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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

२०६ मनुस्मृति।
नियतो वेदमभ्यस्य पुत्रैश्वर्ये सुखं वसेत् ॥ ९५ ॥
एवं संन्यस्य कर्माणि स्वकार्यपरमोऽस्पृहः ।
संन्यासेनापहत्यैनः प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ ९६ ॥
एष वोऽभिहितो धर्मो ब्राह्मणस्य चतुर्विधः ।
पुण्योऽक्षयफलः प्रेत्य राज्ञां धर्मं निबोधत ॥ ९७ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां
षष्ठोऽध्यायः ॥
ऋषि, देव और पितरों के ऋण से मुक्त होकर, दशलक्षण धर्म
का सेवन करता हुआ द्विज वेदान्त को सुनकर संन्यास धारण
करे। सब अग्निहोत्रादि कर्मों को छोड़कर, पापों का प्राणायाम
से नाश करके, जितेन्द्रिय होकर वेद का अध्ययन करे और पुत्रों
के दिये भोजन, वस्त्रादि का सुख से उपभोग करे। इस प्रकार,
सब कर्मों को छोड़कर, केवल आत्मसाक्षात्कार में तत्पर रहकर,
संन्यास धारण करने से ब्रह्मपद को पहुँचता है। यह पवित्र
और परलोक में अक्षय फल देनेवाला ब्राह्मण का चारों प्रकार
का धर्म कहा गया है। अब राजधर्म को सुनो ॥ ९४-९७ ॥
छठवां अध्याय पूरा हुआ।

अथ सप्तमोऽध्यायः ।
राजधर्मान्प्रवक्ष्यामि यथावृत्तो भवेन्नृपः ।
संभवश्च यथा तस्य सिद्धिश्च परमा यथा ॥ १ ॥
ब्राह्मं प्राप्तेन संस्कारं क्षत्रियेण यथाविधि ।
सर्वस्यास्य यथान्यायं कर्तव्यं परिरक्षणम् ॥ २ ॥
अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात् ।
रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत्प्रभुः ॥ ३ ॥
इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च ।
चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥ ४ ॥
यस्मादेषां सुरेन्द्राणां मात्राभ्यो निर्मितो नृपः ।
तस्मादभिभवत्येष सर्वभूतानि तेजसा ॥ ५ ॥
तपत्यादित्यवच्चैष चक्षूंषि च मनांसि च ।
न चैनं भुवि शक्नोति कश्चिदप्यभिवीक्षितुम् ॥ ६ ॥
सोऽग्निर्भवति वायुश्च सोऽर्कःसोमःस धर्मराट् ।
स कुबेरः स वरुणः स महेन्द्रः प्रभावतः ॥ ७ ॥
सातवां अध्याय ।
राजधर्म ।
जैसा राजा का आचरण होना चाहिए, जैसे उसकी उत्पत्ति
हुई है, और जिस प्रकार उसको परम सिद्धि प्राप्त होती है वह
सब कहा जाता है । उपनयन संस्कारवाले क्षत्रिय राजा को न्याया-

२०८ मनुस्मृति ।
नुसार इस जगत् की रक्षा करनी चाहिए। इस जगत् में जब राजा
नहीं था और प्रजा भय से व्याकुल होने लगी, तब परमात्मा ने जगत्
की रक्षा के लिए राजा को उत्पन्न किया। इन्द्र, वायु, यम, सूर्य,
अग्नि, वरुण, चन्द्रमा और कुबेर इन आठ लोकपालों के सनातन
अंश को लेकर परमात्मा ने राजा बनाया है। इन लोकपालों की
मात्रा से राजा बनाया गया है, इसलिए वह अपने तेज से सब प्रा-
णियों को दबा देता है। राजा को जो देखता है उसके आँख और
मन पर सूर्य का सा प्रभाव पड़ता है, इसलिए सामने होकर कोई
राजा को देख नहीं सकता। राजा अपने प्रभाव में अग्नि, सूर्य,
चन्द्रमा, यम, कुबेर, वरुण और इन्द्र के समान है॥३-७॥
बालोऽपि नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः ।
महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ॥ ८ ॥
एकमेव दहत्यग्निर्नरं दुरुपसर्पिणम् ।
कुलं दहति राजाग्निः सपशुद्रव्यसञ्चयम् ॥ ९ ॥
कार्यं सोऽवेक्ष्य शक्तिं च देशकालौ च तत्त्वतः ।
कुरुते धर्मसिद्ध्यर्थं विश्वरूपं पुनः पुनः ॥ १० ॥
यस्य प्रसादे पद्मा श्रीर्विजयश्च पराक्रमे ।
मृत्युश्च वसति क्रोधे सर्वतेजमयो हि सः ॥ ११ ॥
तं यस्तु द्वेष्टि संमोहात्स विनश्यत्यसंशयम् ।
तस्य ह्याशु विनाशाय राजा प्रकुरुते मनः ॥ १२ ॥
राजा बालक हो तो भी यह मनुष्य है ऐसा मानकर उसका
अपमान न करे। क्योंकि—यह मनुष्य रूप में बड़ाभारी देवता
स्थित है। अग्नि एकही मनुष्य को उसकी असावधानी से
जलाता है, पर राजारूप अग्नि कुचाल से कुल, धन और पशु
सहित भस्म कर देता है। राजा देश, काल, कार्य और शक्ति को

