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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 649 में से

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पृष्ठ 349

सातवां अध्याय। २०६
ठीक ठीक विचार कर, अपने राजधर्म की सिद्धि के लिए अनेक
रूप कभी क्षमा, कभी कोप, कभी मित्रता इत्यादि धारण करता
है। जिसकी प्रसन्नता में लक्ष्मी, पराक्रम में जय और क्रोध में
मृत्यु का वास है, वह राजा सर्वतेजोमय है। उसके साथ अज्ञान
से जो द्वेष करता है, वह निःसंदेह नष्ट होजाता है। क्योंकि
उसके नाश का विचार शीघ्रही राजा मन में करता है ॥ ८-१२ ॥
तस्माद्धर्मं यमिष्टेषु स व्यवस्येन्नराधिपः ।
अनिष्टं चाप्यनिष्टेषु तं धर्मं न विचालयेत् ॥ १३ ॥
तस्यार्थे सर्वभूतानां गोप्तारं धर्ममात्मजम् ।
ब्रह्मतेजोमयं दण्डमसृजत्पूर्वमीश्वरः ॥ १४ ॥
तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
भयाद्भोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च ॥ १५ ॥
इसलिए राजा अपने अनुकूल मित्र और शत्रु के लिए जिस
धर्म क़ानून का स्थापन करे उसको कभी न तोड़ना चाहिए।
प्रजापति ने राजा के लिए सब प्राणियों की रक्षा करनेवाले,
ब्रह्मतेजोमय, धर्मरूप और अपने पुत्ररूप दण्ड को पहले ही से
पैदा किया है। दण्ड के भय से चराचर सब प्राणी अपने भोग
को प्राप्त होते हैं और धर्म से विचलित नहीं होते ॥ १३-१५ ॥
तं देशकालौ शक्तिं च विद्यां चावेक्ष्य तत्त्वतः ।
यथार्हतः संप्रणयेन्नरेष्वन्यायवर्तिषु ॥ १६ ॥
स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः।
चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥ १७ ॥
दण्डो शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥ १८ ॥
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