पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( ३२४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३२४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
यत् राज्याभिषेको मे विघ्नितः । तद् अद्य प्रभृति सान्वयमा-
वयौर्वैरं सञ्जातम् । उक्तञ्च-
तुमभी इस दिनके अन्धे क्षुद्र अर्थपतिको प्राप्त हो रात्रिके अन्धे होकर
शशक कार्पञ्जलके मार्गको जाओगे । ऐसा जानकर जो उचित हो सो करो "
तब उसके इस वचनको सुनकर कि "इसने अच्छा कहा" ऐसा कह
"फिरभी राजाके निमित्त मिलकर सम्मति करेंगे" ऐसा कह कर सब पक्षि
यथेष्ट स्थानमें गये, केवल यही भद्रासनमें बैठा अभिषेकमें अभिमुख कृकालि-
काके साथ रहगया । बोलाभी- "भो ! कोई यहां है ? क्यों अबतक मेरा अभि-
षेक नहीं करते ?" यह सुनकर कृकलाने कहा- "भद्र ! तुम्हारे अभि-
षेकमें काकने विघ्न किया है । गये सब पक्षी यथेच्छ दिशाओंमें । केवल यह
एक वायसही किसी निमित्तसे यहां स्थित है। सो जल्दी उठो जिससे मैं तुम्हारे
आश्रयमें तुमको प्राप्त करूं" । यह सुन विषादपूर्वक उलूक वायससे बोला-
"भो ! भो ! दुष्टात्मन् ! मैंने तेरा क्या अपकार किया है ? जो मेरे राज्या-
भिषकमे तैने विघ्न किया सो आजसे हमारा तेरे वंशके सहित वैर हुआ। कहा है-
रोहति सायकैर्विद्धं छिन्नं रोहति चासिना ।
वचोदुरुक्तं बीभत्सं न प्ररोहति वाक्क्षतम् ॥ ११२ ॥ "
शरसे विद्धहुए वृक्षादि फिर जमते हैं तलवारसे छिन्न हुआभी फिर उत्पन्न
होताहै ( अथवा इन दोनोके घाव भर जातेहै ) परन्तु वाणीके वेध अथवा
घृणित वचनके वेध फिर नहीं भरतेहै ॥ ११२ ॥"
इति एवमभिधाय कृकालिकया सह स्वाश्रयं गतः । अथ
भयव्याकुलो वायसो व्यचिन्तयत् । "अहो ! अकारणं वैर-
मासादितं मया । किमिदं व्याहृतम् । उक्तञ्च-
यह कह कृकलाके साथ अपने आश्रयको गया । तब भयसे व्याकुल हो
वायस विचारने लगा । "अहो मैने अकारण वैर किया। यह क्या कहा। कहा है-
अदेशकालज्ञमनायतिक्षमं
यदप्रियं लाघवकारि चात्मनः ।
योऽत्राब्रवीत्कारणवर्जितं वचो
न तद्वचः स्याद्विषमेव तद्वचः ॥ ११३ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( ३२५ )
देशकालके न जाननेवाले परिणाममे कटु जो अप्रिय अपनेको लघु करने-
वाला कारण रहित बचन बोलता है वह बचन नही किन्तु विष है ॥ ११३ ॥
बलोपपन्नोऽपि हि बुद्धिमान्नरः
परं नयेन्न स्वयमेव वैरिताम् ।
भिषङ्गममास्तीति विचिन्त्य भक्षये-
दकारणात्को हि विचक्षणो विषम् ॥ ११४ ॥
बुद्धिमान् मनुष्य बलको प्राप्त हुआभी स्वय दूसरेको अपना शत्रु न बनावे
मेरा चिकित्सक है ऐसा विचार कोई अकारण विषको नहीं खाता है॥ ११४ ॥
परपरिवादः परिषदि न कथञ्चित्पण्डितेन वक्तव्यः ।
सत्यमपि तन्न वाच्यं यद्युक्तमसुखावहं भवति ॥ ११५ ॥
सभामें पराई निन्दा पडितको किसी प्रकार कहनी उचित नहीं है जो कहने-
से दूसरेको बुरी लगे वह सत्य हो तो भी न कहे ॥ ११५ ॥
सुहृद्भिरातैरसकृद्विचारितं
स्वयञ्च बुद्ध्या प्रविचारिताश्रयम् ।
करोति कार्य्यं खलु यः स बुद्धिमान्
स एव लक्ष्म्या यशसाञ्च भाजनम् ॥ ११६ ॥ ”
सुहृद् और आप्त पुरुषोंसे बारंबार विचार किये हुए तथा अपनी बुद्धिसे
विचार कर जो कार्य करता है वही बुद्धिमान् है वही लक्ष्मी और यशका
पात्र होता है ॥ ११६ ॥ ”
एवं विचिन्त्य काकोऽपि प्रयातः । तदा प्रभृति अस्माभिः
सह कौशिकानाम् अन्वयगतं वैरमस्ति ? ” मेघवर्ण आह-
“तात ! एवं गते अस्माभिः किं कृत्यमस्ति” । स आह,-
“वत्स ! एवं गतेऽपि षाड्गुण्यात् अपरः स्थूलोऽभिप्रायोऽस्ति
तमङ्गीकृत्य स्वयमेव अहं तद्विजयाय यास्यामि रिपून् वञ्च-
यित्वा वधिष्यामि । उक्तञ्च यतः-
ऐसा विचार कर काकभी चला गया । उस दिनसे हमारे साथ उल्लुओंका
वंशक्रमागत वैर है”। मेघवर्ण बोला,-“तात ऐसा होनेमे हमको क्या कर्तव्य है”।
वह बोला-“वत्स ऐसा होनेमें भी षट् सन्धि आदिके सिवाय एक महान् अन्य