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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( ४४६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ४४६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
मन्दमति है जो यूथसे भ्रष्ट हो पीछे स्थित होकर घण्टेको बजाता हुआ आता है
और जो कहीं किसी दुष्ट जीवके मुखमें गिरा तो अवश्य मरेगा" । तब उसके
उस वनमें फिरते हुए कोई सिंह घण्टेका शब्द सुनकर आया । जब आकर
देखा कि ऊंटके बच्चोंका समूह जाता है । और एक पीछे क्रीडा करताहुआ
बेल खाताहुआ जबतक स्थित है तबतक और ऊंटके बच्चे पानी पीकर अपने
घर गये । वह भी वनसे निकलकर जबतक दिशाओंको देखता है तबतक न
कोई मार्गको देखता वा जानता है (सन्ध्याके कारण अन्धकार हुआ) यूथसे
भ्रष्ट हुआ बड़ा शब्द करता जबतक मन्द २ कुछ दूर चला तबतक उस
शब्दका अनुसारी सिंहभी तैयार हो एकान्तमें आगे स्थित हुआ । सो जबतक
ऊंट निकट आया । तब सिंहने कूदकर उसकी गर्दन पकड़कर मारडाला । इससे
मैं कहता हूं-
सतां वचनमादिष्टं मदेन न करोति यः ।
स विनाशमवाप्नोति घण्टोष्ट्र इव सत्वरम् ॥ ६९ ॥"
सत्पुरुषोंके कहे वचनको जो मदसे नहीं करता है वह घण्टा बंधे ऊंटकी
समान विनाशको प्राप्त होता है ॥ ६९ ॥”
अथ तच्छ्रुत्वा मकरः प्राह,-“भद्र-
यह सुनकर मकर बोला-“भद्र-
प्राहुः साप्तपदं मैत्रं जनाः शास्त्रविचक्षणाः ।
मित्रताञ्च पुरस्कृत्य किञ्चिद्वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ ७० ॥
शास्त्रमें चतुर मनुष्य साप्तपदिककोही मित्रता कहते हैं सो मित्रताको आगे
कर जो कुछ मैं कहताहूं सो सुन ॥ ७० ॥
उपदेशप्रदातॄणां नराणां हितमिच्छताम् ।
परास्मिंन्निह लोके च व्यसनं नोपपद्यते ॥ ७१ ॥
हितकी इच्छासे उपदेश करनेवाले मनुष्योंको परलोक और इस लोकमें दुःख
नहीं होता है ॥ ७१ ॥
तत् सर्वथा कृतघ्नस्यापि मे कुरु प्रसादं उपदेशप्रदानेन ।
उक्तञ्च-
सो सर्वथा मुझ कृतघ्नपरभी उपदेश दानकरके प्रसन्नता करो । कहा है कि-

भाषाटीकासमेतम् । ( ४४७ )
उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः ।
अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्भिरुच्यते ॥ ७२ ॥”
जो उपकारियोंमें साधु है उसके साधुतामें क्या गुण है ?-जो अपकारियोंपर
कृपा करे महात्माओंने उसेही साधु कहो है ॥ ७२ ॥”
तदाकर्ण्य वानरः प्राह,–“भद्र ! यदि एवं तर्हि तत्र गत्वा
तेन सह युद्धं कुरु । उक्तञ्च–
यह सुनकर वानर बोला-“भद्र ! जो ऐसा है तो जाकर उसके संग युद्ध कर–
हतस्त्वं प्राप्स्यसि स्वर्गं जीवन् गृहमथो यशः ।
युध्यमानस्य ते भावि गुणद्वयमनुत्तमम् ॥ ७३ ॥
मरनेसे स्वर्गको प्राप्त होगा, जीनेसे गृह और यशको प्राप्त होगा, युद्ध करनेसे
तुझको दोनो प्रकार श्रेष्ठ गुण प्राप्त होंगे ॥ ७३ ॥
उत्तमं प्रणिपातेन शूरं भेदेन योजयेत् ।
नीचमल्पप्रदानेन समशक्तिं पराक्रमैः ॥७४॥
उत्तमको प्रणाम करके, शूरको भेद करके, नीचको कुछ देकर युक्त करे
और समान बलवालेसे युद्ध करै ॥ ७४ ॥”
मकरः प्राह,–“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्,–
मकर बोला,–“यह कैसे ?” वह बोला-
कथा ११.
आसीत् कस्मिंश्चित् वनोद्देशे महाचतुरको नाम शृगालः।
तेन कदाचित् अरण्ये स्वयं मृतो गजः समासादितः । तस्य
समन्तात् परिभ्रमति परं कठिनां त्वचं भेत्तुं न शक्नोति ।
अथ अत्र अवसरे इतश्चेतश्च विचरन् कश्चित् सिंहस्तत्रैव प्रदेशे
समाययौ । अथ सिंहं समागतं दृष्ट्वा स क्षितितलविन्यस्त-
मौलिमण्डलः संयोजितकरयुगलः सविनयमुवाच,–“स्वा-
मिन् ! त्वदीयोऽहं लागुडिकः स्थितः त्वदर्थे गजमिमं रक्ष्या-
मि । तत् एनं भक्षयतु स्वामी” । तं प्रणतं दृष्ट्वा सिंहः