रचूड आह, - "भगवन् ! ज्ञायते यत एकाकी न
समागच्छति। किन्तु असंख्ययूथपरिवृतः पश्यतो मे परिभ्रमन्
इतस्ततः सर्वजनेन सह आगच्छति याति च । अभ्यागत
आह, - "अस्ति किंचित् खनित्रकम् ?" स आह- "बाढमस्ति,
एषा सर्वलोहमयी स्वहस्तिका" । अभ्यागत आह, - "तर्हि
प्रत्यूषे त्वया मयासह स्थातव्यं येन द्वौ अपि जनचरणमलि-
नायां भूमौ तत्पदानुसारेण गच्छावः" । मया अपि तद्वचन-
माकर्ण्य चिन्तितम् । "अहो ! विनष्टोऽस्मि यतोऽस्य साभिप्रा-
यवचांसि श्रूयन्ते । नूनं यथा निधानं ज्ञातं तथा दुर्गमपि
अस्माकं ज्ञास्यति एतदभिप्रायादेव ज्ञायते । उक्तंच-
यह कह कर फिर वह बोला, - "उसके निकलनेका मार्ग जाना जाय" ।
ताम्रचूड बोला, - "भगवन् ! जाना जाता है कि वह इकल्ला नहीं आता है ।
किन्तु असंख्य यूथसे युक्त देखते हुए मेरे घूमता हुआ इधर उधर सब जनोंके साथ
आता जाता है"। अभ्यागत बोला, - "है कोई खोदनेका कुदाल ?" वह बोला, - "हां
है । यह सब लोहमयी खनित्र" । अभ्यागत बोला, - "तो सबेरे तुझे मेरे साथ
रहना चाहिये दोनोंही उसके जनचरणसे मलीन हुई भूमिमें उनके पदके अनुसरण
करचलें" । मैंनेभी उसके वचन सुनकर विचार किया । "अहो नष्ट हुआ कारण
कि इसके वचन अभिप्राय युक्त सुने जाते हैं । निश्चयही जैसे धन जान लिया
इसी प्रकार हमारे दुर्गकोभी जानेलेगा यह इसके अभिप्रायसे विदित होता
है । कहा है-