पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( ३१८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३१८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
निकल जाओ" शशक बोला,-"यह तेरा नहीं किन्तु मेरा घर है । सो क्यों
मिथ्या कठोर वचन कहता है । कहा है-
वापीकूपतडागानां देवालयकुजन्मनाम् ।
उत्सर्गात्परतः स्वाम्यमपि कर्तुं न शक्यते ॥ ९३ ॥
बावडी कुए तडागोंको देवालय तथा वृक्षोंको छोड़कर फिर इनपर कोई
अपना प्रभुत्व नहीं कर सक्ता ॥ ९३ ॥
तथाच-
तैसेही-
प्रत्यक्षं यस्य यद्भुक्तं क्षेत्राद्यं दश वत्सराम् ।
तत्र भुक्तिः प्रमाणं स्यान्न साक्षी नाक्षराणि वा ॥ ९४ ॥
दश वर्षतक जिसने प्रत्यक्ष क्षेत्रादिका भोग किया है उसमें भोगही प्रमाण
२ साक्षी और लेखकी आवश्यकता नहीं है ॥ ९४ ॥
मानुषाणामयं न्यायो मुनिभिः परिकीर्त्तितः ।
तिरश्चाञ्च विहङ्गानां यावदेव समाश्रयः ॥ ९५ ॥
मनुष्योंका यह न्याय मुनियोंने कहा है पशु और पक्षियोंकी जबतक जहां
स्थिति है तबतक वह वहांका अधीश्वर है ॥ ९५ ॥
तन्मम एतद्गृहं न तव" इति । कपिञ्जल आह,-"भो !
यदि स्मृतिं प्रमाणीकरोषि तदागच्छ मया सह येन स्मृति-
पाठकं पृष्ट्वा स यस्य ददाति स गृह्णातु । तथानुष्ठिते मया
अपि चिन्तितम् । "किमत्र भविष्यति । मया द्रष्टव्योऽयं
न्यायः" । ततः कौतुकादहमपि तावनु प्रस्थितः । अत्रा-
न्तरे तीक्ष्णदंष्ट्रो नाम अरण्यमार्जारः तयोर्विवादं श्रुत्वा
मार्गासन्नं नदीतटमासाद्य कृतकुशोपग्रहो निमीलितनयन
ऊर्ध्वबाहुरेकपादस्पृष्टभूमिः श्रीसूर्याभिमुख इमां धर्मोपदे-
शनामकरोत् । "अहो ! असारोऽयं संसारः क्षणभङ्गुराः
प्राणाः । स्वप्नसदृशः प्रियसमागमः । इन्द्रजालवत् कुटुम्बप-
रिग्रहोऽयम् । तत् धर्म मुक्त्वा नान्या गतिः अस्ति । उक्तञ्च-
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भाषाटीकासमेतम् । ( ३१९ )
सो यह घर मेरा है तेरा नहीं” । कपिंजल बोला-“भो ! यदि स्मृति प्रमाण
करता है, तो मेरे साथ आयो जो स्मृति पाठकसे पूछकर वह जिसको दे वह
उससे ग्रहण करे । ऐसा अनुष्ठान करनेपर मैंने भी विचार किया “इसमें क्या
होगा । मैंभी यह न्याय देखूंगा” । सो कौतुकसे मैंभी उनके पीछे चला ।
इसी समय तीक्ष्णदंष्ट्रावाला वनका विलाव उनका विवाद सुनकर नदीके किनारे
प्राप्त होकर कुशा बिछाये आंखे मीचे ऊपरको भुजा किये आधे चरणसे
पृथ्वीको छुटे हुए सूर्यकी ओर मुख किये इस धर्मकी वार्ताको करताथा “अहो !
यह संसार असार है । प्राण क्षणभंगुर हैं । प्रियसमागम स्वप्नकी समान हैं ।
इन्द्र जालकी ( मायावत ) यह कुटुम्बका परिग्रह है । सो धर्मको छोडकर और
गति नहीं है । कहा है-
अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शाश्वतः ।
नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥ ९६ ॥
शरीर अनित्य है ऐश्वर्य भी सदा नहीं रहेंगे मृत्यु सदैव निकट स्थित है इस
कारण धर्मका संग्रह करना चाहिये ॥ ९६ ॥
यस्य धर्मविहीनानि दिनान्ययान्ति यान्ति च ।
स लोहकारभस्त्रेव श्वसन्नपि न जीवति ॥ ९७ ॥
धर्मके बिना जिसके दिन आते जाते हैं वह लुहारकी धौंकनीकी समान
श्वासलेता हुआभी नहीं जीता है ॥ ९७ ॥
आच्छादयति कौपीनं यो दंशमशकापहम् ।
शुनः पुच्छमिव व्यर्थं पाण्डित्यं धर्मवर्जितम् ॥ ९८ ॥
जो मनुष्य [ इन्द्रिय दमन न कर केवल ] दंश मशक निवारणकेलिये
कौपीनका आवरण करते हैं उनका कुत्तेकी पूंछकी समान धर्मवर्जित पाण्डित्य
वृथा है ॥ ९८ ॥
अन्यच्च-
औरभी-
पुलका इव धान्येषु पूतिका इव पक्षिषु ।
मशका इव मर्त्येषु येषां धर्मो न कारणम् ॥ ९९ ॥