सातवां अध्याय। २०६

सातवां अध्याय। २०६
ठीक ठीक विचार कर, अपने राजधर्म की सिद्धि के लिए अनेक
रूप कभी क्षमा, कभी कोप, कभी मित्रता इत्यादि धारण करता
है। जिसकी प्रसन्नता में लक्ष्मी, पराक्रम में जय और क्रोध में
मृत्यु का वास है, वह राजा सर्वतेजोमय है। उसके साथ अज्ञान
से जो द्वेष करता है, वह निःसंदेह नष्ट होजाता है। क्योंकि
उसके नाश का विचार शीघ्रही राजा मन में करता है ॥ ८-१२ ॥
तस्माद्धर्मं यमिष्टेषु स व्यवस्येन्नराधिपः ।
अनिष्टं चाप्यनिष्टेषु तं धर्मं न विचालयेत् ॥ १३ ॥
तस्यार्थे सर्वभूतानां गोप्तारं धर्ममात्मजम् ।
ब्रह्मतेजोमयं दण्डमसृजत्पूर्वमीश्वरः ॥ १४ ॥
तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
भयाद्भोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च ॥ १५ ॥
इसलिए राजा अपने अनुकूल मित्र और शत्रु के लिए जिस
धर्म क़ानून का स्थापन करे उसको कभी न तोड़ना चाहिए।
प्रजापति ने राजा के लिए सब प्राणियों की रक्षा करनेवाले,
ब्रह्मतेजोमय, धर्मरूप और अपने पुत्ररूप दण्ड को पहले ही से
पैदा किया है। दण्ड के भय से चराचर सब प्राणी अपने भोग
को प्राप्त होते हैं और धर्म से विचलित नहीं होते ॥ १३-१५ ॥
तं देशकालौ शक्तिं च विद्यां चावेक्ष्य तत्त्वतः ।
यथार्हतः संप्रणयेन्नरेष्वन्यायवर्तिषु ॥ १६ ॥
स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः।
चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥ १७ ॥
दण्डो शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥ १८ ॥
२७

२१० मनुस्मृति ।
समीक्ष्य स धृतः सम्यक् सर्वा रञ्जयति प्रजाः ।
असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः ॥ १६ ॥
यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः ।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन् दुर्बलान्बलवत्तराः ॥ २० ॥
देश, काल, शक्ति और विद्या का विचार करके यथायोग्य अप-
राधियों को दण्ड देवे । वह दण्ड ही राजा है, पुरुष है, वही राज्य
को नियम में रखनेवाला है, शासक है और वही चारों आश्रमधर्म
का प्रतिभू-ज़ामिन है। दण्ड सम्पूर्ण प्रजा का शासन करता है,
दण्ड ही रक्षा करता है, सोते हुए दण्ड ही जागता है, विद्वान्
लोग दण्ड को ही धर्म मानते हैं । उस दण्ड का विचारपूर्वक
प्रयोग होने से वह सब प्रजा प्रसन्न करता है और अविचार से,
सब तरह से नाशकारक होता है । यदि राजा निरालस होकर
अपराधियों को दण्ड न दे तो काँटे में मछलियों की भांति बल-
वान् लोग निर्बलों को भून डालें ॥ १६-२० ॥
अद्यात्काकः पुरोडाशं श्वा च लिह्याद्धविस्तथा ।
स्वाम्यं च न स्यात्कस्मिंश्चित्प्रवर्तेताधरोत्तरम् ॥ २१ ॥
सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।
दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥ २२ ॥
देवदानवगन्धर्वरक्षांसि पतगोरगाः ।
तेऽपि भोगाय कल्पन्ते दण्डेनैव निपीडिताः ॥ २३ ॥
राजा दण्ड न करे तो कौआ पुरोडाश खा जायँ, कुत्ता यज्ञ
बलि चाट जायँ, कोई किसी का स्वामी न हो सके और सब
ऊंची नीची बातों का विचार भ्रष्ट हो जाय । पवित्र मन का पुरुष
दुर्लभ है। सब लोग दण्डही से सन्मार्ग में रहते हैं और जगत् के
वैभव को भोग सकते हैं। देव, दानव, गन्धर्व, राक्षस, पक्षी और सर्प

सातवां अध्याय। २११

सातवां अध्याय। २११
भी दण्डही से दबकर अपने भोग को भोग सकते हैं॥ २१-२३॥
दुष्येयुः सर्ववर्णाश्च भिद्येरन् सर्वसेतवः ।
सर्वलोकप्रकोपश्च भवेद्दण्डस्य विभ्रमात् ॥ २४ ॥
यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा ।
प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत्साधु पश्यति ॥ २५ ॥
तस्याहुः संप्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम् ।
समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम् ॥ २६ ॥
तं राजा प्रणयन्सम्पक् त्रिवर्गेणाभिवर्धते ।
कामात्मा विषमः क्षुद्रो दण्डेनैव निहन्यते ॥ २७ ॥
दण्डो हि सुमहत्तेजो दुर्धरश्चाकृतात्मभिः ।
धर्माद्विचलितं हन्ति नृपमेव सबान्धवम् ॥ २८ ॥
दण्ड के बिना सब वर्ण विरुद्धाचरण में प्रवृत्त हो जावें और
चतुर्वर्गरूप पुल टूटजावे । और सबलोगों में उपद्रव हो जावे ।
जिस देश में श्यामवर्ण, रक्तनेत्र, पापनाशक दण्ड बिचरता है और
राजा सब तरफ न्यायदृष्टि से देखता है, वहां प्रजा को दुःख
नहीं होता । जो राजा उस दण्ड का उचित प्रयोग करता है वह
अर्थ, धर्म और काम से वृद्धि पाता है। परन्तु कामी, क्षुद्रवृत्ति
हो तो उस दण्ड से स्वयं नष्ट हो जाता है। वास्तव में दण्ड में
बड़ा तेज है, उसका धारण साधारण राजा नहीं कर सकते हैं। धर्म
से चलित राजा को यह कुटुम्ब सहित नष्ट कर देता है ॥ २४-२८ ॥
ततो दुर्गं च राष्ट्रं च लोकं च सचराचरम् ।
अन्तरिक्षगतांश्चैव मुनीन् देवांश्च पीडयेत् ॥ २९ ॥
सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना ।

