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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( २५८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( २५८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
उत्साहसे युक्त, आलस्यरहित, क्रियाविधिका ज्ञाता, व्यसनमें न लगनेवाले,
शूर, कृत्यको जाननेवाले, दृढ सौहार्दवाले पुरुषको लक्ष्मी निवासके लिये स्वयं
ढूंढती है ॥ १३१ ॥
अपरं प्राप्तोऽपि अर्थः कर्मप्राप्त्या नश्यति । तद् एतावन्ति
दिनानि त्वदीयमासीत् । मुहूर्त्तमपि अनात्मीयं भोक्तुं न
लभ्यते । स्वयमागतमपि विधिनापह्रियते ।
औरभी यह कि, प्राप्त हुआ धन कर्मवशसे नष्ट होजाता है सो इतने दिन-
तक तुम्हारे निकट धन रहना था, पराया धन कोई एक मुहूर्त नहीं भोग सक्ता ।
स्वयं आया हुआ भी प्रारब्धसे हरण होजाता है ।
अर्थस्योपार्जनं कृत्वा नैव भोगं समश्नुते ।
अरण्यं महदासाद्य मूढः सोमिलको यथा ॥ १३२ ॥”
कोई धन उपार्जन करकेभी उसको नहीं भोग सक्ता जैसे महाधनको
प्राप्त होकर मूढ सोमिलक ॥ १३२ ॥”
हिरण्यक आह,–“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्–
हिरण्यकने कहा,–“यह कैसी कथा ?” वह बोला–
कथा ५.
कस्मिंश्चिदधिष्ठाने सोमिलको नाम कौलिको वसति
स्म । स च अनेकविधपट्टरचनारञ्जितानि पार्थिवोचितानि
सदा एव वस्त्राणि उत्पादयति । परं तस्य च अनेकविधपट्ट-
रचनानिपुणस्यापि न भोजनाच्छादनाभ्यधिकं कथमपि
अर्थमात्रं सम्पद्यते । अथ अन्ये तत्र सामान्यकौलिकाः
स्थूलवस्त्रसम्पादनविज्ञानिनो महर्द्धिसम्पन्नाः तानवलोक्य
स स्वभार्यामाह,–“ प्रिये ! पश्य एतान् स्थूलपट्टकार-
कान् धनकनकसमृद्धान् । तद्धारणकं मम एतत्स्थानं तद्-
न्यत्र उपार्जनाय गच्छामि” । सा आह–“भोः प्रियतम !
मिथ्याप्रलपितमेतद्यदन्यत्र गतानां धनं भवति, स्वस्थाने
न भवति । उक्तञ्च–

भाषाटीकासमेतम् । ( २९९ )
किसी स्थानमें सोमिलक नाम कौलिक रहता था, वह अनेक प्रकार पटर-
चनासे रजित राजाओंके योग्य वस्त्र सदा बनाता था और उसके अनेकविध पट-
रचनामें निपुण होकरभी भोजनाच्छादनसे अधिकधन न प्राप्त होता और दूसरे
साधारण जुलाहे मोटे वस्त्र बुनना जानने वाले बडे धनवाले थे । उनको देखकर
यह अपनी भार्यासे बोला,–“प्रिये ! इन मोटे कपडे बनाने वालोंको देखो जो
धन सुवर्णसे सम्पन्न हैं । सो यह स्थान हमको लेना फागना नहीं है । सो और
स्थानमें धन उपार्जनके निमित्त जाताहू ” । वह बोली,--“ भो प्रियतम ! यह
सब मिथ्या प्रलाप है जो और स्थानमे जाकर धन होता है अपने स्थानमे नहीं
होता । कहा है-
उत्पतन्ति यदाकाशे निपतन्ति महीतले ।
पक्षिणां तदपि प्राप्त्या नादत्तमुपतिष्ठति ॥ १३३ ॥
जो आकाशमें उडते पृथ्वीमे गिरते हैं उन पक्षियोंकोभी विनादिया अन्न
प्राप्त नहीं होता है ॥ १३३ ॥
तथाच-
तैसेही-
न हि भवति यन्न भाव्यं भवति च भाव्यं विनापि यत्नेन ।
करतलगतमपि नश्यति यस्य तु भवितव्यता नास्ति१३४॥
जो होनहार नहीं है वह नहीं होता है जो होनहार है वह यत्नके विनाही
होजाता है जिसकी प्राप्ति नहीं है वह हाथमे प्राप्त हुआ भी नष्ट होजाता है१३४
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् ।
तथा पुरा कृतं कर्म कर्त्तारमनुगच्छति ॥ १३५ ॥
जैसे सहस्र धेनुओमें बछडा माताको पहचानता है इसी प्रकार पूर्व किया
कर्म कर्ताको पहुचता है ॥ १३५ ॥
शेते सह शयानेन गच्छन्तमत्तुगच्छति ।
नराणां प्राक्तनं कर्म तिष्ठेत्त्वथ सहात्मना ॥ १३६ ॥
सोतेके साथ सोता है, चलतेके साथ चलता है, बहुत क्या मनुष्योका किया
कर्म आत्माके साथ रहता है ॥ १३६ ॥
यथा छायातपौ नित्यं सुसम्बद्धौ परस्परम् ।
एवं कर्म च कर्त्ता च संश्लिष्टावितरेतरम् ॥ १३७ ॥