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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( ६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तन्त्रोंको निर्माणकर उन राजकुमारोंको पढ़ाये । वेभी उनको पढ़कर छः महीनेमें,
जैसा कहाथा वैसेहुए । उस दिनसे यह पंचतन्त्र नामक नीतिशास्त्र बालकोंके-
ज्ञानके निमित्त पृथ्वीमें विख्यात हुआहै बहुत क्या-
अधीते य इदं नित्यं नीतिशास्त्रं शृणोति च ।
न पराभवमाप्नोति शक्रादपि कदाचन ॥ १० ॥
कथामुखमेतत् ।
जो इस नीतिशास्त्रको पढता और सुनताहै, वह कभी इन्द्रसेभी पराभवको
प्राप्त नहीं होताहै ॥ १० ॥
इति पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतायां पञ्चतंत्रभाषाटीकायां कथामुखं समाप्तम् ।
अथ मित्रभेदोनाम प्रथमं तंत्रम् ।
अथातः प्रारभ्यते मित्रभेदा नाम प्रथमं तन्त्रम् । यस्याय-
मादिमः श्लोकः-
इसके अनन्तर मित्रभेद नामवाला प्रथम तन्त्रका प्रारम्भ करते हैं ।
जिसकी आदिमें यह श्लोकहै-
वर्द्धमानो महान्स्नेहः सिंहगोवृषयोर्वने ।
पिशुनेनातिलुब्धेन जम्बुकेन विनाशितः ॥ १ ॥
सिंह और बैलका वनमे वढाहुआ महास्नेह चुगुल लालची जम्बुक (गिदड)
ने विनाशकर दिया ॥ १ ॥
तद्यथा अनुश्रूयते-अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं
नाम नगरम् । तत्र धर्मोपार्जितभूरिविभवो वर्द्धमानको नाम
वणिक्पुत्रो बभूव । तस्य कदाचिद्रात्रौ शय्यारूढस्य चिन्ता
समुत्पन्ना । "यत्प्रभूतेऽपि वित्ते अर्थोपायाश्चिन्तनीयाः कर्त्त-
व्याश्चेति । यत उक्तञ्च-
सो यह सुनाजाता है कि, दक्षिण देशमें महिलारोप्यनाम एक नगर है वहां
धर्मसे महाधन उपार्जन कर्ता वर्द्धमान नामक वणिक् पुत्र था। उसको एक समय

भाषाटीकासमेतम् । (७)
रात्रीमे खाटमें लेटेहुए चिन्ता उत्पन्न हुई; कि "बहुत धन उत्पन्न होनेपरभी
धनप्राप्तिका उपाय चिन्ता करना चाहिये कहाभी है-
न हि तद्विद्यते किञ्चिद्यदर्थेन न सिद्धयति ।
यत्नेन मतिमाँस्तस्मादर्थमेकं प्रसाधयेत् ॥ २ ॥
ऐसी कोई वस्तु नही जो अर्थसे सिद्ध न होती हो इस कारण बुद्धिमान्
यत्नसे अर्थका उपार्जन करे ॥ २ ॥
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।
यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥ ३ ॥
जिसके धन है उसके मित्र हैं, जिसके धन है उसके बंधु हैं, जिसके धन
है लोकमे वही पुरुष है, जिसके धन है वही पंडित है ॥ ३ ॥
न सा विद्यां न तद्दानं न तच्छिल्पं न सा कला ।
न तत्स्थैर्य्यं हि धनिनां याचकैर्यन्न गीयते ॥ ४ ॥
न वह विद्याहै, न वह दान है, न वह कारीगरी है, न वह कला है, न वह
धनियोंकी स्थिरता है, जिसको याचक न गाते हो ॥ ४ ॥
इह लोके हि धनिनां परोऽपि स्वजनायते ।
स्वजनोऽपि दरिद्राणां सर्वदा दुर्जनायते ॥ ५ ॥
इस लोकमें धनियोंके गैरभी स्वजन होजाते हैं, दरिद्रोंके कुटुम्बी भी सदा
दुर्जन होजाते हैं ॥ ५ ॥
अर्थेभ्योऽपि हि वृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्यस्ततस्ततः ।
प्रवर्त्तन्ते क्रियाः सर्वाः पर्वतेभ्य इवापगाः ॥ ६ ॥
धनके बढनेसे और इधर उधर इकट्ठे होनेसे सब क्रिया प्रवृत्त होती हैं,
जैसे पर्वतोसे नदिया (निकल कर सब कार्य पूर्ण करती हैं) ॥ ६ ॥
पूज्यते यदपूज्योऽपि यदगम्योऽपि गम्यते ।
वन्द्यते यदवन्द्योऽपि स प्रभावो धनस्य च ॥ ७ ॥
अपूज्यभी (धनसे) पूजित होता है, अगम्यकें निकटभी जाया जाता है,
अनमस्कारी पुरुषभी वन्दन योग्य होता है, यह प्रभाव धनकाही है ॥ ७ ॥
अशनांदिन्द्रियाणीव स्युः कार्याण्यखिलान्यपि ।
एतस्मात्कारणाद्वित्तं सर्वसाधनमुच्यते ॥ ८ ॥