मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
आठवां अध्याय। ३११
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आठवां अध्याय। ३११
सहस्रं ब्राह्मणो दण्डं दाप्यो गुप्ते तु ते व्रजन् ।
शूद्रायां क्षत्रियविशोः साहस्त्रो वै भवेद्दमः ॥ ३८३ ॥
क्षत्रियायामगुप्तायां वैश्ये पञ्चशतं दमः ।
मूत्रेण मौण्ड्यमिच्छेत्तु क्षत्रियो दण्डमेव वा ॥ ३८४ ॥
अगुप्ते क्षत्रिया वैश्ये शूद्रां वा ब्राह्मणो व्रजन् ।
शतानि पञ्च दण्ड्यःस्यात्सहस्रं त्वन्त्यजस्त्रियम्॥३८५॥
यदि ब्राह्मण रक्षित क्षत्रिया वा वैश्या से गमन करे तो उस पर
हज़ार पण दण्ड करे और रक्षित शूद्रा में गमन करनेवाले क्षत्रिय
और वैश्य पर भी हज़ार पण दण्ड करे। अरक्षित क्षत्रिया में ग-
मन करने से वैश्य पर पाँच सौ पण और क्षत्रिय का मूत्र से मूंड़
मुड़ाकर, पाँच सौ पण दण्ड करे। यदि ब्राह्मण, अरक्षित क्षत्रिया,
वैश्या और शूद्रा से व्यभिचार करे तो पाँच सौ पण दण्ड करे। और
चाण्डाली-भंगिनसे गमन करने पर हज़ार पण दण्ड करे॥३८३-३८५॥
यस्य स्तेनः पुरे नास्ति नान्यस्त्रीगो न दुष्टवाक् ।
न साहसिकदण्डघ्नौ स राजा शक्रलोकभाक् ॥ ३८६ ॥
एतेषां निग्रहो राज्ञः पञ्चानां विषये स्वके ।
साम्राज्यकृत्सजात्येषु लोके चैव यशस्करः ॥ ३८७ ॥
ऋत्विजं यस्त्यजेद्याज्यो याज्यं चर्त्विक् त्यजेद्यदि ।
शक्तं कर्मण्यदुष्टं च तयोर्दण्डः शतं शतम् ॥ ३८८ ॥
न माता न पिता न स्त्री न पुत्रस्त्यागमर्हति ।
त्यजन्नपतितानेतानू राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट्॥३८६॥
आश्रमेषु द्विजातीनां कार्ये विवदतां मिथः ।
न विब्रूयान्नृपो धर्मं चिकीर्षन् हितमात्मनः ॥ ३६० ॥
११२ मनुस्मृति ।
'जिस राजा के नगर में न चोर हैं, न व्यभिचारी हैं, न कुवाच्य
कहनेवाले हैं, न लुटेरे हैं, और न मार-पीट करनेवाले हैं वह
राजा इन्द्रलोक को पाता है। इन पाँचों का अपने राज्य में निग्रह
करने से राजा का राज्य और यश फैलता है। जो यजमान अपने
कर्म करानेवाले निर्दोष ऋत्विज् को त्याग दे या जो ऋत्विज् योग्य
यजमान को छोड़ दे उन दोनों पर राजा सौ सौ पण दण्ड करे।
माता, पिता, स्त्री और पुत्र त्याग के योग्य नहीं होते। इनको पतित
न हों तो त्यागनेवाले पर राजा छः सौ पण दण्ड करे। आश्रम-
धर्म के लिए झगड़नेवाले द्विजों का राजा कोई फ़ैसला न करे।
वे खुद कर लेंगे ॥ ३८६-३६० ॥
यथार्हमेतानभ्यर्च्य ब्राह्मणैः सह पार्थिवः ।
सान्त्वेन प्रशमय्यादौ स्वधर्मं प्रतिपादयेत् ॥ ३६१ ॥
प्रातिवेश्यानुवेश्यौ च कल्याणे विंशतिद्विजे ।
अर्हावभोजयन् विप्रो दण्डमर्हति माषकम् ॥ ३६२ ॥
श्रोत्रियः श्रोत्रियं साधुं भूतिकृत्येष्वभोजयन् ।
तदन्नं द्विगुणं दाप्यो हिरण्यं चैव माषकम् ॥ ३६३ ॥
अन्धो जडः पीठसर्पी सप्तत्या स्थविरश्च यः ।
श्रोत्रियेषूपकुर्वंश्च न दाप्याः केनचित्करम् ॥ ३६४ ॥
श्रोत्रियं व्याधितार्तौ च बालवृद्धावकिञ्चनम् ।
महाकुलीनमार्यं च राजा संपूजयेत् सदा ॥ ३६५ ॥
किन्तु अपने सभासदों के साथ इनकी यथोचित पूजा करके
प्रथम समझावे फिर स्वधर्म का आदेश करे। यदि कोई उत्सव हो
और बीस ब्राह्मणों के भोजन का प्रबन्ध हो तब पड़ोसी और आने
जानेवाले हिती को न जिमावे तो उस पुरुष पर एक माषक दण्ड
करे। किसी मङ्गलकार्य में वेदज्ञ ब्राह्मण, साधु आदि को भोजन
न देने से उसको दूना अन्न और सोना का एक माषक देना होगा।
आठवां अध्याय । ३१३
आठवां अध्याय । ३१३
अन्धा, बहिरा, लूला, सत्तर वर्ष का वूढ़ा और श्रोत्रिय से राजा
कोई कर न लेवे। श्रोत्रिय, रोगी, दुःखी, बालक, बूढ़ा, निर्धन,
महाकुलीन, और महात्मा पुरुष की तरफ राजा सदा आदर-
दृष्टि रक्खे ॥ ३६१-३६५ ॥
शाल्मलीफलके श्लक्ष्णे नेनिज्यान्नेजकः शनैः ।
न च वासांसि वासोभिर्निहरेन्न च वासयेत् ॥ ३६६ ॥
तन्तुवायेा दशपलं दद्यादेकपलाधिकम् ।
अतोऽन्यथा वर्तमानो दाप्यो द्वादशकं दमम् ॥ ३६७॥
शुल्कस्थानेषु कुशलाः सर्वपण्यविचक्षणाः ।
