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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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समान मुखमें बहुत लार होता है। पर मांसाहारी जीवधारियोंके मुखमें लार होता ही नहीं ।

मस्तिष्कके बलकी अपेक्षासे — भी यह प्रकट होती है कि, मनुष्यको मांस खाना ठीक नहीं, क्योंकि, संसारमें जितने विद्वान् लोग हुये हैं उनमेंसे जिसकिसीने अपनी स्मरणशक्ति और बुद्धिमान्नीके बलसे नया २ प्रकाशन किया है तत्त्वविद्या के सुधारमें बहुत उत्पत्ति की है, उन लोगोंने या तो जीवनपर्यन्त अथवा अपने आयुका बड़ा हिस्सा मांस त्यागके संयममें ही रहकर बिताया है जैसे प्लेटों, प्ल्यूटार्क, डियोजिनज जेबू सेण्ट ग्राइसास्टम आदिने अपने जीवनका एक बड़ा हिस्सा इसी समयमें बिताया था, यह भी निश्चय किया गया है कि, सेण्टजेम्स भी रूमके तत्त्वज्ञानियोंमें शिरोमणि था और इसके अतिरिक्त और भी बहुतसे पाजों, जान डिलेली, बेन्जमिनफ्रांगलिन, इमिनपोल, सुबडनवर्ग जान हवर्ड, सर रिचार्ड फिलिप्स, शेली, वार्डस, बर्थ अलफन् जौडीटमर्टन आदिक ऐसे ही हुये हैं ।

स्वभावका परिवर्तन — जो जीवधारी मांसाहारी होते हैं वे स्वभावसे ही बड़े क्रोधी हत्यारे होते हैं, पर जो घास खानेवाले होते हैं वे गरीब शान्त एवं धीर स्वभावके होते हैं । तजुरबासे जाना गया है कि, मांसाहारी जड़ली जीवधारियों का भी मांस आदिक छुड़ाकर रोटी और दूध आदि खिलाया जाय तो प्रथम की अपेक्षासे उनका क्रोध और निर्भयता आदि इतनी कम हो जाती है इसी तरह कुत्ता बिल्ली भेड़ आदि बहुत शान्त निःक्रोध पशु हैं उनको मांस खिलाया जाय तो थोड़ेही दिनोंमें क्रोध और घातक बन जावेंगे इस तरह मांससे स्वभाव परिवर्तन हो जाता है ।

प्रकृतिका नियम — है इस कारण सभ्यताका भी यह जड़ है कि, किफायत शआर रहे इसके ध्यानसे भी मनुष्यको मांस खाना उचित नहीं। क्योंकि, मांसकी अपेक्षा सब्जी और नाज सस्ते मिलते हैं, अतः बुद्धि और सभ्यताके विरुद्ध है कि, एक सस्ते पदार्थको छोड़कर उससे खराब और मँहगे पदार्थ को ले ।

इधर उधरके प्रमाण ।

मुहम्मदीफकीर — जो शरअ मुहम्मदीके अनुसार भजन करते हैं, पर जब उनको कुछ प्रकाश हो जाता है तो मांसाहारको छोड़ देते हैं, कितनेक तो ऐसे हैं जो कि, उससे एकदम निवृत्त हो जाते हैं ।

मुहम्मदसाहिबका कथन — मैंने मुसलमानोंकी जबानी सुना था कि, मुहम्मद साहिब अपनी जबानसे कहा करते थे कि, यद्यपि हिन्दूत्व मुझमें नहीं हैं पर मैं उनमें हूँ। क्योंकि, वे लोग दयालू और उदार हैं। जहां दया है, वहां मैं हूँ । जो मुझमें अरबको लोग हैं उनमें मैं नहीं हूँ, क्योंकि, वे लोग कठोर निंदयी हैं ।