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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages
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कुछ कभी कुछ कानून प्रचलित करते हो, इसका क्या कारण है ? यथार्थमें इन नब्रियोंमेंसे किसीने भी खुदाको न जाना क्या ? भला जो खुदाको पहचाने वो ढोंगर, ढोर, कीड़े, मकोड़े इत्यादि तथा गृहकी पकी रोटी खावे ? पृश्चली स्त्रीसे मित्रता रखे ? उनकी पुत्रीसे विवाह करे ? किसीको जबह करने और कत्ल करनेकी आज्ञा दे ? कदापि नहीं । ईश्वर शुद्ध है उसका जाननेवाला भी शुद्ध होता है उसके कर्म भी शुद्ध और उज्ज्वल होते हैं ।

समता - मनुष्य और पशुओंका मांस एक समान है, जिसने एकका खाया उसने सबका खा लिया, देखो तौरीतमें इस तसनाका १२-बाब २०-से-२३ आयत तक लिखा है कि, खानेमें पाक और नापाक जानवर बराबर हैं यही बात इज्जीलमें रसूलोंके आमालमें इसी बाबमें लिखी है कि, जो कोई खाता है उसके लिये सब जीवधारी मनुष्यके मांसके समान है ।

कबीर साहब - जस मांस नर की, तस मांस पशुकी, मांस मांस एक सारा हो ।

सात्विक भोजन - जो ऋषीश्वर लोग जङ्गलमें रहते हैं वे साग, पात, कन्द, मूल, फल आदिक खाकर जीते हैं। उन्हींका अन्तःकरण शुद्ध तथा हृदय प्रकाशमय और कान्ति तेज युक्त होती है । उन्हींको सब प्रकारकी सामर्थ्य मिलती है, तपस्या, भजन और संयम सब प्रकारकी शक्तिको प्रदान करता है । दानियल नबीकी किताब २ बाब-८२१ आयत तक देखो-दानियल नबी केवल फलियां खाकर दिन बिताता था, उसने कभी भी बादशाही भोजन स्वीकार नहीं किया, तिसपर भी उसका चेहरा बादशाही खाना खानेवालोंसे अधिक प्रकाशमान रहता था । नियुकद नजर बादशाहके सन्मुख परीक्षाके समय उसीको अधिक प्रतिष्ठा मिली । नबीसे बहुतसे आश्चर्यमय कौनक प्रगट हुये ।

धारणा - मांसाहारियोंके मनमें यह बात समाई हुई है कि, मांस खानेसे बल कान्ती बढ़ती है दानियल नबीकी उपरोक्त बातोंका विचार करें जाने कि, उनका कहना सब झूठ है ।

श्रेणियाँ और भोजन -- प्रथम श्रेणीमें पुण्य स्वरूप देवते हैं, उनको परमात्माने अमृत और कल्पवृक्ष प्रदान किया है । दूसरी श्रेणीमें मनुष्य हैं जिनको ईश्वरने अनाज फल शाक पात आदिक प्रदान किया है । तीसरी श्रेणी राक्षसोंकी है, जो कि, मांस शराबको ग्रहण करते हैं बुरे कर्मोंकोही अपना कर्तव्य समझते हैं इनमेंसे पहले श्रेणीवालोंको स्वर्ग मिलता है दूसरे मध्यमें रहते हैं एवं तीसरी श्रेणीवाले नरकमें पड़ते हैं ।

सप्राण स्यावरादि तारा और पालपी, विद्वानोंका मत

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स्वसंवेदमें—सृष्टिके स्थितिकी सात शाखायें लिखी हैं— १ अनाज, २ घास, ३ पानी, ४ मिट्टी, ५ पत्तियाँ, ६ फल, ७ फूल इन्हीं सातों प्रकारके भोजनोंसे सर्व जीवधारियोंका जीवन है, अनाजसे मनुष्य, घाससे पशु, पानीसे जलचर पलते हैं कितने ऐसे भी जीवधारी हैं जो मिट्टी खाकर ही रहते हैं, कितनेही कीड़े पत्तियोंसेही जीवन व्यतीत करते हैं. बन्दर आदि पशु फल खाकर रहते हैं कितने अपने जीवनकी रक्षा फूलहीसे करते हैं।

मांसकी पेसाबसे तुलना—दो प्रकारकी सृष्टि है। एक जलसे दूसरी वीर्यसे होती है जलकी वह सृष्टि है जो जलसे उत्पन्न होती है। वीर्यकी सृष्टि वीर्य और लोहसे उत्पन्न होती है। जलसे उत्पन्न होनेवाली सृष्टिको लोग अशुद्ध नहीं समझते। वीर्यसे उत्पन्न होनेवालीको अशुद्ध जानते हैं अनाज फल आदि सब जलकी सृष्टि है। पशु पक्षरू आदिकी उत्पत्ति वीर्यसे है। प्रायः मुसलमानोंको देखा जाता है कि, पिशाब करनेके समय एक मिट्टीका डला हाथमें ले जाते हैं, जिससे पिशाब करके उपस्थ इन्द्रियको पोंछते रहते हैं, जिसमें पिशाबकी बूँद कपड़ेमें लगकर उसे अशुद्ध न कर दे आश्चर्यकी बात है कि, जिस पिशाबकी एक बूँदसे भजनमें हानि होनेके भयसे डला लेकर घण्टों खड़े रहते हैं उसी पिशाबसे उत्पन्न हुआ महा निकृष्ट पदार्थ मांससे आध सेर पेटमें रखकर निमाजके लिये खड़े होते हैं ऐसी बुद्धि और समझको धिक्कार है।

४० दिनके बाद काफिर—हदीसमें आया है कि, जो कोई चालीस दिनतक बराबर मांस खाता रहे दिन भी दिन न छूटने दें तो वह अवश्यही काफिर हो जायगा। मैं कहता हूँ कि, जो कोई एक बार मांस खानेकी इच्छा करेगा अथवा खायगा तो वह काफिरोंमें भी काफिर हो जायगा। आदमने एकही बार खाया था जिसके कारण बिहिश्तसे निकाले गये थे।

जीवके देखते जीवहत्याका निषेध—मुसलमान कहते हैं कि, रसूलिल्लाहने फरमाया है कि, तुम किसी जानदारको दूसरे जीवधारीके सामने जबह मत करो “ऐसा करनेसे उसके दिलमें भय उत्पन्न होगा कि, आज यह उसको कत्तल करता है कल मेरे साथ भी ऐसा व्यवहार करेगा” अफसोस है मुसलमानोंकी बुद्धि और समझ पर कि, पशुओंके डरनेसे तो डरना खुदा जो व्यापक सर्व द्रष्टा (हाजिर-नाजिर) खुदा है उससे तनिक भी भय न करना।

न मिलनेका कारण—इसहाकका बेटा ईशू बड़ा शिकारी था, इसी कारण अपना ज्येष्ठांश खो बैठे पितासे उसको बरकत नहीं मिली जो याकूब चरवाहा था उसे मिली। शिकारी कठोर हृदय—मांसाहारी कभी कल्याण न पायेंगे।

एनी मोन

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युक्ति प्रमाण ।

भारत वर्षके इतिहाससे प्रगट होता है कि देवता और दैत्य सर्वदासे लड़ते आये हैं देवता सर्वदा जय पाते थे, जब संयोगन देवतोंकी हार होती थी तो उनको अन्तरिक्षसे सहायता मिलती थी, भलोंका सहायक परमेश्वर है। वह बुरोंको कभी भी सहायता नहीं देता ।

लोहूके निषेधका तात्पर्य—हजरत नूह मूसा आदिकको खुदाने हुकम दिया था कि, तुमको अनाज, फल, मांस आदिक खानेको दिया मांस खाना और लोहू फेंक देना क्योंकि, लोहूका बदला लिया जावेगा। लोहू पशुका जीवन है। न्यायका स्थान है, जब कि, किसी जीवधारीको मारा तो उसका लोहू खाओ चाहे फेंक दो, उसकी जान तो गई। क्या प्राणसे लोहू अधिक है कि, फेंक देनेसे उसका बदला न लिया जायगा कौसी अन्यायकी बात है, प्राणके साथही तो उसका सब शरीर है, हाड, चाम, मांस, लोहू, रग, आंत इत्यादि, जो चाहो सो खाओ अथवा फेंक दो। हत्या तो उसके मारतेही गरदनपर सवार हो गई, ऐसे कपटी और छली खुदाके छल कपटको हंस कबीरके बिना दूसरा कोई नहीं जान सकता, इस खुदाके भेष धारण करनेवाले अखुदाने सबकी बुद्धिपर परदा डाल दिया है ख्यमु बात तो यह है कि, रहीम हत्यारा नहीं हो सकता ।

याकूबको गऊका शाप—दीन इसलामसे प्रगट है कि, एक दिन हजरत याकूबने एक गायके बछड़ेको मारकर खा लिया ये जिस समय बछड़ेको मार रहे थे वहाँही उसकी माँ खड़ी देख रही थी, गायने याकूबको शाप दिया, जिसका यह फल हुआ कि, याकूबका बेटा ईसुफ मार कूटकर कूवामें डाला गया उसके शोकसे याकूब रोते रोते अन्धा हो गया। विचारनेकी बात है कि, जब एक बछड़ेके मारनेसे याकूबकी यह दशा होगई तो जो लोग हजारों जीवोंकी हिंसा करते हैं उनकी दशा क्या होगी ?