२१२ मनुस्मृति ।
न शक्यो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेषु च ॥ ३० ॥
शुचिना सत्यसंधेन यथाशास्त्रानुसारिणा ।
प्रणेतुं शक्यते दण्डः सुसहायेन धीमता ॥ ३१ ॥
उसके बाद क़िला, देश और चराचर जगत् का नाश करता
है। अन्तरिक्षवासी देवता और मुनियों को भी पीड़ा पहुँचाता
है। मन्त्री या सेना की सहायता से रहित, लोभी, मूर्ख, निर्बुद्धि,
विषयासक्त राजा से वह दण्ड अर्थात् राजधर्म नहीं चल सकता।
न्यायपूर्वक मिले धन से शुद्ध, सत्यप्रतिज्ञ, शास्त्रानुसार बर्ताव
करनेवाला बुद्धिमान् राजा, मन्त्री आदि की सहायता से दण्ड-
विधान कर सकता है अर्थात् ऐसा राजा शिक्षा करने लायक़
होता है ॥ २६-३१ ॥
स्वराष्ट्रे न्यायवृत्तः स्याद्भृशदण्डश्च शत्रुषु ।
सुहृत्स्वजिह्मः स्निग्धेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः॥ ३२ ॥
एवंवृत्तस्य नृपतेः शिलोञ्छेनापि जीवतः ।
विस्तीर्यते यशो लोके तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥ ३३ ॥
अतस्तु विपरीतस्य नृपतेरजितात्मनः ।
संक्षिप्यते यशो लोके घृतबिन्दुरिवाम्भसि ॥ ३४ ॥
स्वे स्वे धर्मे निविष्टानां सर्वेषामनुपूर्वशः ।
वर्णानामाश्रमाणां च राजा सृष्टोऽभिरक्षिता ॥ ३५ ॥
राजा को अपने राज्य में न्यायकारी और शत्रुओं को सदा
दण्ड देनेवाला, हितैषियों से कुटिलता रहित और ब्राह्मणों पर
क्षमावान् होना चाहिए। ऐसा बर्ताव करनेवाले, शिलोञ्छवृत्ति
से भी जीते हुए राजा का यश लोक में जल में तेल की बूंद के
समान फैलता है । विषयासक्त और उक्तरीति से विपरीत
आचरण करनेवाले का यश पानी में घी के बूंद की भांति संकोच

सातवां अध्याय । २१३

सातवां अध्याय । २१३
को प्राप्त होता है। अपने अपने धर्म में चलनेवाले सब वर्णों
और आश्रमों की रक्षा करनेवाला प्रजापति ने राजा उत्पन्न
किया है ॥ ३२-३५ ॥
तेन यद्यत्सभृत्येन कर्तव्यं रक्षता प्रजाः ।
तत्तद्वोऽहं प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ ३६ ॥
ब्राह्मणान् पर्युपासीत प्रातरुत्थाय पार्थिवः ।
त्रैविद्यवृद्धान् विदुषस्तिष्ठेत्तेषां च शासने ॥ ३७ ॥
वृद्धांश्च नित्यं सेवेत विप्रान् वेदविदःशुचीन् ।
वृद्धसेवी हि सततं रक्षोभिरपि पूज्यते ॥ ३८ ॥
इसलिए मन्त्रियों सहित राजा को प्रजारक्षा के लिए जो जो
कर्म करने चाहिएं उनको क्रम से कहता हूं—राजा को प्रातःकाल
उठकर तीनों वेदों में पारङ्गत, श्रेष्ठ, विद्वान्, ब्राह्मणों के साथ बैठना
और उनकी आज्ञानुसार आचरण करना चाहिए। वेदज्ञ, पवित्र,
वृद्ध ब्राह्मणों की नित्य सेवा राजा करे, क्योंकि वृद्धसेवा में तत्पर
राजा दुष्ट कुजीवों से भी सत्कार पूजा पाता है ॥ ३६-३८ ॥
तेभ्योऽधिगच्छेद्विनयं विनीतात्मापि नित्यशः ।
विनीतात्मा हि नृपतिर्न विनश्यति कर्हिचित् ॥ ३६ ॥
बहवोऽविनयान्नष्टा राजानः सपरिच्छदाः ।
वनस्था अपि राज्यानि विनयात्प्रतिपेदिरे ॥ ४० ॥
वेनो विनष्टोऽविनयान्नहुषश्चैव पार्थिवः ।
सुदासो यवनश्चैव सुमुखो निमिरेव च ॥ ४१ ॥
पृथुस्तु विनयाद्राज्यं प्राप्तवान् मनुरेव च ।
कुबेरश्च धनैश्वर्यं ब्राह्मण्यं चैव गाधिजः ॥ ४२ ॥

