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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 649 में से

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पृष्ठ 455

आठवां अध्याय । ३१५
और गरीबों से थोड़ा सा लेय । लम्बी उतराई का महसूल देश-
काल के अनुसार होगा। यह नदीतट का नियम है। समुद्र के
लिए कोई निश्चय नहीं हो सकता ॥ ४०४-४०६ ॥
गर्भिणी तु द्विमासादिस्तथा प्रव्रजितो मुनिः ।
ब्राह्मणा लिङ्गिनश्चैव न दाप्यास्तारिकं तरे ॥ ४०७ ॥
यन्नाविकिञ्चिद्दासानां विशीर्येतापराधतः ।
तद्दा सैरेवदातव्यं समागम्य स्वतोंऽशतः ॥ ४०८ ॥
एष नौयायिनामुक्तो व्यवहारस्य निर्णयः ।
दाशापराधतस्तोये दैविके नास्ति निग्रहः ॥ ४०६ ॥
दो महीना से अधिक की गर्भिणी, वानप्रस्थ, संन्यासी और
ब्राह्मण, ब्रह्मचारी नदी पार जाने की उतराई न दें। नाव में मल्लाहों
के दोष से जो कुछ हानि हो, वह मल्लाह लोग इकट्ठा होकर अपने
भाग में से देवें । यह नौका से नदी पार होने का निर्णय और जल
में मल्लाहों के व्यवहार का निर्णय कहा है । यदि कोई दैवी वि-
पत्ति आपड़े तो उस में कोई दण्डविधान नहीं है ॥ ४०७-४०६ ॥
वाणिज्यं कारयेद् वैश्यं कुसीदं कृषिमेव च ।
पशूनां रक्षणं चैव दास्यं शूद्रं द्विजन्मनाम् ॥ ४१० ॥
क्षत्रियं चैव वैश्यं च ब्राह्मणो वृत्तिकर्शितौ ।
विभृयादानृशंस्येन स्वानि कर्माणि कारयन् ॥ ४११ ॥
दास्यं तु कारयंल्लोभाद् ब्राह्मणः संस्कृतान् द्विजान् ।
अनिच्छतः प्राभवत्याद्राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट् ॥४१२॥
शूद्रं तु कारयेद्दास्यं क्रीतमक्रीतमेव वा ।
दास्यायैव हि सृष्टोऽसौ ब्राह्मणस्य स्वयम्भुवा ॥४१३॥