शिकारीकी हिंसक पशुओंसे तुल्यता—जितने हिंसक और शिकारी पशु हैं सब अशुद्ध हैं। मूसा और मुहम्मदकी शरियतसे भी प्रगट होता है कि, मांसाहारी सब पशु नापाक हैं, यह बात प्रगट भी है कि, शेर भेड़िया, कुत्ता, बिल्ली, बाघ और शाहीन आदिक मांसाहारी शिकारी और हिंसक पशु अशुद्ध ठहरे, तो मांस खानेवाला, शिकार करनेवाला और हिंसा करनेवाला, कैसे शुद्ध हो सकता है ? जिसको कि, अपने भले बुरे कर्मका ईश्वरके सम्मुख हिसाब देना है ।

कब—जब मुहम्मद साहब जहाद और लड़ाईको जाया करते थे वहाँ अनाज नहीं मिलता था तो जानवरोंको जबह करके खानेकी आज्ञा दिया करते

प्राणधारी फूल, एनथो जुआ

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थे उनके सैनिकोंको मांसको खानेसे, कामका वेग हुआ तो उन्होंने हुकुम दिया कि, जब आदमीको तीन रोज भूखे मरते बीत जाय खानेको कुछ न मिले, भूँखसे प्राणान्तकी दशा हो, तब चौथे दिन जो कुछ मिले खा लो, तो हलाल है मांस खाना ऐसेही समयके लिये हलाल हो सकता है ? दूसरे समयके लिये नहीं हो सकता । इसी प्रकार कितनी रीति रसम है जो किसी समय विशेषके लिये हैं दूसरे समयके लिये अनुचित हैं ।

पाक नापाककी समता—तौरीत और इञ्जीलसे प्रगट है कि, खाने में पाक और नापाक सब जीवधारी एक समान हैं । तौरीतमें तो कुछ विवरण भी है, पर इञ्जीलमें किसी प्रकारका बिलग विवरण नहीं है तो भी ईसाई लोग अपनी बुद्धिसे अपने भीतरी ईमानसे कुत्ता, बिल्ली, गदहा आदिक खाना नापसन्द करते हैं ।

निष्कर्ष—शिकारी पशु अर्थात् हिंसक जानवर और कञ्जरियाँ (वेश्यायें), जिनका कि गोशत खाना और वेश्यापन करनाही काम है, इनका अपराध तो शायद क्षमा हो भी, पर हिंसक और दुराचारी मनुष्य कभी क्षमा न किये जायेंगे । उनको ईश्वर अवश्य महान् दण्ड देगा । हाँ इतना तो है कि, जिस स्थानपर, अनाज घास, पात, फल, फूल, न होगा । प्रयत्नसे मिलना भी दुस्तर होगा वहाँके मनुष्य क्षमाके योग्य समझे जा सकते हैं ।

दोष—मांस अहारी अशुद्ध अन्तःकरण वाले होते हैं । प्रथम तो उनका मनही भक्तिमें नहीं लगता, उनमें सांसारिक छल, कपट और विषयवासनाकी प्रबल इच्छा होती है । यदि वे भक्तिकी ओर भी लगते हैं तो वाममार्गमें सम्मिलित होते हैं । मांस मदिरामेंही निमग्न रहकर तमोगुणी बने रहते हैं, उनको सत्तोगुणी भक्ति नहीं मिलती इसी कारण लोक परलोकसे सुख और मोक्ष यह भी प्राप्ति कभी नहीं होती ।

नानक०—जो पीते प्याले और खाते कबाब, सोदे खोरे लोगो वह होते खराब सो तोबा पुकारे कि, पावे निमाज, जो लेखा मँगीज क्या कीजे जबाब ॥

संस्कृतमें तम अज्ञानको कहते हैं इसीसे सारा संसार हुआ है । तमके न होतेही संसारका परदा नष्ट हो जाता है । फिर ज्ञान होकर मोक्ष मिल जाता है यह निश्चित बात है कि, मांस आदि तमोगुणी भोजनोंसे कभी भी मुक्ति नहीं हो सकती ।

मनुष्यसे भेड़िया—मांस खानेकी इच्छा रखनेवाले हिंसक पशुओंकी योनिमें जाते हैं । नानक साहबकी जन्म साखीमें लिखा है किः— एक

एन्टेनिया, जो फिस्टस बैलिमेन्स, एनकेरेनेटे मुंगिया या कोरल

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समय नानक साहब यमन आबाद नामक बस्ती जो इस समय गुजराँ बालाके निकट है, वहाँ पर आपका मलिक भागू नाम करोरी खत्री मिला । उसने नानकजीसे कहा कि, आज मेरे पिताके श्राद्धका दिन है, आप मेरे घर भोजन कीजिये नानक साहबने कहा कि, यह भोजन तुम्हारे पिताको पहुँच गया, उस खत्रीने उत्तर दिया कि, महाराज ! ब्राह्मण वचनानुसार तो अवश्य पहुँच गया नानक साहबने कहा कि, असज्जनोंको कदापि नहीं पहुँचता तेरा पिता भेड़ियाकी योनिमें गया है, यहाँसे पांचकोसपर अमुक स्थानमें तीन दिनका भूखा प्यासा झाड़ीमें बैठ आ हुआ है । खत्रीने कहा कि मैं इस बातका कैसे विश्वास करूँ ? नानक साहबने कहा कि, तू भोजन लेकर उसके पास जा, वह भोजन करेगा तेरे साथ मानुषिक भाषामें बातचीत करेगा । नानक साहबकी आज्ञानुसार खत्री भोजन लेकर वहाँ पहुँचा वहाँ भेड़िया मिला उसने खूब पेटभर भोजन किया । पेट भर खाने पर भेड़ियेने खत्रीके पूछनेसे कहा कि, मैं अमुक खत्री हूँ । एक वैष्णवके उपदेश मैंने मांस खाना त्याग दिया था । एक समय बीमार पड़ा उस समय मेरा पड़ोसी मांस पकाता था, मेरे नाकमें उसके मसालेकी गन्ध पहुँची, मेरा मन मांस पर चल गया, इतनेही मैं मेरे प्राण निकल गये । मांस खानेके सकलपसे मैं भेड़िया हो गया । फिर वही खत्री नानकसाहबका उपदेश लेकर भक्त हो गया ।

कबसे—जम्बूद्वीपके भरतखण्डको भारतवर्ष भी कहते हैं । यह देश पृथिवीके सभी प्रदेशोंसे उत्तम है । भारत वर्षके चारों ओर मुसलमान म्लेच्छोंकी बस्ती है, किसीकी भी ऐसी श्रेष्ठता नहीं है । भारतमें दयाका पूर्ण प्रचार होनेके कारण, यह सर्वोत्कृष्ट एवं सर्व गुण सम्पन्न हुआ है । शोककी बात है कि, मुसलमानोंके राज्य कालसे भारतमें भी मांस भक्षणका प्रचार और बढ़ गया जो दिन २ बढ़ता ही जाता है ।

हानिके कारण—दया कम हो गयी, लोगोंके अन्तःकर अशुद्ध हो गये । भक्ति लुप्त हो गई । साधु सेवा और सच्ची गुरु भक्तीका चिह्न भी नहीं मिलता, ऊपरसे गुरु भक्ति सेवाकी दिखावट और दम्भसे धर्मकी पुकार थोड़ी बहुत रह गई है । देखें आगे क्या होता है, शोक ! ज्ञान, भक्ति और मुक्ति आदि सत्य पदार्थकी खोजको भूलकर भारतवासियोंने मांस और शराब तथा नाना प्रकारके निषिद्ध मादक पदार्थोंको ग्रहण कर लिया है

उपदेश—परमात्माके सब गुणोंमें श्रेष्ठ गुण दयालुता और कृपालुता है सब मनुष्य तथा अन्य जीवधारी उसी दया और कृपाका आसरा रखते हैं । यदि वह कृपा न करे तो ऋषि, मुनि, पीर, पैगम्बर, साधु, महात्मा कोई भी न छूटें

