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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

(२९८) पञ्चतन्त्रम् ।

(२९८) पञ्चतन्त्रम् ।
युद्धयतेऽहंकृतिं कृत्वा दुर्बलो यो बलीयसा ।
स तस्य वाञ्छितं कुर्यादात्मनश्च कुलक्षयम् ॥ ४३ ॥
जो दुर्बल अहंकारसे प्रबल शत्रुके साथ युद्ध करता है वह उस (शत्रु) का
मनोरथ पूर्ण और अपना कुलक्षय करता है ॥ ४३ ॥
तद्बलवताभियुक्तस्य अपसरणसमयोऽयं न सन्धेर्विग्र-
हस्य च । एवमनुजीवियमन्त्रोऽपसरणस्य” । अथ तस्य
वाक्यं समाकर्ण्य प्रजीविनमाह-“भद्र ! त्वमपि आ-
त्मनोऽभिप्रायं वद ?” । सोऽब्रवीत्,-“देव ! मम सन्धि-
विग्रहयानानि त्रीणि अपि न प्रतिभान्ति विशेषतश्च
आसनं प्रतिभाति ।” उक्तञ्च यतः-
सो बलवान्से अभियुक्त होनेसे यह तुम्हारे पयानका समय है । सन्धि विग्र-
हका नहीं इस प्रकार अनुजीवीका मन्त्र अनुसरणका है” । तब उसके वाक्य
सुनकर (वायसराज) प्रजीवीसे बोला,-“भद्र ! तू भी अपने अभिप्रायको
कथन कर”। वह बोला,-“देव ! मुझको सन्धि, विग्रह, यान (समयकी प्रतीक्षा
करनेको आसन कहते हैं ) ( १ ) तीनोंही नही रुचते हैं विशेष कर आसन
अच्छा विदित होता है । कारण कहा है कि-
नक्रः स्वस्थानमासाद्य गजेन्द्रमपि कर्षति ।
स एव प्रच्युतः स्थानाच्छुनापि परिभूयते ॥ ४४ ॥
अपने स्थानमें स्थित नक्र गजेन्द्रकोभी खैंचलेता है और अपने स्थानस
च्युत हुआ वही कुत्तेसे भी तिरस्कृत हो जाताहै ॥ ४४ ॥
अन्यच्च-
औरभी-
अभियुक्तो बलवता दुर्गे तिष्ठेत्प्रयत्नवान् ।
तत्रस्थः सुहृदाह्वानं प्रकुर्वीतात्ममुक्तये ॥ ४५ ॥
जो बलवान्से अभियुक्त होकर यत्नसे अपने दुर्गमें स्थित रहता है और
वहीं स्थित होकर अपने छुटकारेके निमित्त सुहृदोंको बुलावे ॥ ४५ ॥
१ शत्रुके प्रति यात्रा करना ।

भाषाटीकासमेतम्। (२९९)
यो रिपोरागमं श्रुत्वा भयसन्त्रस्तमानसः ।
स्वस्थानं सन्त्यजेत्तत्र न स भूयो वसेन्नरः ॥ ४६ ॥
जो शत्रु का आगमन सुनकर, भयसे सन्तस्तमन होकर अपने स्थानको
त्याग न कर देता है वह वहा फिर नहीं बस सकता है ॥ ४६ ॥
दंष्ट्राविरहितः सर्पो मदहीनो यथा गजः ।
स्थानहीनस्तथा राजा गम्यः स्यात्सर्वजन्तुषु ॥ ४७ ॥
डाढसे हीन जैसे सर्प, मदसे हीन जैसे हाथी तैसेही स्थानभ्रष्ट राजा सब
जन्तुओंके गम्य होता है ॥ ४७ ॥
निजस्थानस्थितोऽप्येकः शतं योद्धुं सहेन्नरः ।
शक्तानामपि शत्रूणां तस्मात्स्थानं न सन्त्यजेत् ॥ ४८ ॥
अपने स्थानमें स्थित हुआ एकही सौ समर्थ शत्रुओको युद्धमें सहन कर
सकता है इस कारण अपना स्थान त्याग न करे ॥ ४८ ॥
तस्माद्दुर्गं दृढं कृत्वा सुभटासारसंयुतम् ।
प्राकारपरिखायुक्तं शस्त्रादिभिरलंकृतम् ॥ ४९ ॥
इस कारण किलेको दृढ अपने योधायों के बलसे सयुक्त पर कोटा खाईसे-
युक्त शस्त्रादिसे अलकृत कर ॥ ४९ ॥
तिष्ठ मध्यगतो नित्यं युद्धाय कृतनिश्चयः ।
जीवन्सम्प्राप्स्यसि क्ष्मान्तं मृतो वा स्वर्गमेष्यसि ॥ ५० ॥
युद्धके निमित्त निश्चय करके उसके मध्यमें नित्यही स्थित हो जीनेसे
सम्पूर्ण पृथ्वी की प्राप्ति और मरनेपर स्वर्ग प्राप्त होगा ॥ ५० ॥
अन्यच्च-
औरभी-
बलिनापि न बध्यन्ते लघवोऽप्येकसंश्रयाः ।
विपक्षेणापि मरुता यथैकस्थानवीरुधः ॥ ५१ ॥
कहा है कि, यदि लघु एकताको प्राप्त हो जावे तो बलवानसे नहीं बध सक्ते-
जैसे प्रतिकूल वायुसे एक स्थानके वृक्ष ॥ ५१ ॥

  • महानप्येकजो वृक्षो बलवान्सुप्रतिष्ठितः ।
    प्रसह्य इव वातेन शक्यो धर्षयितुं यतः ॥ ५२ ॥