२१४ मनुस्मृति ।
शिक्षित राजा भी ऐसे योग्य ब्राह्मणों से नित्य विनय सीखे ।
क्योंकि विनीत राजाको कभी हानि नहीं पहुँचती । बहुत से राजा
अविनय से धन सम्पत्ति सहित नष्ट होगये और बहुत से जङ्गल में
रहकर भी अपने विनय से राज्य पागए हैं । राजा वेन, नहुष,
सुदास, यवन, सुमुख और निमि अपने अविनय-दुराचार से नष्ट
होगये । पृथु और मनुने विनय से राज्य पाया। कुवेर ने धनाधिपत्य
और विश्वामित्र ने ब्राह्मण्य को पाया ॥ ३६-४२ ॥
त्रैविद्येभ्यस्त्रयीं विद्यां दण्डनीतिं च शाश्वतीम् ।
आन्वीक्षिकीं चात्मविद्यां वार्तारम्भांश्च लोकतः ॥ ४३ ॥
इन्द्रियाणां जये योगं समातिष्ठेदिवानिशम् ।
जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः ॥ ४४ ॥
दशकामसमुत्थानि तथाष्टौ क्रोधजानि च ।
व्यसनानि दुरन्तानि प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥ ४५ ॥
कामजेषु प्रसक्तो हि व्यसनेषु महीपतिः ।
वियुज्यन्तेऽर्थधर्माभ्यां क्रोधजेष्वात्मनैव तु ॥ ४६ ॥
वेदज्ञों से वेद, दण्डनीति, ब्रह्मविद्या को पढ़े । और अर्थशास्त्र
वगैरह व्यवहार विद्या को पढ़े । इन्द्रियों को वश में रखने का सदा
उद्योग करे क्योंकि जितेन्द्रिय राजा ही प्रजा को वश में रख
सकता है । काम से पैदाहुए दश और क्रोध से पैदाहुए आठ
व्यसनों का कोई अन्त नहीं है इनसे राजा को यत्नपूर्वक बचना
चाहिए । काम से पैदा व्यसनों में आसक्त राजा अर्थ और धर्म से
हीन होजाता है और क्रोध से पैदाहुए व्यसनों में लग जाने से
अपने शरीर से ही नष्ट होजाता है ॥ ४३-४६ ॥
मृगयाक्षो दिवास्वप्नः परीवादः स्त्रियो दमः ।
तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः ॥ ४७ ॥

सातवां अध्याय। २१५

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सातवां अध्याय। २१५

पैशुन्यं साहसं द्रोहं ईर्ष्यासूयार्थदूषणम् ।
वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोऽपि गणोऽष्टकः॥ ४८ ॥
द्वयोरप्येतयोर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः ।
तं यत्नेन जयेल्लोभं तज्जावेतावुभौ गणौ ॥ ४६ ॥
पानमक्षास्त्रियश्चैव मृगया च यथाक्रमम् ।
एतत्कष्टतमं विद्याच्चतुष्कं कामजे गणे ॥ ५० ॥
दण्डस्य पातनं चैव वाक्पारुष्यार्थदूषणे ।
क्रोधजेऽपि गणे विद्यात्कष्टमेतत्त्रिकं सदा ॥ ५१ ॥
शिकार, जुआ, दिन में सोना, दूसरे के दोषों को कहना, स्त्री-
संभोग, मद्यपान, नाच, बाजा और व्यर्थ घूमना ये दश कामके व्यसन
हैं अर्थात् काम से पैदा हुए हैं। चुगली, साहस, द्रोह, ईर्षा, दूसरे
के गुणों में दोष लगाना, द्रव्य हरलेना, गाली देना, कठोरपन ये आठ
क्रोध से उत्पन्न व्यसन हैं। विद्वान् लोग इन दोनों प्रकार के दोषों
का कारण लोभ कहते हैं, इसलिए लोभ को अवश्य छोड़ देना चा-
हिए । काम से पैदा व्यसनों में मद्यपान, जुआ, स्त्रीसंग और
शिकार ये एक से एक बढ़कर दुःखदायी हैं । और क्रोध से पैदा
व्यसनों में मारपीट, कठोर वचन, दूसरे की धनहानि करना ये
तीन बड़े दुःखदायी हैं ॥ ४७-५१ ॥
सप्तकस्यास्य वर्गस्य सर्वत्रैवानुषङ्गिणः ।
पूर्वं पूर्वं गुरुतरं विद्याद्व्यसनमात्मवान् ॥ ५२ ॥
व्यसनस्य च मृत्योश्च व्यसनं कष्टमुच्यते ।
व्यसन्यधोऽधो व्रजति स्वर्यात्यव्यसनी मृतः ॥ ५३ ॥
मौलाञ्छास्त्रविदः शूराल्लब्धलक्षान्कुलोद्गतान् ।
सचिवान्सप्त चाष्टौ वा प्रकुर्वीत परीक्षितान् ॥ ५४ ॥

२१६ मनुस्मृति।
इस प्रकार ये सात व्यसन और इनके सम्बन्धवाले व्यसनों
में एक से दूसरा अधिक कष्टदायक है । मृत्यु से व्यसन अधिक
कष्टदायक माना जाता है। व्यसनी पुरुष मरकर नरक में पड़ता है
और जो व्यसन से दूर है, वह स्वर्गगामी होता है । परंपरा
से राजसेवक, नीतिविद्या में चतुर, शूरवीर, अच्छा निशाना
लगाने वाले, कुलीन और असमय में परीक्षित, सात या आठ
मुख्य राजमंत्री रखना चाहिए ॥ ५२-५४ ॥
अपि यत्सुकरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् ।
विशेषतोऽसहायेन किन्तु राज्यं महोदयम् ॥ ५५ ॥
तैः सार्धं चिन्तयेन्नित्यं सामान्यं संधिविग्रहम् ।
स्थानं समुदयं गुप्तिं लब्धप्रशमनानि च ॥ ५६ ॥
तेषां स्वं स्वमभिप्रायमुपलभ्य पृथक् पृथक् ।
समस्तानां च कार्येषु विदध्याद्धितमात्मनः ॥ ५७ ॥
सर्वेषां तु विशिष्टेन ब्राह्मणेन विपश्चिता ।
मन्त्रयेत्परमं मन्त्रं राजा षाड्गुण्यसंयुतम् ॥ ५८ ॥
नित्यं तस्मिन् समाश्वस्तः सर्वकार्याणि निःक्षिपेत् ।
तेन सार्धं विनिश्चित्य ततः कर्म समारभेत् ॥ ५६ ॥
अन्यानपि प्रकुर्वीत शुचीन् प्राज्ञानवस्थितान् ।
सम्यगर्थसमाहर्तॄनमात्यान्सुपरीक्षितान् ॥ ६० ॥
जबकि गृहस्थ का एक छोटासा भी काम एक पुरुष को करना क-
ठिन पड़ता है तब बड़ा भारी राजकार्य बिना सहाय अकेला राजा
कैसे कर सकता है ? उन मन्त्रियों के साथ साधारण संधि-विग्रह
की सलाह और दण्ड, पुर, राष्ट्र, स्थान आदि का विचार करे ।
द्रव्य मिलने के उपाय, धनरक्षा, देशरक्षा आदि का भी परामर्श
करे । उन मन्त्रियों की अलग अलग सलाह लेकर जो अपना हित-