स्पर्ज, लाजवन्ती, सूर्यमुखी वृक्षसे बतख कोहड़ा, पहाड़ोंकी लड़ाई

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वरन् सब उसके कोपमें पड़ें, यही एक इसका दयालू होनेका प्रमाण है कि, पापियों पर भी उसकी दया होती है। मनुष्य होकर जो इस सर्वोत्कृष्ट गुणको न धारण करे, वह मनुष्य मण्डलसे बाहर है। जो उस दयालूका दर्शन करना चाहता है एवं उसकी कृपा प्राप्त करके जन्म सुधारना चाहता है, तो अवश्य दया धारण करे, निर्दयी उसकी कृपाके पात्र कदापि न होंगे उसके कोपमें पड़के नर्कमें सड़ेंगे। मांस खानेवालोंके हृदयमें दयाका संचार भी नहीं होता, अपने स्वादके लिये हत्या करते हैं। शाक, जानवरोंका गला मूलीके समान काटते हैं। शहरोंमें कसाई एक अधेलाही देता है मुल्ता लोग प्रत्येक गलेपर एक अधेला लेकर सहस्रों बकरी और भेड़ोंको जबह करा देते हैं। शायद यह मुल्ले और मुसलमान लोग भी, बिहिश्त मिलनेकी आशा रखते होंगे? धिक्कार! धिक्कार! इसी विषय पर कबीर साहिबने भी अपने सच्चे उपदेश दिये हैं कि, मनुष्य सच्ची बातको समझ कर अपना कल्याण कर सके।

झूलना—सन्तकी चाल संसारसे भिन्न है, सकल संसारमें चेहर बाजी।

हिंदू मुसल्मान दोउ दीन सरहद बने. वेद कितेब परपञ्च साजी ॥

हिंदूके नेम आचार पूजा घना, वरत रहत एकादशी राजी।

बकरा मार मुख मांस भक्षण करें, भक्ति ना होय यह दगाबाजी ॥

सर्व ऊपर श्रीकृष्ण गीता कथी, कृष्णकी बातको मान पाजी।

क्या भई वेद गीता पढ़े दृष्टि उघरे नहीं, भैंसकी सींग क्या बेनू बाजी ॥

मुसल्मान कलमा पढ़े तीस रोजा रहे, वंग निमाज ध्वनि करत गाढ़ी।

बकरीको कूटी काटि जीव जबह कर, गाय पच्छाड़के कुही काढ़ी ॥

इस जोर जुल्मसे बिहिस्त त मिलेगी, खून अपराध शिर व्याध बाढ़ी।

माँगेगा हिसाब तब जवाब क्या देवेंगे, चलेंगे फिरिश्ते जब पकड़ दाढ़ी ॥

मोमदिल मेहरवान दिल उस दिलको, बिहिश्त रोजी बिहिश्त ठाढ़ी।

कहैं कबीर वन्दे साहबी सो करे, सत्य जो चीन्हके झूठ छाढ़ी ॥

तम प्रिय होनेका कारण—प्रायः हिंसक जीवधारी प्रकाशको सहन नहीं कर सकते जैसे उल्लू, चमगीदड़ आदि बहुतसे मांस अहारी जीवधारी प्रकाशसे ऐसी घृणा रखते हैं कि सूर्यके निकलतेही बिलोंमें जा छिपते हैं शामको पूरी अँधेरी तक मुँह भी नहीं दिखाते। जब अँधेरी रात होती है तो आनन्द पूर्वक इधर उधर फिरते हैं, ऐसे करनेका कारण केवल मांस अहार है, जिससे उनका अन्तःकरण अन्धकारमय हो गया है इसी कारण, वे अन्धकारकोही स्वीकार करते हैं।

सुमेह और विन्ध्याचलकी लड़ाई

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अभक्ष्यके कारण अपूर्णता—जिस मकानमें गन्दगी, कूड़ा, कर्कट, भरा हुआ हो, लीपा झारा न जाता हो, ऐसे मकानमें दीपका प्रकाश करने पर भी ज्योति बहुत नहीं फैलता पर जो मकान खूब साफ स्वच्छ हो दीवारोंमें उत्तम उत्तम कांच लगे हुये हों ऐसे मकानमें एक छोटीसी बत्ती भी जला दी जाय, तो भी सैकड़ों दीपकोंके समान प्रकाश हो जाता है समस्त मकान ज्योति से भर जाता है । इसी प्रकार मनुष्यका अन्तःकरण है, यही आत्माका मकान है, यदि पापोंसे अन्तःकरण अशुद्ध हो, मांस शराब आदि अभक्ष्य घृणित पदार्थोंसे स्वच्छ हो, भय और शुद्धताके साथ भजनरूपी दीपक प्रकाश किया जावे, तो शीघ्र ही पूर्ण प्रकाशमय हो जावे । यही कारण है कि, पश्चिम देशके महात्मा पीर पैगम्बर, औलिया, नबी आदिकोंने अभक्ष्यका त्याग किये बिनाही बड़ी बड़ी तपस्यायें कीं तिसपर भी भारतवर्षके मामूली ऋषियों महात्माओंके संह्वांश प्रकाशको भी प्राप्त न कर सकें क्योंकि, भारतीय महात्मागण इन्द्रिय स्वादकी वासनाओंको त्यागकर भजन करते थे ।

जिसका जैसा कर्म होता है उसकी वैसेही बुद्धि होती है बुद्धिके अनुसारही विद्याका प्रकाश होता है इसीके अनुसार ज्ञान प्राप्त होता है । ज्ञान हुआ व्यक्ति आत्मज्ञानको प्राप्त करता है इसके किये बिना ईश्वरका ज्ञान कठिन ही नहीं बरन असम्भव है । जिसको आत्माका ज्ञान नहीं उसको सत्य ज्ञान नहीं जिसको आत्मा न होता है वह सब जीवोंको अपनी आत्मा समझता है । अखिल जीव धारियोंकी देहको अपना देह समझता है । जो सर्वत्र अपनीही आत्मा समझता है वह किसी जीवधारीको दुःख नहीं दे सकता वह न किसीको दुःख देना ही चाहता है, वो मांस खाना स्वीकार नहीं कर सकता जो कि जीव हिंसाके बिना प्राप्त नहीं हो सकता ।

न्यायकी बात—है कि जितने जीवधारी हैं वे सब अपना बदला लेनेको तैयार होते हैं स्थावर बदला नहीं लेते, जीवधारी पशु और मनुष्य सब एक समान ही हैं आपसमें भाई हैं, जो भाईका रक्तपात करेगा वह अवश्य बदला देगा गला काटनेके बदले गया कटावेगा इसमें कुछ भी अंदेश नहीं है ।

मछली खानेके दोष — जो कोई मांस खाता है वह सब जीवधारियोंका ही तो मांस खाता है उसके लिये शुद्ध अशुद्ध सब एक समान है, पशु और मनुष्यका-मांस एकही सरीखा है । जो मांस आहारी मछली अवश्य खाते हैं वो सब कुछ खाते हैं क्योंकि, मछली सब जीवधारियोंके मांसको खाती हैं विष्ठा आदिकका भी भक्षण करलेती हैं । प्रायः देखा गया है कि बड़ी बड़ी मछलियोंका पेट चौरने पर

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उनके पेटसे मनुष्यके हाथ पग अथवा कभी कभी पूरा आदमी अथवा छोटा लड़का निकल पड़ा है इसी प्रकार छोटे बड़े पशु भी बहुत निकले हैं। इससे सिद्ध होता है कि, मछली सब कुछ खाती है। अब विचार करने योग्य है कि जिसने मछली खाई उसने हलाल खाया कि, हराम।

कुत्ता खाया — प्रायः ऐसा भी दखा गया है कि, शहरके कसाई लोग अशुद्ध पशुओंके मांस और कभी कभी मनुष्यके मांसको भी बकरेके मांसके साथ मिलाकर बेच देते हैं लोग उनको मोल ले लेकर खा जाते हैं अस्तु, आठ बरसके लगभग हुए मैंने सुना था कि, लखनऊमें एक सर्कारी मुलाजिम चपरासी अथवा खलासी आदिमें से किसीने कसाईकी दूकानसे मांस ला पकाकर खालिया वह बहुत बीमार हो गया। डाक्टरके पास दवाई कराने गया, डाक्टरके पूछने पर उसने बतलाया कि, अमुक कसाईकी दूकानसे मैंने मांस लेकर खाया था। डाक्टर साहबने अपनी बुद्धिसे विचार किया कि, बकरेके गोश्त में तो यह बात नहीं होती जान पड़ता है कसाईने किसी दूसरे प्रकारका मांस दिया है। कसाईके घर जाकर तलाशी ली तो ठाँव २ पर कुत्तेको खाल पाई, दरियाप्त करनेसे मालूम हुआ कि, यह कुत्तों को ही मार २ कर चुपचाप बेचा करता है।

परमात्माने सब जीवधारियोंके ऊपर मनुष्यको राजा बनाया है न्यायी राजाके लिये स्वर्ग, अन्यायियोंके लिये घोर नरक होता है।

