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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( ३०४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ३०४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
खबर नहीं । सो कैसे उसका छिद्र जानूं” । स्थिरजीवी बोला-“वत्स ! स्थानही
नहीं उसका छिद्रभी दूतोंद्वारा प्रगट करूंगा । कहाहै-
गावो गन्धेन पश्यन्ति वेदैः पश्यन्ति वै द्विजाः ।
चारैः पश्यन्ति राजानश्चक्षुर्भ्यामितरे जनाः ॥ ६५ ॥
गौ गन्धसे देखती हैं, ब्राह्मण वेदसे देखते हैं, राजा दूतोंसे देखते हैं, दूसरे
जन नेत्रोंसे देखते हैं ॥ ६५ ॥
उक्तञ्चात्र विषये,-
इस विषयमें कहाहै-
यस्तीर्थानि निजे पक्षे परपक्षे विशेषतः ।
गुप्तैश्चारैर्नृपो वेत्ति न स दुर्गतिमाप्नुयात् ॥ ६६ ॥
जो दूतों द्वारा अपने पक्षके तीर्थ ( अठारह स्थान ) जानता है वह राजा
दुर्गति को प्राप्त नहीं होता ॥ ६६ ॥”
मेघवर्ण आह-“तात ! कानि तीर्थानि उच्यन्ते कति
संख्यानि च, कीदृशाः गुप्तचराः, तत्सर्वं निवेद्यताम्”
इति । स आह-“अत्र विषये भगवता नारदेन यु-
धिष्ठिरः प्रोक्तः। यच्छत्रुपक्षेऽष्टादशतीर्थानि स्वपक्षे पञ्च-
दश । त्रिभिः त्रिभिः गुप्तचरैस्तानि ज्ञेयानि । तैः ज्ञातैः
स्वपक्षः परपक्षश्च वश्यो भवति । उक्तञ्च नारदेन युधि-
ष्ठिरं प्रति-
मेघवर्ण बोला,-“तात ! तीर्थ किनको कहते हैं ? उनकी कितनी संख्या
है ? गुप्तचर कैसे होते हैं सो आप कहिये” वह बोला-“इस विषयमे भगवान्
नारदने युधिष्ठिरसे कहाहै । कि, शत्रुपक्षमें अठारह तीर्थ अपने पक्षमें पन्द्रह
होते हैं । तीन २ गुप्त चरोंसे जानने चाहिये । उनके ज्ञानसे अपना पराया पक्ष
वशमें होता है । नारदने युधिष्ठिरसे कहा है-
कच्चिदष्टादशान्येषु स्वपक्षे दशपंच च ।
त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैर्वेत्सि तीर्थानि चारकैः ॥ ६७ ॥
तीन २ गूढ दूतोंसे शत्रुपक्षमें अठारह और अपने पक्षमें पन्द्रह तीर्थ
जानना ॥ ६७ ॥

भाषाटीकासमेतम् । ( ३०५ )
तीर्थशब्देन अयुक्तकर्माभिधीयते तद्यदि तेषां कुत्सितं भव-
ति तत्स्वामिनोऽभिघाताय भवति । प्रधानं भवति तद्वृद्धये
स्यादिति । तद्यथा- मन्त्री पुरोहितः सेनापतिर्युवराजो दौवा-
रिकोऽन्तर्वासिकः प्रशासकः समाहर्तृसन्निधातृप्रदेष्टृज्ञापकाः
साधनाध्यक्षो गजाध्यक्षः कोषाध्यक्षो दुर्गपालकरपालसी-
मापालप्रोत्कटभृत्याः एषां भेदेन द्राक् रिपुः साध्यते स्वपक्षे
च देवी जननी कंचुकी मालिकः शय्यापालकः स्पर्शाध्यक्षः
सांवत्सरिको भिषग्जलवाहकः ताम्बूलवाहकः आचार्योऽ-
ङ्गरक्षकः स्थानचिन्तकः छत्रधरो विलासिनी एषां वैरद्वारेण
स्वपक्षे विघातः । तथा च-
तीर्थशब्दसे शत्रुके जय करनेका उपायरूप कर्म जानना । सो यदि वह कर्म
उनका कुत्सितहो तो स्वामीके नाशके निमित्त होताहै । प्रधान हो तो उसकी
वृद्धिके निमित्त होता है । सो जैसे मन्त्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, द्वारपाल,
अन्त पुरचारी, शासनकर्ता, करसंग्रहकर्ता, सदा निकटवर्ती, प्रदेष्टा ( प्रदर्शक ),
ज्ञापक ( सम्वादलेजानेवाला ), साधनाध्यक्ष ( सेनापति ), गजाध्यक्ष, खजांची,
दुर्गरक्षक, कररक्षक, सीमापालक, प्रवल कर्मचारी इनके भेदसे शीघ्रही शत्रु
वशीभूत होजाताहै। ओर अपने पक्षमें रानी, माता, कंचुकी, अन्त:पुरचारी वृद्ध,
( विप्रगुणोंसे युक्त ), मालाकार, सेजकी रक्षाकरनेवाला, स्पर्शाध्यक्ष ( सुगन्धि-
लगानेवाला ), ज्योतिषी, वैद्य, पनिहारा, ताम्बूलदाता, गुरु, शरीररक्षक,
स्थानके सद् असद्का ज्ञाता, छत्रधारण करनेवाला, वेश्या इनके वैरविरोधसे
निजपक्षका घात होताहै । तथाच-
वैद्यसांवत्सरिकाचार्याः स्वपक्षेऽधिकृताश्चराः ।
यथाहितुण्डिकोन्मत्ताः सर्वं जानन्ति शत्रुबु ॥ ६८ ॥
वैद्य, ज्योतिषी, गुरु, अपने पक्षके अधिकारी चर, आहितुण्डिकसे उन्मत्त
विप्रवैद्य गूढचारी शत्रु का सब भेद जानतेहैं ॥ ६८ ॥
तथाच-
तैसेही-
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