कुर्युर्घ यथापण्यं ततो विंशं नृपो हरेत् ॥ ३६८ ॥
धोबी सेमर के चिकने पाट पर धीरे धीरे कपड़े धोवे, कपड़ों
को बदले, नहीं और न बहुत दिनों तक पड़ा रक्खे। जुलाहा दश
पल सूत लेकर मांडी के संबध से ग्यारह पल कपड़ा देवे । यदि
खिलाफ करे तो उस पर राजा बारह पण दण्ड दिलावे। जो पुरुष
चुंगी वगैरह के कामों में चतुर और हर प्रकार के व्यापारों में प्र-
वीण हों, उन सौदागरों के लाभ का बीसवाँ भाग राजा ग्रहण
करे ॥ ३६६-३६८ ॥
राज्ञः प्रख्यातभाण्डानि प्रतिषिद्धानि यानि च ।
तानि निर्हरतो लोभात्सर्वहारं हरेन्नृपः ॥ ३६६ ॥
शुल्कस्थानं परिहरन्नकाले क्रयविक्रयी ।
मिथ्यावादी च संख्याने दाप्योऽष्टगुणमत्ययम् ॥४००॥
आगमं निर्गमं स्थानं तथा वृद्धिक्षयावुभौ ।
विचार्य सर्वपण्यानां कारयेत्क्रयविक्रयौ ॥ ४०१ ॥
पञ्चरात्रे पञ्चरात्रे पक्षे पक्षेऽथवा गते ।
४०
३१४ मनुस्मृति।
कुर्वीत चैषां प्रत्यक्षमर्घसंस्थापनं नृपः ॥ ४०२ ॥
तुलामानं प्रतीमानं सर्वं च स्यात्सुलक्षितम् ।
षट्सु षट्सु च मासेषु पुनरेव परीक्षयेत् ॥ ४०३ ॥
राजा अपने देश के जिन प्रसिद्ध वस्तुओं को परदेश में
व्यापारार्थ जाने से रोके उनको लोभवश कोई लेजाय तो राजा
उसका सर्वस्व छीन लेय । चुंगीघर से छिपानेवाला, असमय में
खरीद-बेच करनेवाला, गिनती-तौल में झूठ बोलनेवाला वस्तु
के मूल्य से आठ गुणा दण्ड के योग्य होता है। माल कहां से आया
है, कहां जाता है, कितने दिन पड़ा रहा है, उसमें हानि वा लाभ
क्या होगा, यह सब विचार कर खरीद-बेच का भाव तै करे ।
पाँच पाँच दिन अथवा पाँच पाँच पक्ष बीतने पर राजा माल
का भाव व्यापारियों के सामने नियत करे । तराजू के बांट और
गज़ वगैरह पर अपनी मोहर लगाकर ठीक रक्खे और छठे महीना
उनकी जांच किया करे ॥ ३९९-४०३ ॥
पणं यानं तरेद्दाप्यं पौरुषोऽर्धपणं तरे ।
पादं पशुश्च योषित्च पादार्थं रिक्तकः पुमान् ॥ ४०४ ॥
भाण्डपूर्णानि यानानि तार्यं दाप्यानि सारतः ।
रिक्तभाण्डानि यत्किञ्चित्पुमांसश्चापरिच्छदाः ॥४०५॥
दीर्घाध्वनि यथादेशं यथाकालं तरो भवेत् ।
नदीतीरेषु तद्विद्यात्समुद्रे नास्ति लक्षणम् ॥ ४०६ ॥
पुल, नदी का महसूल ।
नदी पार करने में खाली गाड़ी का एक पण, भार सहित
मनुष्यों का आधा पण, पशु और स्त्री का चौथाई पण और खाली
मनुष्य से पणका आठवाँ भाग महसूल लेय । मालभरी गाड़ी पार
उतरने का महसूल बोझा के अनुसार लेय और खाली सवारी
आठवां अध्याय । ३१५
आठवां अध्याय । ३१५
और गरीबों से थोड़ा सा लेय । लम्बी उतराई का महसूल देश-
काल के अनुसार होगा। यह नदीतट का नियम है। समुद्र के
लिए कोई निश्चय नहीं हो सकता ॥ ४०४-४०६ ॥
गर्भिणी तु द्विमासादिस्तथा प्रव्रजितो मुनिः ।
ब्राह्मणा लिङ्गिनश्चैव न दाप्यास्तारिकं तरे ॥ ४०७ ॥
यन्नाविकिञ्चिद्दासानां विशीर्येतापराधतः ।
तद्दा सैरेवदातव्यं समागम्य स्वतोंऽशतः ॥ ४०८ ॥
एष नौयायिनामुक्तो व्यवहारस्य निर्णयः ।
दाशापराधतस्तोये दैविके नास्ति निग्रहः ॥ ४०६ ॥
दो महीना से अधिक की गर्भिणी, वानप्रस्थ, संन्यासी और
ब्राह्मण, ब्रह्मचारी नदी पार जाने की उतराई न दें। नाव में मल्लाहों
के दोष से जो कुछ हानि हो, वह मल्लाह लोग इकट्ठा होकर अपने
भाग में से देवें । यह नौका से नदी पार होने का निर्णय और जल
में मल्लाहों के व्यवहार का निर्णय कहा है । यदि कोई दैवी वि-
पत्ति आपड़े तो उस में कोई दण्डविधान नहीं है ॥ ४०७-४०६ ॥
वाणिज्यं कारयेद् वैश्यं कुसीदं कृषिमेव च ।
पशूनां रक्षणं चैव दास्यं शूद्रं द्विजन्मनाम् ॥ ४१० ॥
क्षत्रियं चैव वैश्यं च ब्राह्मणो वृत्तिकर्शितौ ।
विभृयादानृशंस्येन स्वानि कर्माणि कारयन् ॥ ४११ ॥
दास्यं तु कारयंल्लोभाद् ब्राह्मणः संस्कृतान् द्विजान् ।
अनिच्छतः प्राभवत्याद्राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट् ॥४१२॥
शूद्रं तु कारयेद्दास्यं क्रीतमक्रीतमेव वा ।
दास्यायैव हि सृष्टोऽसौ ब्राह्मणस्य स्वयम्भुवा ॥४१३॥
३१६ : मनुस्मृति।