गलत यह भी — मुसलमान कहते हैं कि, यदि कलमा पढ़कर जबह करें तो हलाल होता है जीवधारी खुदाको पहुँचता है, अगर कलमा पढ़कर बिन व्याही स्त्रीके साथ व्यभिचार करे तो गुनाह नहीं है। मैं इस बातका कभी विश्वास नहीं कर सकता। अगर इस कलमेमें यह शक्ति होती तो कलमा पढ़कर चोरी करने वालेको पुलिस गिरफ्तार न करती। कलमा पढ़कर खून करनेवालेकी फाँसी न मिलती, कलमा पढ़कर डाँका मारता, कोई न पकड़ता इस कारण ये सब बातें बिलकुल झूठ हैं, मूर्खोंमें ठगी पसारनेकी बातें हैं। इसमें कोई प्रमाण नहीं कि, कलमा पढ़कर बध करनेसे जीव स्वर्गको चला जाता है, कलमा पढ़कर व्यभिचार करनेसे निष्पाप रहता है। यदि कलमेमें यह सामर्थ्य है तो चोरी क्या और डाँका आदि पुलिससे अधिक बलवान हैं? कलमामें यह सामर्थ्य बतलाना राक्षस, भूत यक्षोंके समान धोखा देना है। हां इतना है कि, मुहम्मद साहबके समयमें इस कलमामें बड़ी ताकत थी। क्योंकि, रक्तपात करने, निष्पाप जीवोंकी हत्या करने, चोरी और डाँका मारनेसे भी उनके समयमें अरबके लोग पकड़े नहीं जाते थे मुहम्मद साहबने रक्तपातकी आज्ञाही दी थी।

गंगाजीकी कथा

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वाममागियोंसे तुलना — हिन्दुओंमें वाममागों लोग मदिरा, मांस, व्यभिचार सब कुछ कर लेते हैं। सुमिरण पढ़नेसे पाक होजाते हैं, उन नीचोंसे उनको सुमिरणका हाल पूछा जाय उसका अर्थ विचारा जाय, तो मालूम होगा कि, उस सुमिरण बनानेवाले महान् अत्याचारी, व्यभिचारी, जगत्की मर्यादा भ्रष्ट करनेवाले, महान् विषयी, मांसाहारी और मद्यप वाममागोंही निकलेंगे ।

समभाव — आदमीकी चार लाख योनि है । अस्सीलाख दूसरे योनिके जीवधारी हैं, सबमें एकही आत्मा है । सबको एक समानही दुःख सुख हैं, जिन जीवधारियोंमें रक्त और श्वासका सम्बन्ध है वे सब एक समानही दुःख दर्दके लिये चिल्लाते हुए दुःखी होते हैं । सब जीवधारियोंकी बहुतसी बातों में समानता के कारण भाई २ के समान सम्बन्ध है । जो भाईपर दया न करेगा वह कदापि मनुष्य नहीं कहला सकता ।

ऊँचनीच — जड़म स्थावर जीवोंसे संसारको लाभ पहुँचता है, वे सब शुद्ध पुण्यआत्मा हैं, जिनसे संसारको हानि पहुँचती है वे पापी हैं और अशुद्ध हैं । साधु विद्वान्, राजा, बादशाह, शूर, बीर, दानी, उदार आदि मनुष्य श्रेष्ठ गिने जाते हैं । पशुओंमें गाय, भैंस, घोड़ा, बकरी आदि—श्रेष्ठ हैं, रेशम तसरके कीड़े शहतकी मखली आदि कीड़ोंमें श्रेष्ठ हैं । स्थावरोंमें फलवान् वृक्ष और जड़ी, बूटी आदि सब शुद्ध और पुण्यात्मा समझे जाते हैं । अत्याचार करनेवाले, व्यर्थही रक्तपात करनेवाले, निरपराधोंको दुःख देनेवाले सब पापी अशुद्ध और नारकी हैं ।

झूठा दावा — कितने मांसअहारी दावा करते हैं कि, हम विद्या और बुद्धिमें मांस त्यागियोंसे कम नहीं हैं, पर यह उनकी निरा मूर्खता है। इतनी बात अवश्य है कि, ऐसे लोग सांसारिक विद्याके किसी किसी अंशमें चतुर होते हैं, सो भी सब अंशोंमें नहीं, पारलौकिक विद्यामें तो उनको सुधही क्या होनी थी ।

शुद्धोंके लिये नहीं — जिन जो लोग मांस खाते हैं, उन्हीं लोगोंके लिये मांस खाने तथा रक्तपात करनेकी आज्ञा उत्तरी और उत्तरा करती है । मांस त्यागी शुद्ध पुरुषोंके पास ईश्वर खुदा अथवा किसी देवताकी मांस खानेकी आज्ञा कभी नहीं उत्तरी, न उत्तरती है और न उत्तरनेकी आशा ही है । प्रत्येक मनुष्य दूसरोंको अपने रङ्ग ढङ्गका बनाना चाहता है ।

हिन्दू शब्दका अर्थ — महाभारत, योगवासिष्ठ और भारतीय प्राचीन इतिहास देखने और पुराणोंके पढ़नेसे मालूम होता है कि, हिन्दू एक प्रबल प्रभावशाली और विजयी जाति थी । इसका कारण भी यही प्रतीत होता है कि, प्राचीन-

तात्पर्य

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कालमें हिन्दू पूरे अहिंसक थे। हिन्दुओंको युद्ध विद्यामें ऐसी कुशलता थी कि, इनकी संमता कोई जाति नहीं कर सकती थी, धनुर्विद्याकी योग्यता तो ऐसी थी कि, एक बाणमें सहस्रों बाण छोड़ते थे, विशेष क्या कहें ? इनके समक्ष देव, दानव, राक्षस, यक्ष आदि कोई भी नहीं ठहर सकते थे, महान् प्रभावशाली देवताओंकी भी इनसे सहायता लेनेकी आवश्यकता होती थी। हाय ! शोक ! जबसे भारतवासियोंने मांस खाना और मदिरा आदि मादक पदार्थोंका सेवन करना तथा सज्जनोंके नियमोंको उलंघन करना आरम्भ कर दिया, तभीसे सारी शक्तियाँ ऐसी भाग गईं कि, अब उनका पता भी नहीं सुना जाता। प्राचीन मन्त्रोंमें भी असर न रहा। क्योंकि, अब हिन्दू-हिन्दू नहीं रहे, म्लेच्छोंके कर्म करके म्लेच्छोंके समान बन गये। हिन्दू उसे कहते हैं जो हिंसासे दूर रहे। हिन्दू शब्द दो शब्दोंके संयोगसे बना है-हिन् और -दू। ये दो शब्द हैं-हिन्-का अर्थ है। हिंसा, दू-का अर्थ है-अलग रहना, हिंसासे -सा को अलग किया, उसके साथ-दू-को मिला देने से - हिन्दू शब्द होता है। जो हिंसासे बिलकुल अलग रहे उसे हिन्दू कहते हैं। आर्यशब्दके भी ऐसेही श्रेष्ठ और उत्तम अर्थ हैं। मांस खानेसे हृदय और मस्तिष्क निर्बल और अशुद्ध हो जाते हैं येही विवेक और विचारके स्थान हैं। गोल्डस्मिथ साहबकी नेचरल् हिण्ट्री देखो वह भी मांसाहारियोंके विषयमें ऐसेही समर्थन करते हैं।

ब्राह्मणोंका निर्बल्य तथा परशुराम - ब्राह्मण हिंसाहीके कारण ऐसे निर्बल और कि, उनमें शूरताका नाम भी नहीं रहा। उनके अतिपराभवको देखकर भगवान्ने परशुरामजीको भेजा, इन्होंने शूरवीरता और तप दोनोंका उदाहरण एकत्र उपस्थित कर दिया तथा लोगोंको त्यागको माहात्म्य भी दिखा दिया। ये बड़े प्रभावशाली और शूरबीर हुये, उनने बड़ी तपस्याकी जिसके बलसे बड़े ऐश्वर्यको प्राप्त हुये। ब्राह्मणोंने ऐसा प्रभावशाली देखकर धर्मावतार परशुरामसे कहा उनकी बड़ी स्तुति की, उनके सम्मुख रोये, गिड़गिड़ाये अपना दुःख प्रगट किया। महाबली परशुरामने क्षत्रियोंको मारकर राज्य छीन लिया ब्राह्मणोंको राजा बनाकर कहा कि, तुम सुखपूर्वक राज्य करो। स्वयं तपस्या करनेको चले गये। उनके चले जानेके बाद क्षत्रियोंने फिर मार कूटके राज्य छीन लिया। ब्राह्मणोंने फिर पशुरामकी शरण ली, परशुरामजीने क्षत्रियोंको मारकर ब्राह्मणों को राज्य दे दिया। इसी प्रकार क्षत्रियों और परशुराममें अनेक बार लड़ाई हुई, अन्तमें ब्राह्मणोंको राज्य स्थापितकर परशुरामजी तपस्या करने चलने लगे, ब्राह्मणोंने कहा कि, महाराज ! हम अनेक बार दुःख उठा चुके हैं आप हमें छोड़े

इसलामी पुस्तकें और हदीसें जमीनोंकी आपसकी बातें प्यालेका आशीर्वाद इन्द्रियोंकी गवाइयाँ सजीव मूर्तियाँ जमीनकी जिवराईलसे बातें

