पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (१९)
"फिर आपकी क्या करनेकी इच्छा है ?" वह बोला-"आज हमारा
स्वामी पिंगलक डेरेकुटुम्बसहित भीत स्थितहै सो इसके निकट जाय
डरके कारणको जान सन्धि (मेल) विग्रह (युद्ध) यान् ('शत्रुके प्रतियात्रा)
आसन (समयका देखना) संश्रय (बलवानसे अभियुक्त होनेके कारण सब-
लका आश्रय) इनमेंसे एकका आश्रय करूंगा।" करटक बोला-"आप कैसे
जानते हैं कि, स्वामी भयभीत है?" वह बोला-"इस जाननेमें क्या है, कहा है-
उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते
हयाश्च नागाश्च वहन्ति चोदिताः ।
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः
परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥ ४४ ॥
कहे अर्थको पशुभी ग्रहण करलेते हैं, हाथी, घोडे प्रेरितहुए (भार) वहन
करते हैं, पण्डितजन बिनकही बातकोभी ग्रहण करतेहैं, क्योंकि पराई चेष्टाके
ज्ञान होनेके फलवाली बुद्धियां होतीहैं ॥ ४४ ॥
तथाच मनुः-
जैसाही मनुजीने कहाहै-
आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषणेन च ।
नेत्रवक्त्रविकारैश्च लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ ४५ ॥
आकार (अवयव विषाद प्रसादको प्राप्त) से संकेतसे, गमन, क्रिया, भाषण,
नेत्र और मुखके विकारसे, मनके अन्तरकी बात जानी जाती है ॥ ४५ ॥
तदहैनं भयाकुलं प्राप्य स्वबुद्धिप्रभावेण निर्भयं कृत्वा वशी-
कृत्य च निजां साचिव्यपदवीं समासादयिष्यामि" । करटक
आह- "अनभिज्ञो भवान् सेवाधर्मस्य । तत्कथमेनं वशीकरि-
ष्यसि ?'। सोऽब्रवीत्- "कथमहं सेवानभिज्ञः। मया हि तातो-
त्सङ्गे क्रीडता अभ्यागतसाधूनां नीतिशास्त्रं पठतां यच्छ्रुतं
सेवाधर्मस्य सारभूतं हृदि स्थापितं श्रूयतां तच्चेदम्-
सो इस भयसे व्याकुल हुएको प्राप्त होकर अपनी बुद्धिसे निर्भय कर इसको
वशीभूत कर अपनी मन्त्रिपदवीको प्राप्त हूंगा"। करटक बोला-"आप सेवाधर्मसे
अनभिज्ञ हो तो इसे किस प्रकारसे वशीभूत करोगे"। वह बोला-"मैं किस
प्रकारमें सेवासे अनभिज्ञ हूं, मैने पिताकी गोदमें खेलते हुए अभ्यागत साधुओंकी