न स्वामिना निसृष्टोपि शूद्रो दास्याद्विमुच्यते ।
निसर्गजं हि तत्तस्य कस्तस्मात्तदपोहति ॥ ४१४ ॥
राजा वैश्यों से व्यापार, ब्याज, खेती और पशुरक्षा का उद्यम
करावे। और शूद्रों से द्विजोंकी सेवा करावे। जीविका से रहित
क्षत्रिय और वैश्यों से ब्राह्मण अपना कर्म करावे और उनका पा-
लन करे। यदि धनी ब्राह्मण लोभवश उत्तम द्विजों से सेवाकर्म
करावे तो उसपर राजा छ सौ पण दण्ड करे । खरीदे वा बिना
खरीदे शूद्रों से सेवाही करावे क्योंकि ब्रह्मा ने शूद्रों को दासकर्म
के लिए ही पैदा किया है। स्वामी से छुड़ाया हुआ भी शूद्र दास-
कर्म को नहीं छोड़ सकता क्योंकि वह उसका स्वाभाविक धर्म
है ॥ ४१०-४१४ ॥
ध्वजाहृतो भक्तदासो गृहजः क्रीतदत्रिमौ ।
पौत्रिको दण्डदासश्च सप्तैते दासयोनयः ॥ ४१५ ॥
भार्या पुत्रश्च दासश्च त्रय एवाधनाः स्मृताः ।
यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम् ॥ ४१६ ॥
विश्रब्धं ब्राह्मणः शूद्राद् द्रव्योपादानमाचरेत् ।
न हि तस्यास्ति किञ्चित्स्वं भर्तृहार्यधनो हि सः॥४१७॥
युद्ध में जीतकर लाया हुआ, भक्त दास, दासीपुत्र, खरीदा
हुआ, किसी का दिया हुआ, परंपरा से प्राप्त और दण्ड-शुद्धि के
लिए जिसने दासपना किया हो; ये सात प्रकार के दास होते हैं।
भार्या, पुत्र और दास इन तीनों को मनुने निर्धन कहा है, ये जो
धन पाते हैं, वह उसका है जिसके ये होते हैं। ब्राह्मण को अपने
दास शूद्र से बिना विचार धन ले लेना चाहिए उसका धन कुछ
नहीं है क्योंकि दास के धन का मालिक उसका मालिक ही
है ॥ ४१५-४१७ ॥
वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारयेत् ।
आठवां अध्याय । ३१७
आठवां अध्याय । ३१७
तौ हि च्युतौ स्वकर्मभ्यः क्षोभयेतामिदं जगत्॥४१८॥
अह्न्यहन्यवेक्षेत कर्मान् तान् वाहनानि च ।
आयव्ययौ च नियतावाकरान् कोशमेव च ॥ ४१९ ॥
एवं सर्वानिमान् राजा व्यवहारान् समापयन् ।
व्यपोह्य किल्बिषं सर्वं प्राप्नोति परमां गतिम्॥ ४२० ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहिताया-
मष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
राजा यत्नपूर्वक वैश्य और शूद्रसे उनके कर्मों को करावे क्योंकि
वे अपने कर्म से हटकर संसार को उपद्रवों से दुखी करेंगे।
राजा प्रतिदिन आरम्भ किये कार्यों का, सवारियों का, नियत
आय-व्यय, खान और धन-भण्डार का अवलोकन करे। इस प्रकार
राजा इन सब व्यवहारों का निर्णय करता हुआ सब पापों का
नाश करके परम गति को पाता है ॥ ४१८-४२० ॥
आठवां अध्याय पूरा हुआ।
अथ नवमोऽध्यायः ।
पुरुषस्य स्त्रियाश्चैव धर्म्ये वर्त्मनि तिष्ठतोः ।
संयोगे विप्रयोगे च धर्मान् वक्ष्यामि शाश्वतान् ॥ १ ॥
अस्वतन्त्राः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशम् ।
विषयेषु च सज्जन्त्यः संस्थाप्या आत्मनो वशे ॥ २ ॥
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ ३ ॥
कालेऽदाता पिता वाच्यो वाच्यश्चानुपयन् पतिः ।
मृते भर्तरि पुत्रस्तु वाच्यो मातुररक्षिता ॥ ४ ॥
सूक्ष्मेभ्योऽपि प्रसङ्गेभ्यः स्त्रियो रक्ष्या विशेषतः ।
द्वयोर्हि कुलयोः शोकमावहेयुररक्षिताः ॥ ५ ॥
इमं हि सर्व वर्णानां पश्यन्तो धर्ममुत्तमम् ।
यतन्ते रक्षितुं भार्या भर्तारो दुर्बला अपि ॥ ६ ॥
नवाँ अध्याय ।
स्त्री-रक्षा ।
अपने सनातन धर्म में स्थित पुरुष और स्त्रियों के संयोग और
वियोग समय के धर्म कहे जाते हैं:—
पुरुष को अपनी स्त्रियों को कभी स्वतन्त्र न होने देना चाहिए ।
नाच गान में आसक्त स्त्रियों को अपने वशमें रखना चाहिए । बा-
लकपन में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापा में पुत्र रक्षा करे,
नवां अध्याय। ३१६
नवां अध्याय। ३१६
स्त्री स्वतन्त्र होने योग्य नहीं है। समय पर कन्यादान न करने से
पिता, ऋतुकाल में सहवास न करने से पति और पिता के बाद
माता की रक्षा न करने से पुत्र निन्दा का पात्र होता है। साधारण