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जाते हो, आपके परोक्षमें क्षत्री लोग हमको आकर मारें तो क्या किया जावेगा ? परशुरामजीने एक घण्टा बाँध दिया कि, जब क्षत्री चढ़ाई करें उस समय इस घण्टाको बजा देना, मैं शीघ्रही आ जाऊँगा, यह कहकर तपस्या करने चले गये । कुछ कालके पीछे ब्राह्मणोंने अपने मनमें विचार किया कि, क्षत्री लोग हमारे ऊपर चढ़ आवें, घण्टा बजानेसे परशुरामजी न आवें तो हम लोगोंकी बड़ी दुर्गति होगी, यह शोच परीक्षाके हेतु घण्टा बजाया, शब्द होतेही परशुरामजी आ उपस्थित हुये । पूछा कि, तुमने घण्टाको क्यों बजाया ? किस शत्रुने तुम्हारे ऊपर चढ़ाई की ? ब्राह्मणोंने कहा कि, हम लोगोंने क्षत्रियोंसे भयभीत होकर परीक्षाके लिये घण्टा बजाया है । इस बात पर परशुरामजीने क्रुद्ध होकर कहा कि, ओ डरपोको ! तुम लोगोंसे राज्य न होगा, तुम लोग राज्य करनेके योग्य नहीं हो, क्षत्री लोगही राज्य करेंगे तुम लोग उनके पुरोहित बनकर अपने दिन बिताओगे । सत्य संकल्प परशुरामका संकल्प कौन टार सकता था, क्षत्रियोंने आकर फिर राज्य ले लिया, ब्राह्मण लोग यजमानी वृत्तीसे अपना कालक्षेप करने लगे । शनैः शनैः लोभ और तृष्णा वश हो निषिद्ध दान लेनेसे दरिद्रताको प्राप्त हो गये । ब्राह्मणोंको ऐसी हीनावस्थामें प्राप्त होनेका कारण केवल हिंसाही है । हिंसाके कारण इनके भाग्यमें भीख माँगना आना ही था । परशुरामजीके बल करनेसे क्या हो सकता था ? क्षत्रियोंका भाग्य चमका हुआ था, जिसका कारण केवल एक अहिंसा ही था ।

अधिकता—जीवधारियोंके पूर्वके कर्मानुसार शक्ति और बल प्राप्त होते हैं । हाथी व्याघ्रसे भागता है, वह शेरके बलसे भयभीत होकर नहीं भागता वरन् प्रकृतिने स्वभावसेही व्याघ्रको ऐसे हथियार दिये हैं कि, जिसके भयसे हाथी जैसा बलावान् भी उसके सम्मुख हार मानता है । व्याघ्र, बाज, शाहीन आदि हिंसक पशुओंमें जो शूरता देखी जाती है उसका कारण यही प्राकृतिक नियम है । जीवधारियोंको उसके कर्मानुसार शारीरिक बल तारतम्यतासे प्राप्त है । हिंसक मांस आहारी पशुओंकी अपेक्षा शाक, पात, नाज, फल खानेवालोंमें अधिक शूरता है । देखो बटेर और बुलबुल, मुर्गा मेंढा, शूकर और भैंसा आदिककी लड़ाई कौसी भयानक होती है । बनका शूकर व्याघ्रसे भी अधिक बलवान् होता है । मांस खाने से शारीरिक बल और काममें विशेषता नहीं होती, व्याघ्र और बिल्ली आदि मांस आहारी पशु विशेष कामानुर नहीं होते, वरन् मुर्गी और कबूतर आदिकोंमें विशेष काम होता है ।

अहिंसक सुखी हैं—मुसलमानोंकी अपेक्षा हिन्दू बहुत सुखी हैं यदि एकही

बड़ी मूर्तिकी बातें बूझोंकी, सलाम, पशुबल गदहाको फिरस्ते, पत्थर और दाऊद कूआका रोना, रागसे कार्य विशेष सबकी बातें, विच्छूके बदले चांदी

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व्यवहारमें, हिन्दू और मुसलमान, दोनों एकही देशमें, एकही समयमें, एकही स्थानपर एकही उद्यममें लगे हों तो हिन्दू विशेष लाभको प्राप्तकर बहुत सुखी होगा, मुसलमान निर्दयताके कारण दरिद्रता और दुःखमें ही फँसे रहेंगे. क्योंकि जीवधारियोंका रक्तपात करना महापाप है।

हेयताका कारण — जितने मांसाहारी हैं सबका स्वरूप भयानक है. क्योंकि उसकी बनावटमें तमोगुण (अग्नि) का भाग विशेष मिला हुआ होता है, जितने नाज, फल, घास आदिकके खानेवाले हैं उनका दिखाव महान् शान्तिभय एवं धैर्य संयुक्त होता है, क्योंकि, उनकी बनावटमें जलका विशेष अंश होता है। अग्नि — (तमोगुण) शिवका स्वरूप है जो संसारको नष्ट करनेवाली है। जल-विष्णुका स्वरूप है जो संसारका पालन करनेवाला है। सतोगुणको धारण करनेसे मुक्ति है, तमोगुणसे अधमता प्राप्त होती है। इसी कारण तमोगुण हेय समझा जाता है।

भ्रष्ट करनेवाला — तमोगुण शिव स्वरूप है। शिव कङ्काल और भिखारी है तमोगुण रूपी शिवकी स्त्री दरिद्रता है शिव यानी तमोगुणके अनुयायी दरिद्री और भिखारी हैं। विष्णु सतो गुणरूप है—धनी है, लक्ष्मीका पति है, सुख सम्पत्ति सब उसके साथ हैं, इसी लिये सतोगुणी धर्म, लोक परलोकके कल्याणका कारण है, तमोगुण दोनों लोकसे भ्रष्ट करनेवाला है।

रक्तपातका काल — भारत वर्षमें मुसलमानोंके राज्यके पहले धन सम्पत्तिकी कुछ कमी न थी, सब प्रजा सुखसे रहती थी। जबसे मुसलमानी राज्य आया भारत भूमिपर जीर्वाहंसा और रक्तपात होने लगा, तबीसे सब पदार्थोंमें घाटा आने लगा; पापसे पीड़ित पृथ्वी होकर फल फूल और नाज इत्यादि देनेसे रुक गई। जहाँ पहले पचास मन अनाज होता था वहाँ अब बड़ी कठिनतासे दशमनसे भी कम होने लगा, फल आदिककी भी यही दशा है कि, पर्याप्त नहीं होते।

हत्याका प्रायश्चित्त — हिन्दू जातिको धन्य है जो कि, यदि भूलसे संयोगन कोई पशु बंधा हुआ मर जावे अथवा ऐसी चोट लग जावे जिससे कि उसके कारण उसका प्राण निकाल जे वे, तो जिस मनुष्यसे ऐसा काम हुआ हो, उसको घरसे बाहर निकाल देते हैं, उसका छूना भी पाप समझते हैं। वह निकाला हुआ मनुष्य हाथमें एक लकड़ी लेकर भीख मांगता फिरता ये शब्द पुकार पुकारके कहता है “धौरीकी बछिया दिया बनवास” अर्थात् गायकी बछियाने मुझको घरसे निकाल दिया उसको लोग हत्यारा कहते उसको न कोई छूता है न घरके अन्दर घुसने ही देता है। उसको भीख मांगकर खाना वृक्षोंके नीचे सोना तीर्थों तीर्थोंमें स्नान

जगदीशका सम्भाव बालककी रक्षा

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करते फिरना पड़ता है । शास्त्रानुसार नियमित तीर्थोंमें फ़िरनेके पीछे, ब्रह्म भोज, भण्डारा और जाति भोजके अतिरिक्त बहुत कुछ दान पुण्य करने पर उसको जातिमें मिलाते हैं । उसको ऐसा कठिन दण्ड होता है कि, बहुत दुःखी होता है । यह रीति न्यूनाधिक्य करके समस्त भारतवर्षमें है, इस बातका पूरबमें अधिक प्रचार है ।

हिंसकोंके मारनेका कारण — मनुष्य सृष्टिमें सबसे श्रेष्ठ है मनुष्यसे श्रेष्ठ परमात्मा है जो कोई अपने शासककी आज्ञा न माने उसके कार्य्यको पूरा न करे तो अवश्य दण्डका भागी होगा, जितने हिंसक पशु हैं वे मनुष्यके कोई काम नहीं आते, वरन् अवसर मिलनेपर घात करते हैं, इस कारण मनुष्य उनको मारते हैं । जिस प्रकार मनुष्यके हिंसक पशु शत्रु हैं, उसी प्रकार मांस आहारी और नशेबाज मनुष्य ईश्वरके शत्रु हैं । ईश्वर उनको अवश्य नरकमें डालेगा ।

सबसे हिंसक और अहिंसक — जितने हिंसक पशु हैं सबको प्रकृतिनेही उनके योग्य नख, दांत दिये हैं, पर मनुष्यकी उत्पत्ति हिंसक नहीं है । इसी कारण प्रकृतिने उनको हिंसाकी सामग्रीसे वञ्चित रक्खा है, पर प्राकृतिक नियमको तोड़कर ये हथियारोंसे जीर्वाहिंसाका काम करते हैं । इसी कारण ऐसी हिंसा और मांस अहार प्राकृतिक नियमके विरुद्ध है इसके करनेसे अवश्य दण्ड पावेंगे ।