सातवां अध्याय । २१७

सातवां अध्याय । २१७
कर कार्य हो वह करे । उन मन्त्रियों में विद्वान्, धार्मिक ब्राह्मण
मन्त्री के साथ संधि, विग्रह, आदि छ गुणोंवाला विचार करे।
विश्वास के साथ उस मंत्रीपर, सब कामों का भार रक्खे और
उसके साथ सम्मति लेकर कार्य करे । पवित्र, बुद्धिमान्, स्थिर-
स्वभाव, संन्मार्ग से धन लानेवाले, परीक्षा किये हुए और भी
मन्त्रियों को रक्खे ॥ ५५-६० ॥
निवर्तेतास्य यावद्भिरिति कर्तव्यता नृभिः ।
तावतोऽतन्द्रितान् दक्षान् प्रकुर्वीत विचक्षणान् ॥ ६१ ॥
तेषामर्थे नियुञ्जीत शूरान् दक्षान् कुलोद्गतान् ।
शुचीनाकरकर्मान्ते भीरूनन्तर्निवेशने ॥ ६२ ॥
जितने मनुष्यों से पूरा काम निकले, उतने निरालस बुद्धिमान्
राजकर्मचारियों की भरती करे । उनमें शूर, चतुर, कुलीन को
खज़ाने के काम में नियुक्त करे, और डरपोकों को महलों के भीतर
नियुक्त करे ॥ ६१-६२ ॥
दूतं चैव प्रकुर्वीत सर्वशास्त्रविशारदम् ।
इङ्गिताकारचेष्टज्ञं शुचिं दक्षं कुलोद्गतम् ॥ ६३ ॥
अनुरक्तः शुचिर्दक्षः स्मृतिमान् देशकालवित् ।
वपुष्मान् वीतभीर्वाग्मी दूतो राज्ञः प्रशस्यते ॥ ६४ ॥
अमात्ये दण्ड आयत्तो दण्डे वैनयिकी क्रिया ।
नृपतौ कोशराष्ट्रे च दूते संधिविपर्ययौ ॥ ६५ ॥
दूत एव हि संधत्ते भिनत्त्येव च संहतान् ।
दूतस्तत्कुरुते कर्म भिद्यन्ते येन मानवाः ॥ ६६ ॥
स विद्यादस्य कृत्येषु निगूढेङ्गितचेष्टितैः ।
२८

२१८ मनुस्मृति।
आकारमिङ्गितं चेष्टां भृत्येषु च चिकीर्षितम् ॥ ६७॥
बुद्ध्वा च सर्वं तत्त्वेन परराजचिकीर्षितम् ।
तथा प्रयत्नमातिष्ठेद्यथात्मानं न पीडयेत् ॥ ६८ ॥
और दूत उसको रक्खे जो बहुश्रुत हो और हृदय के भाव, आ-
कार, चेष्टाओं को जानने वाला, अन्तःकरण का शुद्ध, चतुर और
कुलीन हो। शत्रु का भी प्रेमपात्र, आचारपवित्र, कार्यकुशल,
पूर्वापर बातों का स्मरण रखनेवाला, देश-कालज्ञाता, सुन्दर,
निर्भय और वाचाल राजा का दूत प्रशंसा के लायक होता है।
मन्त्री के अधीन दण्ड और दण्ड के अधीन शिक्षा है। राजा के
अधीन देश और खज़ाना है और दूत के अधीन मेल या बिगाड़
रहता है। दूत ही आपस के शत्रुओं को मिलाता है और मिले हुए को
अलग़ाता है। दूत वह काम करता है जिससे मनुष्य लड़कर जुदा
होजाते हैं। दूत शत्रु के आकार, मनोभाव, और चेष्टाओं से उस
के लिये अभिप्राय को जाने। दूत द्वारा शत्रु की सब चालों को ठीक
ठीक जानकर, राजा ऐसा उपाय करे, जिससे वह शत्रु राजा कोई
पीड़ा न देसके ॥ ६३-६८ ॥
जाङ्गलं सस्यसम्पन्नमार्यप्रायमनाविलम् ।
रम्यमानतसामन्तं स्वाजीव्यं देशमावसेत् ॥ ६६ ॥
धन्वदुर्गं महीदुर्गमब्दुर्गं वार्क्षमेव वा ।
नृदुर्गं गिरिदुर्गं वा समाश्रित्य वसेत् पुरम् ॥ ७० ॥
जहां जङ्गल हो, खेती अच्छी हो, शिष्ट पुरुष बसते हों, रोगादि
उपद्रवों से रहित हो, देखने में सुन्दर हो, आसपास के मनुष्य
अदब रखते हों, ऐसे स्वाधीन देश में राजा को रहना चाहिए।
धनुदुर्ग, महीदुर्ग, जलदुर्ग, वृक्षदुर्ग, सेनादुर्ग वा गिरिदुर्ग इन दुर्ग-
क़िलाओं में किसीके आश्रय में नगर वसाना चाहिए ॥ ६६-७० ॥
सर्वेण तु प्रयत्नेन गिरिदुर्गं समाश्रयेत् ।