कुसंगों से भी स्त्रियों को बचावे क्योंकि अरक्षित स्त्रियां दोनों
कुलों को दुःख देती हैं। इसप्रकार संपूर्ण वर्णों का धर्म है। दुर्बल
पति भी अपनी स्त्रियों की रक्षा का उपाय करते हैं ॥ १-६ ॥
स्वां प्रसूतिं चरित्रं च कुलमात्मानमेव च ।
स्वं च धर्मं प्रयत्नेन जायां रक्षन् हि रक्षति ॥ ७ ॥
पतिर्भार्या संप्रविश्य गर्भो भूत्वेह जायते ।
जायायास्तद्धि जायात्वं यदस्यां जायते पुनः ॥ ८ ॥
यादृशं भजते हि स्त्री सुतं सूते तथाविधम् ।
तस्मात्प्रजाविशुद्ध्यर्थं स्त्रियं रक्षेत् प्रयत्नतः ॥ ९ ॥
न कश्चिद्योषितः शक्तः प्रसह्य परिरक्षितुम् ।
एतैरुपाययोगैस्तु शक्यास्ताः परिरक्षितुम् ॥ १० ॥
स्त्रियों की रक्षा करने से पुरुष अपनी संतान को वर्णसङ्कर
होने से बचाता है, अपने चरित्र को निर्दोष रखता है, अपने कुल
की मर्यादा बढ़ाता है, अपनी और अपने धर्म की रक्षा करता
है। पति स्त्री में वीर्यरूप से प्रवेश करके जगत् में पुत्ररूप से जन्म
लेता है। अपनी स्त्री में फिर जन्मता है इसीसे स्त्री जाया कह-
लाती है। जैसे पुरुष को स्त्री सेवन करती है उसी भांति का पुत्र
पैदा करती है। इसलिए प्रजा की पवित्रता के लिए स्त्री की रक्षा
यत्नपूर्वक करे। कोई बलात्कार से स्त्रियों की रक्षा नहीं कर स-
कता, किन्तु इन उपायों से उनकी रक्षा कर सकता है ॥ ७-१० ॥
अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये चैव नियोजयेत् ।
शौचे धर्मेऽन्नपक्त्यां च पारिणाह्यस्य वैक्षणे ॥ ११ ॥
३२० मनुस्मृति ।
अरक्षिता गृहे रुद्धाः पुरुषैराप्तकारिभिः ।
आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः ॥ १२ ॥
पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम् ।
स्वप्नोऽन्यगेहवासश्च नारीसंदूषणानि षट् ॥ १३ ॥
नैता रूपं परीक्षन्ते नासां वयसि संस्थितिः ।
सुरूपं वा विरूपं वा पुमानित्येव भुञ्जते ॥ १४ ॥
धन-संग्रह, खर्च, सफ़ाई, पतिसेवा, धर्म, रसोई और घरके
सँभाल में स्त्री को लगावै । विश्वास पात्र मनुष्यों से घरमें रखवाली
कराने से रक्षित नहीं होती किन्तु जो अपनी रक्षा आपही करे
वेही सुरक्षित होसकती हैं । मद्यपान, दुर्जनसंग, पति से वियोग,
घूमना, सोना, दूसरे के घर रहना ये छः भांति के स्त्रियों में दूषण
होते हैं । व्यभिचारिणी स्त्रियां रूप और अवस्था को नहीं देखतीं,
केवल पुरुष देखकर ही मोहित होजाती हैं, वह कुरूप हो या
सुरूप ॥ ११-१४ ॥
पौंश्चल्याच्चलचित्ताच्च नैस्नेह्याच्च स्वभावतः ।
रक्षिता यत्नतोऽपीह भर्तृष्वेता विकुर्वते ॥ १५ ॥
एवं स्वभावं ज्ञात्वाऽऽसां प्रजापतिनिसर्गजम् ।
परमं यत्नमातिष्ठेत्पुरुषो रक्षणं प्रति ॥ १६ ॥
शय्यासनमलङ्कारं कामं क्रोधमनार्जवम् ।
द्रोहभावं कुचर्यां च स्त्रीभ्यो मनुरकल्पयत् ॥ १७ ॥
नास्ति स्त्रीणां क्रिया मन्त्रैरिति धर्मो व्यवस्थितः ।
निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति स्थितिः॥१८॥
व्यभिचारिणी होनेसे, चित्तकी चञ्चलतासे, स्वभावसे रूखापनसे,
नवाँ अध्याय । ३२१
नवाँ अध्याय । ३२१
स्त्रियां रक्षित होनेपर भी अपने पति से विमन रहती हैं । ब्रह्मा
के रचे, ऐसे स्त्रियों के स्वभाव जानकर उनकी रक्षा का खूब उ-
द्योग करे । सोना, बैठे रहना, गहनेपर प्रेम, काम, क्रोध, अङ्कृतपना,
दूसरों से द्रोह और दुराचार ये स्त्रियों में स्वभाव से पैदा हैं—ऐसा
मनु ने कहा है । स्त्रियों के जातकमीदि संस्कार मन्त्रों से नहीं होते
इसलिए वे धर्मरहित होती हैं। असत्य के समान हैं—यह धर्म-
शास्त्र की मर्यादा है ॥ १५-१८ ॥
तथा च श्रुतयो बह्व्यो निगीता निगमेष्वपि ।
स्वालक्षण्यपरीक्षार्थं तासां शृणुत निष्कृतीः ॥ १६ ॥
यन्मे माता प्रलुलुभे विचरन्त्यपतिव्रता ।
तन्मे रेतः पिता वृङ्क्तामित्यस्यैतन्निदर्शनम् ॥ २० ॥
ध्यायत्यनिष्टं यत्किञ्चित्पाणिग्राहस्य चेतसा ।
तस्यैष व्यभिचारस्य निह्नवः सम्यगुच्यते ॥ २१ ॥
यादृग्गुणेन भर्त्रा स्त्री संयुज्येत यथाविधि ।
