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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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वाममागियोंसे तुलना — हिन्दुओंमें वाममागों लोग मदिरा, मांस, व्यभिचार सब कुछ कर लेते हैं। सुमिरण पढ़नेसे पाक होजाते हैं, उन नीचोंसे उनको सुमिरणका हाल पूछा जाय उसका अर्थ विचारा जाय, तो मालूम होगा कि, उस सुमिरण बनानेवाले महान् अत्याचारी, व्यभिचारी, जगत्की मर्यादा भ्रष्ट करनेवाले, महान् विषयी, मांसाहारी और मद्यप वाममागोंही निकलेंगे ।

समभाव — आदमीकी चार लाख योनि है । अस्सीलाख दूसरे योनिके जीवधारी हैं, सबमें एकही आत्मा है । सबको एक समानही दुःख सुख हैं, जिन जीवधारियोंमें रक्त और श्वासका सम्बन्ध है वे सब एक समानही दुःख दर्दके लिये चिल्लाते हुए दुःखी होते हैं । सब जीवधारियोंकी बहुतसी बातों में समानता के कारण भाई २ के समान सम्बन्ध है । जो भाईपर दया न करेगा वह कदापि मनुष्य नहीं कहला सकता ।

ऊँचनीच — जड़म स्थावर जीवोंसे संसारको लाभ पहुँचता है, वे सब शुद्ध पुण्यआत्मा हैं, जिनसे संसारको हानि पहुँचती है वे पापी हैं और अशुद्ध हैं । साधु विद्वान्, राजा, बादशाह, शूर, बीर, दानी, उदार आदि मनुष्य श्रेष्ठ गिने जाते हैं । पशुओंमें गाय, भैंस, घोड़ा, बकरी आदि—श्रेष्ठ हैं, रेशम तसरके कीड़े शहतकी मखली आदि कीड़ोंमें श्रेष्ठ हैं । स्थावरोंमें फलवान् वृक्ष और जड़ी, बूटी आदि सब शुद्ध और पुण्यात्मा समझे जाते हैं । अत्याचार करनेवाले, व्यर्थही रक्तपात करनेवाले, निरपराधोंको दुःख देनेवाले सब पापी अशुद्ध और नारकी हैं ।

झूठा दावा — कितने मांसअहारी दावा करते हैं कि, हम विद्या और बुद्धिमें मांस त्यागियोंसे कम नहीं हैं, पर यह उनकी निरा मूर्खता है। इतनी बात अवश्य है कि, ऐसे लोग सांसारिक विद्याके किसी किसी अंशमें चतुर होते हैं, सो भी सब अंशोंमें नहीं, पारलौकिक विद्यामें तो उनको सुधही क्या होनी थी ।

शुद्धोंके लिये नहीं — जिन जो लोग मांस खाते हैं, उन्हीं लोगोंके लिये मांस खाने तथा रक्तपात करनेकी आज्ञा उत्तरी और उत्तरा करती है । मांस त्यागी शुद्ध पुरुषोंके पास ईश्वर खुदा अथवा किसी देवताकी मांस खानेकी आज्ञा कभी नहीं उत्तरी, न उत्तरती है और न उत्तरनेकी आशा ही है । प्रत्येक मनुष्य दूसरोंको अपने रङ्ग ढङ्गका बनाना चाहता है ।

हिन्दू शब्दका अर्थ — महाभारत, योगवासिष्ठ और भारतीय प्राचीन इतिहास देखने और पुराणोंके पढ़नेसे मालूम होता है कि, हिन्दू एक प्रबल प्रभावशाली और विजयी जाति थी । इसका कारण भी यही प्रतीत होता है कि, प्राचीन-