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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( १७० ) पञ्चतन्त्रम् ।

( १७० ) पञ्चतन्त्रम् ।

अस्य दुर्णयतरोः फलम्" इति । तदाकर्ण्य क्रव्यमुखो जीवना-
शभयाद्दूरदेशं गतः । एतस्मिन् अन्तरे तेन मार्गेण दासे-
रकसार्यो भाराक्रान्तः समायातः । तस्याग्रसरोष्ट्रस्य कंठे
महती घंटा बद्धा तस्याः शब्दं दूरतोऽपि आकर्ण्य सिंहो
जम्बूकमाह-“भद्र ! ज्ञायतां किमेष रौद्रः शब्दः श्रूयतेऽश्रु-
तपूर्वः”। तच्छ्रुत्वा चतुरकः किंचिद्वनान्तरं गत्वा सत्वरम-
भ्युपेत्य प्रोवाच,—“स्वामिन्! गम्यतां गम्यतां यदि शक्नोषि
गन्तुम्”। सोऽब्रवीत्,—“भद्र ! किमेवं मां व्याकुलयसि, तत
कथय किमेतत् 'इति । चतुरक आह-“स्वामिन् ! एष धर्म-
राजः तवोपरि कुपितः, यदनेन अकाले दासेरकोऽयं मदीयो
व्यापादितः तत्सहस्रगुणमुष्ट्रस्य सकाशाद् ग्रहीष्यामीति
निश्चित्य बृहन्मानमादाय अग्रेसरस्य उष्ट्रस्य ग्रीवायां घण्टां
बद्ध्वा वध्यदासेरकसत्कानपि पितृपितामहानादाय वैर-
निर्यातनार्थमायात एव”। सिंहोऽपि तच्छ्रुत्वा सर्वतो दूरादेव
अवलोक्य मृतमुष्ट्रं परित्यज्य प्राणभयात् प्रनष्टः। चतुरकोऽपि
शनैः शनैः तस्य उष्ट्रस्य मांसं भक्षयामास । अतोऽहं ब्रवीमि,
“परस्य पीडनं कुर्वन् ” इति ।
यह विचार कर शंकुकर्णसे बोला-“भो शंकुकर्ण ! स्वामी पथ्यके विना
क्षुधासे पीडित होता है । स्वामीके न होनेसे हमाराभी अवश्य मरण हो जायगा
सो जो कुछ वाक्य स्वामीके निमित्त कहूं वह सुन” । शंकुकर्ण बोला-“भो !
शीघ्र निवेदन करो जो मैं शीघ्र तुम्हारे वचन पे विचारे करूं औरभी स्वामीके
हित करनेमें मेरे सौ सुकृत होंगे” तब चतुरक बोला-“भो भद्र ! अपने शरी-
रको दुगुण लाभके लिये स्वामिको दो, जिससे तेरा दूना शरीर हो जायगा ।
और स्वामीकी प्राणयात्रा होगी ” । यह सुन शंकुकर्ण बोला-“भद्र ! जो ऐसा
है तो मेरा प्रयोजन यह कहो, स्वामीका अर्थ करो परन्तु इसमें धर्मही साक्षी
है”। इस प्रकार वे सब विचार सिंहके समीप गये । तब चतुरक बोला-
“देव ! कोई जीव नहीं मिला, भगवान् सूर्यभी अस्ताचलको प्राप्त हुए सो
यदि स्वामी दुगुणशरीर प्रदान करें तो यह शंकुकर्ण यह द्विगुणवृद्धिसे धर्मका

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भाषाटीकासमेतम् । ( १७१ )
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विश्वास कर अपने शरीरको देगा,” सिंह बोला-“भो ! यदि ऐसा है तो यह
सुन्दरतरहै, यह व्यवहारका कर्महै इसमें धर्मका प्रतिभू करो”। तब सिंहके
वचनके उपरान्त वृक शृगालोंने उसकी दोनों कोख विदीर्ण करदीं और शङ्कु-
कर्ण मरगया । तब वज्रदंष्ट्र चतुरकसे बोला-“भो चतुरक ! जबतक मैं नदीमें
जाकर स्नान देवतार्चनविधि करके आताहू तबतक तुझे यहा सावधान रहना
चाहिये” ऐसा कह नदीको गया । उसके जानेमें चतुरक विचारने लगा ।
“कैसे मुझ इकलेकोही यह ऊट खानेको मिले” यह विचार क्रव्यमुखसे बोला-
“भो क्रव्यमुख ! आप भूखेहो सो जबतक स्वामी न आवे तबतक तुम इस
ऊटके मासको खाओ मैं तुझको स्वामीसे निर्दोष प्रतिपादन करूंगा।” वहभी
यह वचन सुन जबतक कुछ मास खाता है तबतक चतुरकने कहा-“भो क्रव्य-
मुख ! स्वामी आताहै सो इसको त्यागकर दूरहो, जो इसके भक्षणमे विकल्प
न हो” ऐसा करनेपर सिंह आकर ऊटको देखने लगा तो, रीताहृदय ऊट
देखा । तब टेढी भौं करके क्रोधकर बोला-“अहो ! किसने यह ऊंट झूठा
कर दिया, जिससे उसकोभी मारू” ऐसा कहनेपर क्रव्यमुख चतुरकका मुख
देखने लगा “निश्चयही उसको कह जिससे मेरी शान्ति हो”तब चतुरक हँसकर
बोला-“भो ! मुझको अनादर कर मास खाकर अब मेरा मुख देखता है सो
उस दुर्नीतिरूपी वृक्षका फल आस्वादन करो”। यह सुनकर क्रव्यमुख जीव-
नाशके भयसे दूरस्थानमें चलागया, इसी समय उस मार्गमे ऊटोंका समूह
बोझसे लादाहुआ आया, उसके आगे ऊटके गलेमें एक वडा घण्टा बँधाथा ।
उसके शब्दको दूरसेही सुनकर सिंह जम्बूकसे बोला-“भद्र ! देखो तो यह
किसका कठोर शब्द सुनाई देता है जो पहले सुना नहीं था”। यह सुनकर
चतुरक कुछ दूर वनान्तरमें जाकर, शीघ्रतासे आकर बोला-“स्वामिन् ! जाओ
जाओ यदि जानेमें समर्थ होतो”। वह बोला-“भद्र ! क्यों मुझको व्याकुल-
करते हो । सो कहो यह क्या है.” चतुरक बोला-“स्वामिन् ! ये धर्मराज तुम्हारे
ऊपर क्रोध किये हैं कि, इसने अकालमें यह हमारा ऊट नाश किया सो हजार
गुणा उस ऊटका इससे ग्रहण करूंगा ऐसा कह महापरिमाण ग्रहण कर आगेको
ऊंटमें घटा बाव ऊंटमें मन लगाय उसके पितामहादिको लिये वैर लेनेके
निमित्त आताही है”। सिंहभी यह वचन सुन दूरसे देख मरे ऊटको छोड