पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( १७९ )
समाहत हुआ किसी प्रकार शान्त न हुआ । तब कोई बानर अग्निकणकी समान
चोंटलियोंको इकट्ठाकर अग्निकी इच्छासे फूक मारते हुए चारों ओरसे स्थित
हुए । तब सूचीमुख नाम पक्षी उनके उस वृथा परिश्रमको देखकर बोला-
“भोः ! तुम सब मूर्ख हो । यह अग्निकण नहीं हैं, यह चोंटलीहैं क्यों वृथा
परिश्रम करतेहो । इससे शीत रक्षा न होगी, सो ढूढ़ो कोई पवनरहित वन-
स्थान गुहा वा पर्वतकदरं अबभी मडल बाधे हुए मेघ दीखते हैं” । तब उन-
मेसे एक बूढा बानर उससे बोला-“भो मूर्ख ! तुझे इससे क्या प्रयोजन है
चलाजा । कहाहै-
मुहुर्विघ्नितकर्माणं द्यूतकारं पराजितम् ।
नालापयेद्विवेको यदिच्छेत्सिद्धिमात्मनः ॥ ४१८ ॥
बारबार कर्ममें विघ्न पानेवाला, जुआ खेलनेवाला, पराजित इनसे यदि अपने
मगलकी इच्छा हो तो वार्ता न करे ॥ ४१८ ॥
तथाच-
तैसेही-
आखेटकं वृथा क्लेशं मूर्ख व्यसनसंस्थितम् ।
आलापयति यो मूढः स गच्छति पराभवम् ॥ ४१९ ॥”
शिकारी, वृथा क्लेशकारी, मूर्ख, दुर्व्यसनमें स्थितसे जो वार्ता करता है वह
पराभवको प्राप्त होता है ॥ ४१९ ॥”
सोऽपि तमनादृत्य भूयोऽपि वानराननवरतमाह-
“भोः ! किं वृथा क्लेशेन” अथ यावद्सौ न कथंचित्
प्रलपन्विरमति तावदेकेन वानरेण व्यर्थश्रमत्वात्
कुपितेन पक्षाभ्यां गृहीत्वा शिलायामास्फालित उपर-
तश्चातोऽहं ब्रवीमि, “नानाम्यं नमते दारु” इत्यादि।
वह भी उसको अनादर कर बारबार बानरोसे वही वचन कहने लगा-
“भो ! वृथाक्लेशसे क्या है”। सो जब यह किसी प्रकार प्रलापसे न शान्त
हुआ तब एक वृथा श्रमसे क्रुद्ध हुए बानरने उसके पख पकड कर शिलापर पट-
ककर मार दिया, इससे मैं कहता हूँ “अनमित काष्ठ नहीं नमता इत्यादि” ।