तादृग्गुणा सा भवति समुद्रेणेव निम्नगा ॥ २२ ॥
व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वभाव की परीक्षार्थ वेदों में बहुत
श्रुतियां पठित हैं । उनमें जो व्यभिचार के प्रायश्चित्तभूत हैं उन
को सुनो । कोई पुत्र माता का मानस व्यभिचार जानकर कहता है-
जो मेरी माता अपतिव्रता हुई परपुरुष को चाहनेवाली थी, उस
दुष्टा का मेरा पिता शुद्ध वीर्यसे शोधन करे-यह एक नमूना है ।
स्त्री अपने मनमें पतिके लिए जो अशुभ चिन्तन करती है (मान-
सिक व्यभिचार ) उसका प्रायश्चित्तरूप मन्त्र पुत्रको शुद्ध करने
वाला है, माता को नहीं। जिस गुणवाले पति के साथ स्त्री विवाह
करके रहे वैसेही गुणवाली वह होजाती है, जैसे समुद्र के साथ
नदी खारी होजाती है ॥ १६-२२ ॥
अक्षमाला वशिष्ठेन संयुक्ताऽधमयौनिजा ।
४१
३२२ मनुस्मृति ।
शारङ्गी मन्दपालेन जगामाभ्यर्हणीयताम् ॥ २३ ॥
एताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन्नपकृष्टप्रसूतयः ।
उत्कर्षं योषितः प्राप्ताः स्वैः स्वैर्भर्तृगुणैः शुभैः ॥ २४ ॥
एषोदिता लोकयात्रा नित्यं स्त्रीपुंसयोः शुभा ।
प्रेत्येह च सुखोदर्कान् प्रजाधर्मान्निबोधत ॥ २५ ॥
अक्षमाला-अधम जाति की स्त्री वशिष्ठ को विवाहित होने से
पूज्य हुई। शारंगी पक्षीजाति की मन्दपाल को विवाहित होने से
पूज्य हुई। ये और दूसरी भी स्त्रियां इस लोक में अपने पतियों के
गुणों के कारण उन्नति को पहुँची हैं। इस प्रकार स्त्री-पुरुषों का
उत्तम लौकिक आचार कहा गया है। अब लोक, परलोक में सुख
देनेवाले सन्तानधर्म को सुनो ॥ २३-२५ ॥
प्रजनार्थं महाभागाः पूजार्हा गृहदीप्तयः ।
स्त्रियः श्रियश्च गेहेषु न विशेषोऽस्ति कश्चन ॥ २६ ॥
उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम् ।
प्रत्यहं लोकयात्रायाः प्रत्यक्षं स्त्रीनिबन्धनम् ॥ २७ ॥
अपत्यं धर्मकार्याणि शुश्रूषा रतिरुत्तमा ।
दाराधीनस्तथा स्वर्गः पितॄणामात्मनश्च ह ॥ २८ ॥
पतिं या नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता ।
सा भर्तृलोकानाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते ॥ २९ ॥
व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोके प्राप्नोति निन्द्यताम् ।
शृगालयोनिं चाप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते ॥ ३० ॥
ये स्त्रियां पुत्र उत्पन्न करने के लिए बड़ी भाग्यवंती, सत्कार
योग्य और घर की शोभा हैं। स्त्रियों में और लक्ष्मी में कोई भेद
नवाँ अध्याय । ३२३
नवाँ अध्याय । ३२३
नहीं है। दोनों समान हैं। सन्तान पैदा करना, उनका पालन,
अतिथि, मित्र आदि का लौकिक आदर-भोजन का निर्वाह स्त्री
से ही हो सकता है यह प्रत्यक्ष है। सन्तान, धर्मकार्य, अतिथि-
सेवा, अच्छा काम सुख, अपने और पितरों को स्वर्ग-प्राप्ति स्त्री के
अधीन है। जो स्त्री मन, वाणी और शरीर को वश में रखकर
पति के अनुकूल रहती है वह पतिलोक पाती है और जगत् में
साध्वी कही जाती है। और पति के विरुद्ध करने से लोक में
निन्दा पाती है। सियार की योनि में जन्म लेती है और बुरे रोगों
से दुःखी होती है ॥ २६-३० ॥
पुत्रं प्रत्युदितं सद्भिः पूर्वजैश्च महर्षिभिः ।
विश्वजन्यमिमं पुण्यमुपन्यासं निबोधत ॥ ३१ ॥
भर्तुः पुत्रं विजानन्ति श्रुतिद्वैधं तु भर्तरि ।
आहुरुत्पादकं केचिदपरे क्षेत्रिणं विदुः ॥ ३२ ॥
क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृतः पुमान् ।
क्षेत्रबीजसमायोगात् संभवः सर्वदेहिनाम् ॥ ३३ ॥
विशिष्टं कुत्राचिद्बीजं स्त्रीयोनिस्त्वेव कुत्रचित् ।
उभयं तु समं यत्र सा प्रसूतिः प्रशस्यते ॥ ३४ ॥
बीजस्य चैव योन्याश्च बीजमुत्कृष्टमुच्यते ।
सर्वभूतप्रसूतिर्हि बीज लक्षणलक्षिता ॥ ३५ ॥
यादृशं तूप्यते बीजं क्षेत्रे कालोपपादिते ।
तादृग्रोहति तत्तस्मिन् बीजं स्वैर्व्यञ्जितं गुणैः ॥ ३६ ॥
इयं भूमिर्हि भूतानां शाश्वती योनिरुच्यते ।
न च योनिगुणान्कांश्चिद्बीजं पुष्यति पुष्टिषु ॥ ३७ ॥