पापी और कृतकृत्य — शरीरके पोषण और जिह्वाके स्वादके लिये लोग मांस खाते हैं । यह शरीर जिसको वे सत्य जानकर पालते हैं पाप करके महान अधर्मके कर्ता बनते हैं, सो एकदम असत्य है । जो लोग असत्यसे प्रीति करेंगे वे कभी सत्यको प्राप्त न कर सकेंगे । जो लोग तन, मन, धन, ईश्वरार्पण करते हैं वेही कृतकृत्य होते हैं ।

इखलाकी असूल — भी मनुष्यको मांस आहारी होना नहीं चाहता. क्योंकि, जावनरोंके मारनेके समय उनकी जो दशा होती है, उनके हाथ पांवका फड़-फड़ाना, दुःखके साथ बलबलाना, हृदय वेधक शब्दके साथ चिल्लाना, प्राण निकलनेके समय महान् कष्टका होना, कठिनसे कठिन हृदय को भी द्रवीभूत कर देता है इससे प्रतीत होता है कि, मनुष्य मांसाहारके लिये नहीं बनाया गया ।

मुक्तिके अधिकारी — मुक्तिके दो किनारे हैं, दोनोंही उसके आधार हैं, पहला कर्म, उपासना, ज्ञान और विज्ञान, सच्चे साधु गुरुकी सेवा दूसरा सच्चे परमात्माका भजन है इन दोनोंमें ये चार २ डण्डे हैं, दोनों आधारोंसे ये चारों येस्थित रहते हैं । आधार न हो तो डण्डे किस तरह स्थिर रह सकते हैं । जो साधु और गुरुकी सेवा हिन्दू जातिमें है वह किसी जातिमें नहीं है ।

बनी इसराईलकी रक्षा

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मांस आहारी मद्यप और नशेबाजोंसे न कभी साधु गुरुकी सेवा हुई न, भजनही बना वरन् वह साधुओंसे बाद विवाद किया करता है, उनकी मसखरी उड़ाता है, उनमें दोष निकालता है। जो सच्चे साधुओंमें स्नेह रखनेवाल होगा, वही ईश्वरका प्यारा होगा। जो सच्चे साधुओंमें प्रेम नहीं रखता वह ईश्वरका शत्रु है। सच्चे सन्तकी शरण गहे बिना कदापि परमात्मा न मिलेगा। मांस आहारियोंमें दोनोंही अवगुण होते हैं, इस कारण उनका अन्तःकरण अन्धकारमय हो जाता है, वे प्रकाशका मार्ग नहीं पाते उनसे दीनता दूर हो जाती है तथा मान बड़ाई अहंकारमें फँस जाते हैं।

यूरोपके विद्वानोंकी सम्मतियाँ

योरप देशके तत्त्ववेत्ताओं (PHILOSOPHERS) का विचार है कि, मनुष्य मांस खानेके लिये नहीं बनाया गया, इसका यथार्थ मांस भोजन नहीं है। मनुष्यको किसी प्रकारसे भी मांस न खाना चाहिये। मनुष्यके शरीरकी भीतरी और बाहरी बनावट बताती है कि, मांसाहारी जीवधारियोंमें नहीं है, वरन् अनाज साग, पात, फल आदिक खाकर अपना जीवन व्यतीत करनेके लिये बनाये गये हैं। बड़े २ नेचरलिष्ट विद्वान् और प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता लोगोंकी ऐसीही संमतियाँ हैं लीलीस्टन्, गिनी, सर एवर्ड होम्, वरन् कोबेरी, प्रोफेसर लारेनेस, लार्ड मेनबोडो मिस्टर टाम्स वेल जैसे बड़े २ समीक्षकोंने पूरी जाँच करके प्रगट किया है कि, मनुष्यके दांत पेट और अंतडियों तथा उसके शरीरकी बाहर भीतरी बनावटें प्रगट करती हैं कि, वह मांस आहारी उत्पन्न नहीं किया गया, प्रकृतिने इसके स्वभाव और बनावटसे इसे मांस त्यागी बनाया है।

मिस्टर लार्ड बक और मिस्टर गोसिङ्गल्ट — आदि रसायन विद्याके, प्रसिद्ध विद्वानोंमें थे, उनके वचनोंसे इस बातको प्रमाणित करता हूँ वे लिखते हैं कि, जो मनुष्य पशुओंका मांस खाता है, वही फिरसे घास पात बनता है, जो कि, रूप बदलकर मनुष्योंके खानेमें आता है जिसके द्वारा खानेवाले जीवधारीका पालन होता है। सब जीवोंमें जो एक किसमकी अण्डेके समान सफेदी होती है, वह जीवधारियोंकी समानही होती है इस सफेदीको अंग्रेजीमें एलू बियोमन कहते हैं। इसी प्रकारसे उनकी रगें और मनुष्योंकी रगें एकसी होती हैं, यहाँतक कि, उनके स्वरूपमें भी किसी प्रकारका भेद नहीं होता। कह बात लार्डबक् साहबकी फीमेली आर लेटर्ज आन कोमिस्ट्री किताबमें लिखी हुई है।

समीक्षा — विचार करना चाहिये कि, यह वचन मिस्टर लार्डबक् और बोसंगाल्ड आदिकोंका वचन भारतवर्षके ज्ञानी ऋषीश्वरोंके साथ मिलता है,

कीड़ेकी रक्षा, मंजारीके बच्चे तुलना, मनुष्यसे बन्दर, वस्त्रादि भोग

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इन विद्वानोंने अपनी जाँचको एक पूरी सीमातक पहुँचाई है । भारतीय ज्ञानी साधु जनोंका बचन है कि, जो लोग बहुत पाप करते हैं वे मरकर सुषुप्ति अवस्थामें जाते हैं वृक्ष आदि बनते हैं । कबीर साहबका बचन है कि, कर्मका बदला नहीं छूटता, उसी तरह जीवधारियोंके भक्षण करनेमें इन तत्वज्ञोंका बचन मिलता है । उन्होंने अपने तजुर्बासे लिखा हो अथवा ज्ञानी विद्वानोंके बचन लेकर लिखा हो दोनों बराबर हैं। तनिक भी भेद नहीं है । मांसमें भी सैकड़ोंमें छत्तीस भाग वह तत्व है जिससे मनुष्यकी शारीरिक उत्पत्ति होती है, शेष चौसठ भाग पानी है, जिससे कुछ भी लाभ नहीं है इसका उलटा अंकुरज और विशेष करके नाजमें अस्सीसे नब्बे भाग तक वह तत्व होता है जिससे मनुष्यके शरीरकी उत्पत्ती और पोषण होता है । इसके सिवा मनुष्यकी प्राण वायु (हरारत गरीजी) के लिये जिस तत्वकी आवश्यकता है जिसको कि, कारबोनी कहते हैं, वह भारे हुये पशुके मांसमें सब्जीकी अपेक्षा बहुत कम होता है । हड्डियोंके दूह और स्थिर करनेवाले तत्व भी सब्जीमें विशेष पाये जाते हैं । मांसकी अपेक्षा साग पातका भोजन बहुतही श्रेष्ठ है । जब कि, हम उसके यथार्थ लाभको विचारें बाहरी मांसकी फुलावटकी ओर ध्यान न दें ।

प्रकृति वैपरीत्य - जो मांस आहारी पशु हैं प्रकृतीने उनको स्वाभाविक एक ऐसी शक्ति दी है जिससे वे रातको साधारणतः आखेट कर सकते हैं, पर उसके उलटा मनुष्यमें एक ऐसी शक्ति है जो इसे रातको सोजानेके लिये भजबूर करती है ।

जो पशु मनुष्यके पास बहुत दिनोंतक रहते हैं वे अपनी फुर्ती चालाकी और शारीरिक बलसे बहुत प्रकारसे अपनी सेवा पूर्ण करते हैं, उनका सब्जीही खाकर पोषण होता है । गाय, बैल, खच्चर, घोड़ा, ऊँट आदि सब्जीकाही भोजन करते हैं ।

वेजिटेरियन - अङ्ग्रेजी भाषामें उनको बोलते हैं, जो कि, साग, पात, फल, फूल आदि खाकर जीते हैं, कदापि मांस नहीं खाते, उन लोगोंका साधारण जीव इस बातकी साक्षी देता है कि, मांस आहारियोंकी अपेक्षा उनके शारीरिक रोग बहुत कम होते हैं उनमें प्रायः मनुष्य ऐसे भी पाये जाते हैं, जिनको वृद्धा अवस्था तक भी बड़ी कठिनाइयोंसे ढूँढ़ने पर एक आध बीमारी जान पड़ती है । इङ्ग्लैण्ड और अमेरिकाके वेजिटेरियनोंमेंसे एक भी ऐसा दृष्टान्त नहीं हुआ कि, जिससे यह मालूम हो कि, उनमें कोई एक सप्ताह तक भी रुग्ण रहा हो ।

