सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 649 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 362

२२२ मनुस्मृति ।
युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्गं यान्त्यपराङ्मुखाः ॥ ८९ ॥
न कूटैरायुधैर्हन्याद्युध्यमानो रणे रिपून् ।
न कर्णिभिर्नापि दिग्धैर्नाग्निज्वलिततेजनैः ॥ ९० ॥
न च हन्यात्स्थलारूढं न क्लीबं न कृताञ्जलिम् ।
न मुक्तकेशं नासीनं न तवास्मीति वादिनम् ॥ ९१ ॥
न सुप्तं न विसन्नाहं न नग्नं न निरायुधम् ।
नायुध्यमानं पश्यन्तं न परेण समागतम् ॥ ९२ ॥
अपने समान, उत्तम, या अधम राजा यदि रण-निमन्त्रण देवे
तो क्षत्रियधर्म के अनुसार राजा को पीछे पैर न रखना चाहिए ।
संग्राम से न हटना, प्रजापालन, ब्राह्मणों की सेवा ये सब राजाओं
का परम कल्याण करनेवाला है। जो राजा संग्राम में आपस में खूब
युद्ध करते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं। रण में, कूट-छिपे अस्त्रों से, कर्णी
बाण जो चुभ जानेपर नहीं निकलता, ज़हर के बुझे और आग के
जले अस्त्रों से शत्रु को न मारे। ज़मीन में खड़े हुए शत्रु को, नपुंसक
को, हाथ जोड़ने वाले को न मारे । खुले बालोंवाले को, बैठे को,
और जो कहे-' मैं तुम्हारा हूं' उसको न मारे । सोते हुए को, टूटे
कवचवाले को, नंगे को, शस्त्रहीन को, युद्ध न करनेवाले को, संग्राम
देखते हुए को और दूसरे शत्रु से लड़ते हुए को न मारे ॥ ८७-९२ ॥
नायुधव्यसनप्राप्तं नार्तं नातिपरिक्षतम् ।
न भीतं न परावृत्तं सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ ९३ ॥
यस्तु भीतः परावृत्तः संग्रामे हन्यते परैः ।
भर्तुर्यद्दुष्कृतं किञ्चित्तत्सर्वं प्रतिपद्यते ॥ ९४ ॥
टूटे शस्त्रवाले को, पुत्रादि शोक से दुःखी को, बहुत घाववाले को
डरपोक को, भागनेवाले को भी न मारना । जो युद्ध से डरकर