भूमावप्येककेदारे कालोप्तानि कृषीबलैः ।
३२४ मनुस्मृति ।
नानारूपाणि जायन्ते बीजानीह स्वभावतः ॥ ३८ ॥
प्राचीनकाल के महात्मा-महर्षियों ने जो पुत्र को कहा था,
उस विश्वहितकारी, पवित्र विचार को सुनो—
क्षेत्र-बीजनिर्णय ।
मुनिगण उत्पन्न पुत्र को भर्ता का मानते हैं। परन्तु भर्ता के
विषय में दो प्रकार की श्रुति हैं—पहला मत है—पुत्र जिसके वीर्य
से हुआ हो उसका माना जाता है। दूसरा मत है—जिसकी स्त्री
में पैदा हो उसका होता है । स्त्री क्षेत्ररूप और पुरुष बीजरूप
कहा है, इस क्षेत्र और बीज के संयोग से सब प्राणियों की उत्पत्ति
है। कहीं बीज और कहीं क्षेत्र श्रेष्ठ माना जाता है। पर जिसमें
दोनों समान हों वह सन्तान श्रेष्ठ है। बीज और क्षेत्र में बीज
उत्तम गिना जाता है, क्योंकि—सब प्राणियों की उत्पत्ति में
बीज के रूप, रंग देखने में आते हैं। समय पर जैसा बीज खेत में
बोया जाता है, उसी भांति का गुण पैदा हुए में आता है। यह
भूमि प्राणियों की सनातन-योनि कही जाती है। परन्तु बीज
अपने खेत के गुणों को धारण नहीं करता । किसान लोग एक ही
भांति के खेत में समय पर अलग अलग बीज बोते हैं और वे
अपने स्वभाव से भांति भांति के उत्पन्न होते हैं अर्थात् एक ही
भूमि होने से एकसे नहीं होते ॥ ३१–३८ ॥
व्रीहयः शालयो मुद्गास्तिला माषास्तथा यवाः ।
यथाबीजं प्ररोहन्ति लशुनानीक्षवस्तथा ॥ ३९ ॥
अन्यदुप्तं जातमन्यदित्येतन्नोपपद्यते ।
उप्यते यद्धि यद्बीजं तत्तदेव प्ररोहति ॥ ४० ॥
तत्प्राज्ञेन विनीतेन ज्ञानविज्ञानवेदिना ।
आयुष्कामेन वप्तव्यं न जातु परयोषिति ॥ ४१ ॥
अत्र गाथा वायुगीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।
नवां अध्याय । ३२५
नवां अध्याय । ३२५
यथा बीजं न वप्तव्यं पुंसा परपरिग्रहे ॥ ४२ ॥
धान, साठा, मूंग, तिल, उड़द, जव, लसुन और ईख बोने पर
अपने बीज के अनुसार ही उगते हैं। वीज दूसरा, वृक्ष दूसरा उगे
यह नहीं होता। जो बीज होता है, उसीका वृक्ष पैदा होता है।
इसलिए बुद्धिमान् , विनीत, ज्ञान-विज्ञान-विशारद को परस्त्री
में बीज न बोना चाहिए। प्राचीन इतिहास के ज्ञाता ऋषि इस
विषय में वायु की गाई गाथा गाते हैं-परस्त्री में पुरुष को बीज
न बोना चाहिए ॥ ३६-४२ ॥
नश्यतीषुर्येथा विद्धः खे विद्धमनुविध्यतः ।
तथा नश्यति वै क्षिप्रं बीजं परपरिग्रहे ॥ ४३ ॥
पृथोरपीमां पृथिवीं भार्यां पूर्वविदो विदुः ।
स्थाणुच्छेदस्य केदारमाहुः शल्यवतो मृगम् ॥ ४४ ॥
एतावानेव पुरुषो यज्जायात्मा प्रजेति ह ।
विप्राः प्राहुस्तथा चैतद्यो भर्ता सा स्मृताङ्गना ॥ ४५ ॥
न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या विमुच्यते ।
एवं धर्मं विजानीमः प्राक् प्रजापतिनिर्मितम् ॥ ४६ ॥
जैसे दूसरे के वेधे मृग को फिर मारने से बाण निष्फल होता
है, ऐसे परस्त्री में बोया बीज शीघ्र निष्फल होता है। इस पृथिवी
को जो पहले राजा पृथुकी भार्या थी, अब भी लोग पृथुकी भार्या
ही जानते हैं। जो वृक्ष काटकर साफ़ करता है उसका खेत और
जिसका पहले बाण लगे उसका वह मृग कहलाता है। स्त्री आप और
सन्तान ये तीनों मिलकर एक पुरुष कहलाता है। वेदज्ञ ब्राह्मण
भी कहते हैं कि जो भर्ता है वही भार्या है * । बेंचने वा छोड़ने से
- शतपथब्राह्मण में श्रुति है—'अर्धो ह वा एव आत्मनस्तस्माद्यायां न विन्दते
नैतावत्प्रजायते, असर्वो हि तावद्भवति । अथ यदैव जायां विन्दतेऽथ प्रजायते तर्हि
सर्वो भवति' ।
३२६ मनुस्मृति।
भार्या अपने पति से नहीं छूटती । ऐसी धर्ममर्यादा, प्रजापति
की रची हम जानते हैं ॥ ४३-४६ ॥
सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते ।
सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् ॥ ४७ ॥
यथा गोऽश्वोष्ट्रदासीषु महिष्यजाविकासु च ।
नोत्पादकः प्रजाभागी तथैवान्याङ्गनास्वपि ॥ ४८ ॥
येऽक्षेत्रिणो बीजवन्तः परक्षेत्रप्रवापिणः ।
ते वै शस्यस्य जातस्य न लभन्ते फलं क्वचित् ॥ ४६ ॥