रालिन्स साहिब-इस्पार्टन लोग संसारकी सर्व जातियोंके इतिहासमें अपनी शारीरिक बल, शूरबीरता, शरीरके डील डौल आदिकके कारण अनु-

परमात्माकी दृष्टि

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पम गिने जाते हैं। वे लोग मांस न खाते थे, जिस समय ग्रीस और टर्कीके विजयका झण्डा फहरा रहा था उस समय उनके लड़ाके विजयी सैनिक लोग भी मांस नहीं खाते थे। जबसे उन्होंने पुरानी आदतको छोड़के मांस खाना आरम्भ कर दिया तभीसे उनके दुःखका आरम्भ हुआ। यद्यपि उनकी अवनतिके कारण दूसरे भी थे पर इसमें सन्देह नहीं कि, ग्रीसके व्यायाम शालाओंमें अभीतक शारीरिक बलकी बड़ी २ फुर्तियां और आश्चर्यजनक कर्तव्य दिखाये जाते थे तभी तक उनकी कार्य-वाहीकी बड़ी प्रसिद्धी थी, जबतक कि, वे मांस नहीं खाते थे। जबसे उन्होंने मांस खाना आरम्भ कर दिया तबसे बड़े बड़े बहादुर शूरवीर और फुर्तीले पहलवान लोग, शनैः २ आलसी निरुद्यमी और निकम्मे होने लगे। रालिन्स साहबकी पुराने इतिहासकी भूमिका देखो उसमें यही लिखा हुआ है।

प्रोफेसर फार्ससाहब — जो मांसाहारी नहीं हैं, उनका शरीर मांसाहारियोंकी अपेक्षा साधारणतः भारी होता है, उनके पुट्टे दृढ़ और बलिष्ठ होते हैं, परिश्रमके कठिन कार्योंसे भी नहीं घबड़ाते। प्रोफेसर फार्स साहबने इस विषयमें बहुत कुछ जांच की है। वे कहते हैं कि, मांस खानेवाले अंग्रेजोंकी अपेक्षा मांस न खानेवाले उनके भाई स्काटलेण्डके रहनेवाले अधिक ग्रांडील, बड़े भारी बलिष्ठ शरीरके होते हैं। स्काचोंकी अपेक्षा आइलैण्डवासी आइरिश लोग, रोटी आलू खाकर जीवन व्यतीत करते हैं, वे शारीरिक बल आदिकमें इनसे भी अधिक श्रेष्ठता रखते हैं।

डाक्टर लैम्ब — भी अपनी जांचमें उसी परिणाम तक पहुँचते हैं। उनका विचार है कि, केवल मांसाहारी लापलेण्डके रहनेवाले वह बहुत नाटे होते हैं उन्हींके बराबरीके जोतिन्सके लोग ठीक वैसेही जलपानीमें रहते हैं, नाज सब्जी आदिकके विशेष खानेसे स्वीडन और नारवेवालोंके समानही अच्छे डील डौलवाले होते हैं।

कतिपय चिन्ह — साधारण प्राकृतिक चिन्होंसे मनुष्यका मांस आहारी होना सिद्ध नहीं होता। क्योंकि, मनुष्यके शरीरसे उसी प्रकार पसीना निकलता है, जिस प्रकार कि, अन्य जीवधारियोंके शरीरसे निकलता है। मांस आहारी पशुओं के शरीरसे पसीना नहीं निकलता।

मांस आहारी पशु अपना भोजन चबाचबाकर नहीं करते पर मनुष्य अन्य घास आहारियों जीवधारियोंके समान चबा २ कर भोजन करता है। मनुष्य दूसरे घासाहारी जीवधारियोंके समान घूँटसे पानी पीता है पर मांस आहारी जीवधारी जिह्वासे चाट २ कर खाता है। मनुष्य दूसरे घासाहारी जीवधारियोंके

उसकी शक्ति पहाड़से ऊंटनी, उपसंहार

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समान मुखमें बहुत लार होता है। पर मांसाहारी जीवधारियोंके मुखमें लार होता ही नहीं ।

मस्तिष्कके बलकी अपेक्षासे — भी यह प्रकट होती है कि, मनुष्यको मांस खाना ठीक नहीं, क्योंकि, संसारमें जितने विद्वान् लोग हुये हैं उनमेंसे जिसकिसीने अपनी स्मरणशक्ति और बुद्धिमान्नीके बलसे नया २ प्रकाशन किया है तत्त्वविद्या के सुधारमें बहुत उत्पत्ति की है, उन लोगोंने या तो जीवनपर्यन्त अथवा अपने आयुका बड़ा हिस्सा मांस त्यागके संयममें ही रहकर बिताया है जैसे प्लेटों, प्ल्यूटार्क, डियोजिनज जेबू सेण्ट ग्राइसास्टम आदिने अपने जीवनका एक बड़ा हिस्सा इसी समयमें बिताया था, यह भी निश्चय किया गया है कि, सेण्टजेम्स भी रूमके तत्त्वज्ञानियोंमें शिरोमणि था और इसके अतिरिक्त और भी बहुतसे पाजों, जान डिलेली, बेन्जमिनफ्रांगलिन, इमिनपोल, सुबडनवर्ग जान हवर्ड, सर रिचार्ड फिलिप्स, शेली, वार्डस, बर्थ अलफन् जौडीटमर्टन आदिक ऐसे ही हुये हैं ।

स्वभावका परिवर्तन — जो जीवधारी मांसाहारी होते हैं वे स्वभावसे ही बड़े क्रोधी हत्यारे होते हैं, पर जो घास खानेवाले होते हैं वे गरीब शान्त एवं धीर स्वभावके होते हैं । तजुरबासे जाना गया है कि, मांसाहारी जड़ली जीवधारियों का भी मांस आदिक छुड़ाकर रोटी और दूध आदि खिलाया जाय तो प्रथम की अपेक्षासे उनका क्रोध और निर्भयता आदि इतनी कम हो जाती है इसी तरह कुत्ता बिल्ली भेड़ आदि बहुत शान्त निःक्रोध पशु हैं उनको मांस खिलाया जाय तो थोड़ेही दिनोंमें क्रोध और घातक बन जावेंगे इस तरह मांससे स्वभाव परिवर्तन हो जाता है ।

प्रकृतिका नियम — है इस कारण सभ्यताका भी यह जड़ है कि, किफायत शआर रहे इसके ध्यानसे भी मनुष्यको मांस खाना उचित नहीं। क्योंकि, मांसकी अपेक्षा सब्जी और नाज सस्ते मिलते हैं, अतः बुद्धि और सभ्यताके विरुद्ध है कि, एक सस्ते पदार्थको छोड़कर उससे खराब और मँहगे पदार्थ को ले ।

इधर उधरके प्रमाण ।

मुहम्मदीफकीर — जो शरअ मुहम्मदीके अनुसार भजन करते हैं, पर जब उनको कुछ प्रकाश हो जाता है तो मांसाहारको छोड़ देते हैं, कितनेक तो ऐसे हैं जो कि, उससे एकदम निवृत्त हो जाते हैं ।

मुहम्मदसाहिबका कथन — मैंने मुसलमानोंकी जबानी सुना था कि, मुहम्मद साहिब अपनी जबानसे कहा करते थे कि, यद्यपि हिन्दूत्व मुझमें नहीं हैं पर मैं उनमें हूँ। क्योंकि, वे लोग दयालू और उदार हैं। जहां दया है, वहां मैं हूँ । जो मुझमें अरबको लोग हैं उनमें मैं नहीं हूँ, क्योंकि, वे लोग कठोर निंदयी हैं ।

२० अध्याय । आदि मंगल

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शेखफरीदका भोजन - मुसलमानोंमें बड़े प्रतिष्ठित महात्मा हुये । बहुत दिनोंतक वृक्षकी पत्तियां खाकर तपस्या करते रहे । एक दिन अपनी माताके निकट गये । माताने पूछा, बेटा ! तू किस प्रकार भजन करता है ? उन्होंने उत्तर दिया कि, वृक्षोंकी पत्तियां खाकर रहता हूँ । माताने शेखजीके दो एकबाल पकड़के खींचे, तब वह सी ! सी !! करने लगे, माताने कहा, ऐ बेटा ! उनको इस प्रकार दुःख न होता होगा ? उस दिनसे शेखजीने वृक्षकी पत्तियां तोड़नी छोड़दी वे काठकी रोटियाँ बाँधे फिरा करते थे ।

शाहू बू अलीकलन्दरके - पांवमें कीड़े पड़ गये, कोई कीड़ा बाहर गिरता तो उसको उठाकर फिर रख लेते, कहते कि, ऐ भाई ! तू किधर जाता है, भूखा मरेगा, तेरा भोजन तो खुदानी यहाँही बनाया है ।