सातवां अध्याय। २१६

सातवां अध्याय। २१६
एषां हि बाहुगुण्येन गिरिदुर्गं विशिष्यते ॥ ७१ ॥
त्रीण्याद्यान्याश्रितास्तेषां मृगगर्ताश्रयाप्‌चराः ।
त्रीण्युत्तराणि क्रमशः प्लवङ्गमनरामराः ॥ ७२ ॥
यथा दुर्गाश्रितानेतान्नोपहिंसन्ति शत्रवः ।
तथारयो न हिंसन्ति नृपं दुर्गसमाश्रितम् ॥ ७३ ॥
एकः शतं योधयति प्राकारस्थो धनुर्धरः ।
शतं दशसहस्राणि तस्माद्दुर्गं विधीयते ॥ ७४ ॥
तत्स्यादायुधसंपन्नं धनधान्येन वाहनैः ।
ब्राह्मणैः शिल्पिभिर्यन्त्रैर्यवसेनोदकेन च ॥ ७५ ॥
तस्य मध्ये सुपर्याप्तं कारयेद्गृहमात्मनः ।
गुप्तं सर्वर्तुकं शुभ्रं जलवृक्षसमन्वितम् ॥ ७६ ॥
इन दुर्गों में गिरिदुर्ग श्रेष्ठ है। इसलिए सब यत्नों से उसका
आश्रय ठीक है। उक्त दुर्गों में प्रथम तीन में क्रम से मृग, चूहा और
नाक रहते हैं। बाक़ी तीनों में वानर, मनुष्य और देवता निवास
करते हैं। जैसे इन दुर्गों में रहनेवाले मृगादि को कोई हिंसक नहीं
मार सकते, ऐसे ही गिरिदुर्ग का आश्रय करनेवाले राजा को शत्रु
नहीं मार सकते हैं। क़िले के भीतर रहनेवाला एक धनुर्धर सौ
योद्धाओं से लड़ सकता है और सौ धनुर्धर दश हज़ार के साथ
लड़ सकते हैं। इसीसे क़िला बनाया जाता है। वह क़िला
हथियार, धन, धान्य, वाहन, ब्राह्मण, शिल्पविशारद, यन्त्र-कल,
घास और जल से परिपूर्ण रक्खे। उस क़िले के बीच में, प्रयोजन
भर के लिए एक मकान बनावे, जो सब ऋतुओं के फल-पुष्प युक्त,
सफ़ेदी किया हुआ, जल और वृक्षों के सहित हो ॥ ७१-७६ ॥
तदध्यास्योद्वहेद्भार्यां सवर्णां लक्षणान्विताम् ।

२२० मनुस्मृति ।
कुले महति संभूतां हृद्यां रूपगुणान्विताम् ॥ ७७ ॥
पुरोहितं च कुर्वीत वृणुयादेव चर्त्विजम् ।
तेऽस्य गृह्याणि कर्माणि कुर्युर्वैतानिकानि च ॥ ७८ ॥
उस मकान-महल में रहकर राजा, अपने वर्ण की, कुलीन मनो-
हारिणी, रूपवती, गुणवती कन्या का विवाह करे। और शान्तिक,
पौष्टिक कर्म करनेवाला पुरोहित और ऋत्विज का वरण करे जो
अग्निहोत्रादि कर्म करें ॥ ७७-७८ ॥
यजेत राजा क्रतुभिर्विविधैराप्तदक्षिणैः ।
धर्मार्थं चैव विप्रेभ्यो दद्याद्भोगान् धनानि च ॥ ७९ ॥
सांवत्सरिकमाप्तैश्च राष्ट्रादाहारयेद्बलिम् ।
स्याच्चाम्नायपरो लोके वर्तेत पितृवन्नृषु ॥ ८० ॥
अध्यक्षान् विविधान्कुर्यात्तत्र तत्र विपश्चितः ।
तेऽस्य सर्वाण्यवेक्षेरन्नृणां कार्याणि कुर्वताम् ॥ ८१ ॥
आवृत्तानां गुरुकुलाद्विप्राणां पूजको भवेत् ।
नृपाणामक्षयो ह्येष निधिर्ब्राह्मोऽभिधीयते ॥ ८२ ॥
न तं स्तेना न चामित्रा हरन्ति न च नश्यति ।
तस्माद्राज्ञा निधातव्यो ब्राह्मणेष्वक्षयो निधिः ॥ ८३ ॥
राजा, बहुत दक्षिणावाले अनेक यज्ञों को करे और धर्म के लिए
ब्राह्मणों को नाना विधि दान-दक्षिणा देवै । किसी विश्वासपात्र
मनुष्य के द्वारा साल में राजकर का संग्रह करावे, प्रजा में नीति से
बर्ताव करे और पिता के समान स्नेह करे। नाना प्रकार के कामों
को जानने वाले पुरुष, अलग अलग कामों पर अध्यक्ष-अफ़सर
नियुक्त करे। जो राजा के सब कार्यकर्त्ताओं पर निगरानी रक्खें।