यदन्यगोषु वृषभो वत्सानां जनयेच्छतम् ।
गोमिनामेव ते वत्सा मोघं स्कन्दितमार्षभम् ॥ ५० ॥
तथैवाक्षेत्रिणो बीजं परक्षेत्रप्रवापिणः ।
कुर्वन्ति क्षेत्रिणामर्थं न बीजी लभते फलम् ॥ ५१ ॥
भाइयों का बँटवारा एक बार ही होता है । कन्यादान एक
बार होता है और दान भी एकही बार कहने से होजाता है—सत्पु-
रुष इन तीन बातों को एकवार ही करते हैं । जैसे गौ, घोड़ी,
ऊंटनी, दासी, भैंस, बकरी और भेड़ आदि में सन्तान पैदा करने
वाला उस सन्तान का स्वामी नहीं माना जाता, ऐसेही परस्त्री
में सन्तान का भागी नहीं होता । जो क्षेत्र स्वामी न होकर, बीज
बोनेवाले हों, वे उस खेत के अन्नादि फल को नहीं पासकते हैं ।
एक बैल दूसरे की गायों में सैकड़ों बछड़े पैदा करता है, वे गौ
वालों के होते हैं और बैल का वीर्य निष्फल जाता है, वैसे ही
परक्षेत्र में बोनेवाले खेतवाले का काम करते हैं, बीजवाला फल
नहीं पाता ॥ ४७-५१ ॥
फलं त्वनभिसंधाय क्षेत्रिणां बीजिनां तथा ।
नवों अध्याय । ३२७
नवों अध्याय । ३२७
प्रत्यक्षं क्षेत्रिणोऽर्थो बीजाद्योनिर्गरीयसी ॥ ५२ ॥
क्रियाभ्युपगमाच्चैतद्बीजार्थं यत्प्रदीयते ।
तस्येह भागिनौ दृष्टौ बीजी क्षेत्रिक एव च ॥ ५३ ॥
ओघवाताहृतं बीजं यस्य क्षेत्रे प्ररोहति ।
क्षेत्रिकस्यैव तद्बीजं न वप्ता लभते फलम् ॥ ५४ ॥
खेत और बीजवालों में कोई ठहराव न हो तब तक सन्तान
खेतवाले की प्रत्यक्ष मानीजाती है। क्योंकि—बीज से खेत ही
प्रधान है। क्षेत्र में जो सन्तान होगी, वह हम दोनों की होगी—
ऐसा ठहराव हुआ हो तो सन्तान क्षेत्र और बीज दोनों की
होगी। जो बीज जल के वेग या वायु से गिरकर दूसरे के खेत
में पैदा हो, उसके फल का भागी खेतवाला होता है बोनेवाला
नहीं ॥ ५२-५४ ॥
एष धर्मो गवाश्वस्य दास्युष्ट्राजाविकस्य च ।
विहंगमहिषीणां च विज्ञेयः प्रसवं प्रति ॥ ५५ ॥
एतद्वः सारफल्गुत्वं बीजयोन्योः प्रकीर्तितम् ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि योषितां धर्ममापदि ॥ ५६ ॥
भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भार्या या गुरुपत्न्यनुजस्य सा ।
यवीयसस्तु या भार्या स्नुषा ज्येष्ठस्य सा स्मृता ॥ ५७ ॥
ज्येष्ठो यवीयसो भार्यां यवीयान् वाग्रजस्त्रियम् ।
पतितौ भवतो गत्वा नियुक्तावप्यनापदि ॥ ५८ ॥
देवराद्वा सपिण्डाद्वा स्त्रिया सम्यङ्नियुक्तया ।
प्रजेप्सिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये ॥ ५९ ॥
विधवायां नियुक्तस्तु घृताक्तो वाग्यतो निशि ।
एकमुत्पादयेत् पुत्रं न द्वितीयं कथञ्चन ॥ ६० ॥
३२८ मनुस्मृति ।
एकमुत्पादयेत् पुत्रं न द्वितीयं कथञ्चन ॥ ६० ॥
द्वितीयमेके प्रजनं मन्यन्ते स्त्रीषु तद्विदः ।
अनिर्वृतं नियोगार्थं पश्यन्तो धर्मतस्तयोः ॥ ६१ ॥
विधवायां नियोगार्थे निर्वृते तु यथाविधि ।
गुरुवच्च स्नुषावच्च वर्तेयातां परस्परम् ॥ ६२ ॥
यह व्यवस्था गौ, घोड़ी, दासी, ऊंटनी, बकरी, भेड़, पक्षी और
भैंस की संतति में जाननी चाहिए। इस प्रकार बीज और योनि
की प्रधानता और अप्रधानता का विषय कहा गया अब स्त्रियों का
आपद्धर्म कहा जाता है ।
स्त्रियों का आपद्धर्म, नियोग ।
बड़े भाई की स्त्री छोटे भाई को गुरुपत्नी के समान और छोटे
भाई की स्त्री बड़े भाई को पुत्रवधू के समान कही है। आपत्तिकाल
न हो अर्थात् पुत्र हो तो बड़ा भाई छोटे भाई की स्त्री के साथ
और छोटा भाई बड़े भाई की स्त्री के साथ नियोगविधि से गमन
करे तो दोनों पतित होते हैं । सन्तान न हो तो नियोग की हुई
स्त्री देवर या सपिण्डपुरुष से अभीष्ट सन्तान प्राप्त करे। विधवा
स्त्री के साथ नियोग करनेवाला शरीर में घी लगाकर मौन होकर
रात्रि में भोग करे और इस भांति एक ही पुत्र पैदा करे, दूसरा
कभी न करे। नियोगविधि के ज्ञाता कोई ऋषि एक पुत्र से नियोग
का प्रयोजन सिद्ध न होते देखकर दूसरा पुत्र पैदा करना भी
धर्म मानते हैं। शास्त्र की रीति से विधवा स्त्री में नियोग का
प्रयोजन हो जाने पर छोटा भाई बड़े भाई की स्त्री से माता
