पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( १८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
ये जात्यादिमहोत्साहान्नरेन्द्रान्नोपयान्ति च ।
तेषामामरणं भिक्षा प्रायश्चित्तं विनिर्मितम् ॥ ३९ ॥
जो अपनी जाती आदिके महा अभिमानसे राजाके समीप नहीं जातेहैं, उनको
मरण पर्यन्त भिक्षाका प्रायश्चित्त कहा है ॥ ३९ ॥
ये च प्राहुर्दुरात्मानो दुराराध्या महीभुजः ।
प्रमादालस्यजाड्यानि ख्यापितानि निजानि तैः ॥ ४० ॥
और जो दुरात्मा कहते हैं कि राजा दुराराध्य ( कठिनतासे सेवने योग्य ) हैं,
उन्होंने अपनी प्रमाद, आलस्य और जडता प्रगट की है ॥ ४० ॥
सर्पान् व्याघ्रान् गजान् सिंहान् दृष्टोपायैर्वशीकृतान् ।
राजेति कियती मात्रा धीमतामप्रमादिनाम् ॥ ४१ ॥
सर्प, व्याघ्र, गज, सिंहोंकोभी उपायोंसे वशीभूत देखा है, अप्रमादी बुद्धि-
मानोंको राजाका वशमें करना क्या बड़ी बात है ? ॥ ४१ ॥
राजानमेव संश्रित्य विद्वान्याति परां गतिम् ।
विना मलयमन्यत्र चन्दनं न प्ररोहति ॥ ४२ ॥
राजाकेही आश्रयसे विद्वान् परमगति ( उन्नति ) को प्राप्त होता है, मलयाच-
लके बिना अन्यत्र चन्दन नहीं उगता है ॥ ४२ ॥
धवलान्यातपत्राणि वाजिनश्च मनोरमाः ।
सदा मत्ताश्च मातङ्गाः प्रसन्ने सति भूपतौ ॥ ४३ ॥”
श्वेत छत्र, मनोहर घोड़े, मत्त मातङ्ग यह सदा राजाकी प्रसन्नतासे
होते हैं ॥ ४३ ॥”
करटक आह-
करटक बोला-
“अथ भवान् किं कर्तुमनाः ?” । सोऽब्रवीत्- “अद्य
अस्मत्स्वामी पिङ्गलको भीतो भीतपरिवारश्च वर्तते । तत्
एनं गत्वा भयकारणं विज्ञाय सन्धिविग्रहयानासनसंश्र-
यद्वैधीभावानामेकतमेन संविधास्ये”। करटक आह-“कथं
वेत्ति भवान् यद्भयाविष्टोऽयं स्वामी ?” सोऽब्रवीत्-“ज्ञेयं
किमत्र । यत उक्तञ्च-
भाषाटीकासमेतम् । (१९)
"फिर आपकी क्या करनेकी इच्छा है ?" वह बोला-"आज हमारा
स्वामी पिंगलक डेरेकुटुम्बसहित भीत स्थितहै सो इसके निकट जाय
डरके कारणको जान सन्धि (मेल) विग्रह (युद्ध) यान् ('शत्रुके प्रतियात्रा)
आसन (समयका देखना) संश्रय (बलवानसे अभियुक्त होनेके कारण सब-
लका आश्रय) इनमेंसे एकका आश्रय करूंगा।" करटक बोला-"आप कैसे
जानते हैं कि, स्वामी भयभीत है?" वह बोला-"इस जाननेमें क्या है, कहा है-
उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते
हयाश्च नागाश्च वहन्ति चोदिताः ।
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः
परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥ ४४ ॥
कहे अर्थको पशुभी ग्रहण करलेते हैं, हाथी, घोडे प्रेरितहुए (भार) वहन
करते हैं, पण्डितजन बिनकही बातकोभी ग्रहण करतेहैं, क्योंकि पराई चेष्टाके
ज्ञान होनेके फलवाली बुद्धियां होतीहैं ॥ ४४ ॥
तथाच मनुः-
जैसाही मनुजीने कहाहै-
आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषणेन च ।
नेत्रवक्त्रविकारैश्च लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ ४५ ॥
आकार (अवयव विषाद प्रसादको प्राप्त) से संकेतसे, गमन, क्रिया, भाषण,
नेत्र और मुखके विकारसे, मनके अन्तरकी बात जानी जाती है ॥ ४५ ॥
तदहैनं भयाकुलं प्राप्य स्वबुद्धिप्रभावेण निर्भयं कृत्वा वशी-
कृत्य च निजां साचिव्यपदवीं समासादयिष्यामि" । करटक
आह- "अनभिज्ञो भवान् सेवाधर्मस्य । तत्कथमेनं वशीकरि-
ष्यसि ?'। सोऽब्रवीत्- "कथमहं सेवानभिज्ञः। मया हि तातो-
त्सङ्गे क्रीडता अभ्यागतसाधूनां नीतिशास्त्रं पठतां यच्छ्रुतं
सेवाधर्मस्य सारभूतं हृदि स्थापितं श्रूयतां तच्चेदम्-
सो इस भयसे व्याकुल हुएको प्राप्त होकर अपनी बुद्धिसे निर्भय कर इसको
वशीभूत कर अपनी मन्त्रिपदवीको प्राप्त हूंगा"। करटक बोला-"आप सेवाधर्मसे
अनभिज्ञ हो तो इसे किस प्रकारसे वशीभूत करोगे"। वह बोला-"मैं किस
प्रकारमें सेवासे अनभिज्ञ हूं, मैने पिताकी गोदमें खेलते हुए अभ्यागत साधुओंकी