सातवां अध्याय। २२१

सातवां अध्याय। २२१
गुरुकुल से विद्या पढ़कर लौटे हुए ब्राह्मणों का पूजन करे, क्योंकि
इससे राजाओं को अक्षय ब्रह्म प्राप्ति होती है ॥ ७६-८३ ॥
न स्कन्दते न व्यथते न विनश्यति कर्हिचित् ।
वरिष्ठमग्निहोत्रेभ्यो ब्राह्मणस्य मुखे हुतम् ॥ ८४ ॥
समसब्राह्मणे दानं द्विगुणं ब्राह्मणब्रुवे ।
प्राधीते शतसाहस्रमनन्तं वेदपारगे ॥ ८५ ॥
पात्रस्य हि विशेषेण श्रद्धानतयैव च ।
अल्पं वा बहु वा प्रेक्ष्य दानस्यावाप्यते फलम् ॥ ८६ ॥
इस अक्षय निधि को चोर नहीं चुराते, शत्रु नहीं छीन सकते।
खोया नहीं जासकता ! इसलिए राजा, ब्राह्मणों में उस अक्षयनिधि
का स्थापन करे। अग्नि में जो हवन किया जाता है वह कभी
गिर जाता है, कभी सूख जाता है, कभी नष्ट होजाता है; पर गुरु-
कुल से आये ब्राह्मण के मुख में जो हवन किया जाता है वह अग्नि-
होत्रादि से भी श्रेष्ठ है। ब्राह्मण के सिवा दूसरी जाति को दिया दान,
मध्यम फलदायक होता है। जो अपने को ब्राह्मण कहता है उसको
दिया दान दोगुना फल, पठित ब्राह्मण को दिया लाखगुना, और
वेदविशारद ब्राह्मण को दिया दान अनन्त फलदायक होता है।
पात्र की योग्यता और श्रद्धा की न्यूनाधिकता के अनुसार दाता
को दान का फल मिलता है ॥ ८४-८६ ॥
समोत्तमाधमै राजा त्वाहूतः पालयन् प्रजाः ।
न निवर्तेत संग्रामात्क्षात्रं धर्ममनुस्मरन् ॥ ८७ ॥
संग्रामेष्वनिवर्तित्वं प्रजानां चैव पालनम् ।
शुश्रूषा ब्राह्मणानां च राज्ञां श्रेयस्करं परम् ॥ ८८ ॥
आहवेषु मिथोऽन्योन्यं जिघांसन्तो महीक्षितः ।

२२२ मनुस्मृति ।
युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्गं यान्त्यपराङ्मुखाः ॥ ८९ ॥
न कूटैरायुधैर्हन्याद्युध्यमानो रणे रिपून् ।
न कर्णिभिर्नापि दिग्धैर्नाग्निज्वलिततेजनैः ॥ ९० ॥
न च हन्यात्स्थलारूढं न क्लीबं न कृताञ्जलिम् ।
न मुक्तकेशं नासीनं न तवास्मीति वादिनम् ॥ ९१ ॥
न सुप्तं न विसन्नाहं न नग्नं न निरायुधम् ।
नायुध्यमानं पश्यन्तं न परेण समागतम् ॥ ९२ ॥
अपने समान, उत्तम, या अधम राजा यदि रण-निमन्त्रण देवे
तो क्षत्रियधर्म के अनुसार राजा को पीछे पैर न रखना चाहिए ।
संग्राम से न हटना, प्रजापालन, ब्राह्मणों की सेवा ये सब राजाओं
का परम कल्याण करनेवाला है। जो राजा संग्राम में आपस में खूब
युद्ध करते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं। रण में, कूट-छिपे अस्त्रों से, कर्णी
बाण जो चुभ जानेपर नहीं निकलता, ज़हर के बुझे और आग के
जले अस्त्रों से शत्रु को न मारे। ज़मीन में खड़े हुए शत्रु को, नपुंसक
को, हाथ जोड़ने वाले को न मारे । खुले बालोंवाले को, बैठे को,
और जो कहे-' मैं तुम्हारा हूं' उसको न मारे । सोते हुए को, टूटे
कवचवाले को, नंगे को, शस्त्रहीन को, युद्ध न करनेवाले को, संग्राम
देखते हुए को और दूसरे शत्रु से लड़ते हुए को न मारे ॥ ८७-९२ ॥
नायुधव्यसनप्राप्तं नार्तं नातिपरिक्षतम् ।
न भीतं न परावृत्तं सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ ९३ ॥
यस्तु भीतः परावृत्तः संग्रामे हन्यते परैः ।
भर्तुर्यद्दुष्कृतं किञ्चित्तत्सर्वं प्रतिपद्यते ॥ ९४ ॥
टूटे शस्त्रवाले को, पुत्रादि शोक से दुःखी को, बहुत घाववाले को
डरपोक को, भागनेवाले को भी न मारना । जो युद्ध से डरकर

सातवां अध्याय । २२३

सातवां अध्याय । २२३
पीछे भगता है और शत्रु उसको मार डालते हैं, वह अपने राजा
का सब पाप पाता है ॥ ९३-९४ ॥
यच्चास्य सुकृतं किंचिदमुत्रार्थमुपार्जितम् ।
भर्त्ता तत्सर्वमादत्ते परावृत्तहतस्य तु ॥ ९५ ॥
रथाश्वं हस्तिनं छत्रं धनं धान्यं पशून् स्त्रियः ।
सर्वद्रव्याणि कुप्यं च यो यज्जयति तस्य तत् ॥ ९६ ॥
राज्ञश्च दद्युरुद्धारमित्येषा वैदिकी श्रुतिः ।
राज्ञा च सर्वयोधेभ्यो दातव्यमपृथग्जितम् ॥ ९७ ॥
एषोऽनुपस्कृतः प्रोक्तो योधधर्मः सनातनः ।
अस्माद्धर्मान्न च्यवेत क्षत्रियो घ्नन् रणे रिपून् ॥ ९८ ॥
जो लड़ाई से भगा हुआ मारा जाता है, उसके पुण्य का भाग
सब स्वामी को मिलता है । युद्ध में रथ, घोड़ा, हाथी, छत्र, धन,
धान्य, पशु, स्त्री और सब भांति के पदार्थ जो जिसको जीते, वह
उसका है । जीते पदार्थों में सोना, चांदी आदि उत्तम पदार्थ राजा
को अर्पण करे-ऐसी वेद की श्रुति है । और साथ में जीती वस्तु,
हिस्सा माफ़िक, राजा सब योद्धाओं को बांट देवे । यह सनातन,
अनिन्दित, शुद्ध योद्धाओं का धर्म कहा गया है । संग्राम में क्षत्रिय
को इन धर्मों से च्युत न होना चाहिए ॥ ९५-९८ ॥
अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेत्प्रयत्नतः ।
रक्षितं वर्धयेच्चैव वृद्धं पात्रेषु निःक्षिपेत् ॥ ९९ ॥
एतच्चतुर्विधं विद्यात्पुरुषार्थप्रयोजनम् ।
अस्य नित्यमनुष्ठानं सम्यक्कुर्यादतन्द्रितः ॥ १०० ॥
अलब्धमिच्छेदण्डेन लब्धं रक्षेद्दवेक्षया ।