और बड़ा भाई छोटे की स्त्री से पुत्रवधू के समान बर्ताव
करे ॥ ५५-६२ ॥
नियुक्तौ यौ विधिं हित्वा वर्तेयातां तु कामतः ।
तावुभौ पतितौ स्यातां स्नुषागगुरुतल्पगौ ॥ ६३ ॥
नवां अध्याय । ३२६
नवां अध्याय । ३२६
नान्यस्मिन् विधवा नारी नियोक्तव्या द्विजातिभिः ।
अन्यस्मिन् हि नियुञ्जाना धर्मं हन्युः सनातनम् ॥ ६४॥
नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ।
न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुनः ॥ ६५ ॥
अयं द्विजैर्हि विद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः ।
मनुष्याणामपि प्रोक्तो वेने राज्यं प्रशासति ॥ ६६ ॥
स महीमखिलां भुञ्जन् राजर्षिप्रवरः पुरा।
वर्णानां संकरं चक्रे कामोपहतचेतनः ॥ ६७ ॥
ततः प्रभृति यो मोहात्प्रमीतपतिकां स्त्रियम् ।
नियोजयत्यपत्यार्थं तं विगर्हन्ति साधवः ॥ ६८ ॥
यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः ।
तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः ॥ ६६ ॥
यदि नियोग करनेवाले दोनों शास्त्रविधि को छोड़कर मन-
माना व्यवहार करें तो पतित होते हैं। और पुत्रवधू गुरुपत्नी के साथ
गमन करनेवाले माने जाते हैं। द्विजातियों को विधवा स्त्री का
नियोग दूसरे वर्णवाले से न करना चाहिए । अन्य जाति से नि-
योग की हुई स्त्रियाँ धर्म का नाश कर डालती हैं। विवाहसम्बन्धी
मन्त्रों में कहीं नियोग नहीं कहा है और विधवा का पुनर्विवाह भी
कहीं नहीं कहा है । यह नियोगविधि * राजा वेन के राज्य में
- नियोग और विधवा-विवाह वेद-स्मृति से विरुद्ध है । इसी लिए वेन के
समय में प्रचलित नियोग का मनुने खण्डन किया है । दूसरी स्मृतियों से दश-पांच
श्लोक विधवाविवाह के विषय में नवीन मतवाले प्रमाण देते हैं और ऋग्वेद
या अथर्व के दो चार मन्त्र भी प्रमाण में उपस्थित करते हैं। पर वे सब दूसरे
अभिप्राय के हैं, कोई भी विधवाविवाह वा नियोग को सिद्ध नहीं करते ।
‘उदीर्ध्वनार्यभिजीवलोकं गतासुमेतमुपशेष एहि । हस्तग्रामस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि संवभूथ ।’ ऋग्वेद, १० । १८ । ८ ।
‘उतयत्पतयो दशस्त्रियाः पूर्वे अब्राह्मणाः । ब्रह्मा चेद्धस्तमग्रहीत्स एव पतिरेकधा।’ अथर्व०
५।४।१७ इत्यादि मन्त्रों से सब कुछ सिद्ध करते हैं। परन्तु इनका प्रसङ्ग, सम्बन्ध, अर्थ
दूसरा ही है । श्रीभीमसेनकृत ‘विधवा-विवाहमीमांसा’ में विस्तार से लिखा गया है ।
४२
३३० मनुस्मृतिः।
प्रचलित हुई थी। परन्तु विद्वान् द्विजों ने इस पशुधर्म की निंदा
की है। राजर्षि वेन जब सारी पृथिवी पर राज्य करता था, उस
समय कामवासना से नष्टबुद्धि होकर वर्णसङ्करता फैलाई थी।
तब से जो पुरुष विधवा स्त्री का सन्तान के लिए नियोग करता
है उसकी साधु पुरुष निंदा करते हैं। जिस कन्या का पति
वाग्दान करने बाद मर जाय तो उसको उस का देवर इस भांति
स्वीकार करे ॥ ६३-६९ ॥
यथाविध्यधिगम्यैनां शुक्लवस्त्रां शुचिव्रताम् ।
मिथो भजेताप्रसवात्सकृत्सकृदृतावृतौ ॥ ७० ॥
न दत्त्वा कस्यचित्कन्यां पुनर्दद्याद् विचक्षणः ।
दत्त्वा पुनः प्रयच्छन् हि प्राप्नोति पुरुषानृतम् ॥ ७१ ॥
विधिवत्प्रतिगृह्यापि त्यजेत्कन्यां विगर्हिताम् ।
व्याधितां विप्रदुष्टां वा छद्मना चोपपादिताम् ॥ ७२ ॥
यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्यायोपपादयेत् ।
तस्य तद्वितथं कुर्यात् कन्यादातुर्दुरात्मनः ॥ ७३ ॥
विधाय वृत्तिं भार्यायाः प्रवसेत् कार्यवान्नरः ।
अवृत्तिकर्षिता हि स्त्री प्रदुष्येत् स्थितिमत्यपि ॥ ७४ ॥
विधाय प्रोषिते वृत्तिं जीवेन्नियममास्थिता ।
प्रोषिते त्वविधायैव जीवेच्छिल्पैरगर्हितैः ॥ ७५ ॥
प्रोषितो धर्मकामार्थं प्रतीक्ष्योऽष्टौ नरः समाः ।
विद्यार्थं षट् यशोऽर्थं वा कामार्थं त्रींस्तु वत्सरान् ॥ ७
संवत्सरं प्रतीक्षेत द्विषन्तीं योषितं पतिः ।
ऊर्ध्वं संवत्सरात्त्वेनां दायं हृत्वा न संवसेत् ॥ ७७ ॥