रघुकी दया - सुना था कि, महाराज ! रामचन्द्र रावणको मारकर अयोध्यामें आये । ऋषीश्वरोंसे पूछा कि, मैंने ऐसा कौनसा पुण्य किया था, जिसके बलसे बड़े बलवान शत्रुपर विजय प्राप्त की । ऋषीश्वरोंने उत्तर दिया कि, महाराज ! आपके प्रपिपामह महाराज रघु कहीं चले जाते थे, मार्गमें कुत्तेको तड़पते देखा, उसके शिरमें एक बड़ा कीड़ा पड़ गया था, जो कुत्तेके भेजाको नोच २ कर खाता था, इससे कुत्ता विकल होता था । राजाने वह कीड़ा उसके शिरसे निकाल दिया । कुत्ता सुखी हुआ, पर कीड़ा तड़प २ के मरने लगा । राजाने कीड़ेपर दया करके उसको अपनी जोंघ चौरकर उसमें रख लिया, कीड़ा जोंघमें जाकर सुखी हुआ । उस कीड़ाकी रक्षा करनेके कारण राजाको महान् पुण्य हुआ । उसीके प्रतापसे आपने शत्रुको जय किया ।

सुबुकुतगीनके शाहू होनेका कारण - इसीके अनुसार दूसरा दृष्टान्त लिखता हूँ । जो लेथबूज साहबके भारत इतिहासमें लिखा है कि अल्पतगीनका गुलाम सुबुकुतगीन था । एक दिन घोड़ेपर सवार हो शिकार खेलने गया । जंगलमें एक हरिणीको बच्चासहित देखकर विचार किया कि, बच्चेको जीवित पकड़कर ले चलूँ । घोड़ा बढ़ाकर जालसे बच्चेको पकड़ लिया, उसको लेकर बहुत दूर न गया होगा कि, पीछे फिरकर देखा कि, हरिणी बच्चेके लिये रोती चिल्लाती चली आती है । हरिणीकी इस दशाको देखकर सुबुकुतगीनके मनमें दया आई, बच्चेको छोड़ दिया । हरिणी बच्चा लेकर चली, जैसे जैसे आगे जाती थी पीछे फिर फिरकर देखती जाती थी, उसकी दृष्टिसे ऐसा प्रगट होता था कि, उपकारके बदले हृदयसे धन्यवाद और आशीर्वाद देती चली जाती है । उसी रातको सुबुकुतगीनने ऐसा स्वप्न देखा कि, एक फिरिस्ता उसके सिराने खड़ा होकर कहता है कि, सुबुकुत-

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गीन ! तूने जो हरिनीके बच्चेपर दया की उसके पलटेमें तुझको गजनीकी बादशाहत मिली । चाहिये कि, इसी प्रकार सब जीवधारियोंपर दया करता रहे इसके पश्चात् थोड़ेही दिनोंमें सुबुकुतगीन गजनीका बादशाह होगा ।

महापाप — मुसल्मान कहते हैं कि, हम अपना जबह किया हुआ हलाल समझते हैं, यह उनका कहना एकदम झूठ है । मुर्दा मछलीको किसने जबह किया । मुर्गी बतखके अण्डे आदिकके खानेके लिये कौनसा कलमा उतरा । अपने मारीको हलाल खुदाकी मारीको हराम कहना काफिरका काम है, जीवितको मार डालना महापाप है, जबहकी उसके जीवित करनेकी शक्ति नहीं रखते ।

कुत्तेके बचानेका महापुण्य — किताब दोस्तोंके दूसरे बाबमें यह कहानी लिखी है कि, एक भला आदमी जङ्गलमें चला जाता था. उसने एक कुत्तेको देखा कि, प्यासका मारा मर रहा है । उसने अपने शरसे टोपी लेकर पगड़ीमें बांध पानी भरा कुत्तेको पिलाया, कुत्तेके प्राण बच गये इस पुण्यके प्रतापसे उस समयके पैगम्बरको आकाशवाणी हुई कि, उस पुरुषको इतना पुण्य हुआ है कि, उसका सब पाप नष्ट हो गया । ध्यान देने योग्य बात है, जब एक जीवके बचानेसे इतना पुण्य हुआ तो जान मारनेसे कितना भारी पाप होता होगा ।

यथा-भिहिशती दर्दमन्दा हैं बुजुर्ग । नहीं इन्साँ बा आदते गुर्ग ।।

वही आदम वही हैवान हशरात । वही है और नहीं कुछ दूसरी बात ।।

मुंसी मिश्रका सच्चा सिद्धान्त — मुंसी मिश्र नामका एक बड़ा पण्डित बनारसमें आया । उसने मछलीको अपनी ध्वजामें बांधकर खड़ा कर दिया विज्ञापन दे दिया कि, यदि कोई पण्डित वेदशास्त्रके अनुसार मांस आहारको निषेध ठहरा दे तो मैं उसका सेवक बन जाऊँ । बनारसके सब पण्डितोंने बहुत युक्तियाँ की पर वह परास्त नहीं हुआ । एक दिन पण्डित लोग विचार करके ठीक उसी समय जब कि, गङ्गामें स्नान कर रहा था, उसके पास गये । जाकर कहा कि, महाराज ! इस समय आप गङ्गामें खड़े हैं सत्य कहिये मांस खाना उचित है कि, अनुचित ? मिश्रने कहा कि, जब आप लोग वेदशास्त्रके आधारसे परास्त न कर सकते तो धर्मबद्ध करके परास्त करने आये हैं, अब मैं सत्य कहता हूँ कि, मांस खाना बड़ा भारी पाप है, इतना कह उसी समय पण्डितने मांस त्याग दिया कण्ठी बांधकर बैष्णव हो गया ।

घृणित दुर्गन्धि — मांस आहारी मनुष्य और पशुके शरीरसे ऐसी दुर्गन्धि निकलती है जिससे महाघृणा होती है ।

महात्मा और राजा — एक राजा आखेटको गया, बहुतसी शिकार मारकर

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कितनेको जीवित पकड़कर ले चला । रास्तेमें एक महात्मा बैठे, हुआ था. बादशाह उसके निकट जा दण्डवत् करके प्रतिष्ठासे बैठ गया । फिर पूछा की महाराज ! कुछ सेवाकी आज्ञा हो. महात्मा उठा बादशाहकी मोछोंसे २-३ बालोंको पकड़कर उखाड़ लिया. बादशाहको बहुत दुःख हुआ. आज्ञा दी कि, इस फकीरको मार डालो । तब महात्माने कहा, ऐ बादशाह सबकी जान एक समान है. तूने इतने जीवोंको मारा कैद किया है, क्या उनको दुःख नहीं होता होगा ? उनका दुःख परमात्मा न सुनेगा ? इसी प्रकार महात्माने बादशाहको समझाया तो समझ गया, कठोरताके ऐसे कामको छोड़ दिया । उस दिनसे किसी जीवको दुःख न देनेका प्रण करके महात्माका शिष्य होगया ।

कबीर साहिब—भी अहिंसकोंके आशीर्वादमें सर्वशक्ति मानते हैं कि

सूखी अस्थिनको चुमे, जीव न सतावे कोय ।

ता पक्षीकी छाँहतर, क्यों न छत्रपति होय ॥

मांसमें शूरता नहीं—जो लोग ऐसा ध्यान करते हैं कि, मांस खाने और मदिराके सेवन करनेसे मनुष्यमें बल बढ़ता है, शूरता आती है, वे बहुत झूलमें हैं । उनको उचित है कि मुर्गा, बटेरे, बुलबुल आदिककी भयानक लड़ाई देखें मुर्गा और बटेरे लड़ते २ मर जाते हैं पर रणको नहीं छोड़ते । इस प्रकरणमें अबतक जो कुछ निरूपण किया गया है उसीका सार निम्नके गजलमें दिये देते हैं—

गजल—करेगा मिहर जो उसपर मिहर है । क्रहरके एवजमें बेझक क्रहर है ॥

बहर जांदारमें रुहे इलाही । वही रहमान म्यानैं जेरो जबर है ॥

किसीके खूनका बदला न छूटे । सभीके साथ दावर दाद गर है ॥

करम और फ़जल सबपर हैं उसीका । सिताना गैर जाँका पुरखतर है ॥

मिहरबां बाप सारे खल्कका वह । मुसीबत और बला जालिम उपर है ॥

हिसाबोंमें पड़े अमलोंके सारे । न छूटे राम ब्रह्मा विष्णु हर है ॥

न बे गुरज़ान कोई राह पावे । भटकता फिरता यह जीव दर बहर है ॥

है वे मुरशिदके जाहिल आदमी यह । न मर्दुम है वही बेदुमका खर है ॥

हशरके रोज़ खुश मज़लूम सारे । बहर जानिवसे जालिमको ज़रर है ॥

जो खाया गोश्त औरोंका भरजोर । न खा क्यों गोश्त अपना पेटभर है ॥

महासिब रूबरू मालूम होगा । तेरा आमाल नामा हाथ धर है ॥

जिसकी तरफसे दुनियामें है जब । खुदात आलाका वह भी एक नफ़र है ॥

वह भी बन्दा तू बन्दा हो न गन्दा । अता तुझको हुई तेगे ज़फ़र है ॥