पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( १७ )'
वचन वहां कहना चाहिये, जहां कुछ कहनेका फल हो जैसे कि, सफेद
वस्त्रपर रंग अत्यन्त स्थायी होता है ॥ ३४ ॥"
दमनक आह-"मा मा एवं वद ।
दमनक बोला-"ऐसे मत कहो ।
अप्रधानः प्रधानः स्यात्सेवते यदि पार्थिवम् ।
प्रधानोऽप्यप्रधानः स्याद्यदि सेवाविवर्जितः ॥ ३५ ॥
यदि राजाको सेवनकरे तो अप्रधानभी प्रधान होजाता है और सेवासे
वर्जित हो तो प्रधानभी अप्रधान होजाता है ॥ ३५ ॥
यत उक्तञ्च-
कारण कहाभी है-
आसन्नमेव नृपतिर्भजते मनुष्यं
विद्याविहीनमकुलीनमसंस्कृतं वा ।
प्रायेण भूमिपतयः प्रमदा लताश्च
यत्पार्श्वतो भवति तत्परिवेष्टयन्ति ॥ ३६ ॥
राजा निकटकेही मनुष्यको भजतेहैं, चाहे वह विद्याहीन, अकुलीन, सस्कार-
हीन हो, प्रायः राजा,स्त्री और वेल जो निकट होताहै उसीको वेष्टन करते हैं ३६
तथाच-
और भी-
कोपप्रसादवस्तूनि ये विचिन्वन्ति सेवकाः ।
आरोहन्ति शनैः पश्चाद्दुन्वन्तमपि पार्थिवम् ॥ ३७ ॥
जो सेवक क्रोध और प्रसन्नताके विषयको खोजते रहतेहैं, वे-क्रमसे विरक्त
राजाकोभी प्राप्त होते हैं ॥ ३७ ॥
विद्यावतां महेच्छानां शिल्पविक्रमशालिनाम् ।
सेवावृत्तिविदाञ्चैव नाश्रयः पार्थिवं विना ॥ ३८ ॥
विद्यायुक्त, कारीगर और विक्रमसे सम्पन्न, सेवावृत्तिके जाननेवाले महाश-
योंको राजाके विना अन्य आश्रय नहीं है ॥ ३८ ॥
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