२२४ · मनुस्मृति ।
रक्षितं वर्धयेद्वृद्ध्या वृद्धं दानेन निक्षिपेत् ॥ १०१ ॥
नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुषः ।
नित्यं संवृतसर्वार्थो नित्यं छिद्रानुसार्थरेः ॥ १०२ ॥
जो पदार्थ नहीं मिला है उसके लेने की इच्छा, मिले हुए की रक्षा
करे। जो रक्षित है, उसको बढ़ावे और बढ़े पदार्थ सुपात्रों को देवे ।
यह चार प्रकार का पुरुषार्थ है । आलस्य छोड़ कर, नित्य भली
भांति इसका अनुष्ठान किया करे । जो नहीं प्राप्त है, उसको दण्ड-
सेना से जीतने की इच्छा करे, प्राप्त वस्तु की देख भाल से रक्षा
करे, रक्षित का व्यापार-उद्यम से वृद्धि करे और बढ़ी वस्तु शास्त्रा-
नुसार, सुपात्र को देवे । राजा अपराधियों के लिए दण्ड उद्यत
रक्खे, पुरुषार्थ को ठीक रक्खे, अपने अर्थों को गुप्त रक्खे और शत्रु
के छिद्रों को देखा करे ॥ ६६-१०२ ॥
नित्यमुद्यतदण्डस्य कृत्स्नमुद्विजते जगत् ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि दण्डेनैव प्रसाधयेत् ॥ १०३ ॥
अमाययैव वर्तेत न कथंचन मायया ।
बुध्येतारिप्रयुक्तां च मायां नित्यं स्वसंवृतः ॥ १०४ ॥
नास्यच्छिद्रं परो विद्याद्विद्याच्छिद्रं परस्य तु ।
गूहेत्कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद्विवरमात्मनः ॥ १०५ ॥
बकवच्चिन्तयेदर्थान् सिंहवच्च पराक्रमेत् ।
वृकवच्चावलुम्पेत शशवच्च विनिष्पतेत् ॥ १०६ ॥
सदा उद्यत दण्डवाले राजा से, सारा जगत् डरता है । इसलिए
दण्ड ही से सब प्राणियों को स्वाधीन रक्खे। छल से कोई व्यवहार
न करे । अपनी रक्षा करता रहे और शत्रु के छलों को जानता रहे ।
ऐसा उपाय करे जिसमें अपना छिद्र-दोष शत्रु न जाने । परन्तु शत्रु

के छिद्रों को खुद जाने । राजा, कछुवे के समान राजकीय अङ्गों
को छिपा रक्खे, जिससे अपना छिद्र न ज़ाहिर होवे। बगला की
भांति एकचित्त होकर, राजकार्यों का विचार करे। सिंह के समान
शत्रुओं से पराक्रम रक्खे, भेड़िये के समान मौक़ा पाकर शत्रुक्षय
करे। और खरगोश के समान, आपत्तियों से भग जावे ॥ १०३-१०६॥
एवं विजयमानस्य येऽस्य स्युः परिपन्थिनः ।
तानानयेद्वशं सर्वान्सामदिभिरुपक्रमैः ॥ १०७ ॥
यदि ते तु न तिष्ठेयुरुपायैः प्रथमैनिभिः ।
दण्डेनैव प्रसह्यैतांञ्छनकैर्वशमानयेत् ॥ १०८ ॥
सामादीनामुपायानां चतुर्णामपि पण्डिताः ।
सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्राभिवृद्धये ॥ १०६ ॥
यथोद्धरति निर्दाता कक्षं धान्यं च रक्षति ।
तथा रक्षेन्नृपो राष्ट्रं हन्याच्च परिपन्थिनः ॥ ११० ॥
इस प्रकार विजय करनेवाले राजा के जो शत्रु हों उनको साम-
दाम-भेद से अपने वश में करे। यदि पहले तीन उपायों से शत्रु वश
में न हो तो, उनको दण्ड द्वारा, धीरे धीरे अधीन करे। विचार-
वान् पुरुष साम, दाम, भेद, दण्ड इन चार उपायों में, राज्यवृद्धि
के लिए साम और दण्ड की प्रशंसा करते हैं। जैसे खेत निराने
वाला घास उखाड़ कर अन्न की रक्षा करता है, वैसे, राजा चोर,
लुटेरों का नाश करे, राष्ट्र की रक्षा करे ॥ १०७-११० ॥
मोहाद्राजा स्वराष्ट्रं यः कर्षयत्यनवेक्षया ।
सोऽचिराद्भ्रश्यते राज्याज्जीविताच्च सबान्धवः॥१११॥
शरीरकर्षणात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा ।
तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात् ॥११२॥
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