मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 360, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें२२० मनुस्मृति ।
कुले महति संभूतां हृद्यां रूपगुणान्विताम् ॥ ७७ ॥
पुरोहितं च कुर्वीत वृणुयादेव चर्त्विजम् ।
तेऽस्य गृह्याणि कर्माणि कुर्युर्वैतानिकानि च ॥ ७८ ॥
उस मकान-महल में रहकर राजा, अपने वर्ण की, कुलीन मनो-
हारिणी, रूपवती, गुणवती कन्या का विवाह करे। और शान्तिक,
पौष्टिक कर्म करनेवाला पुरोहित और ऋत्विज का वरण करे जो
अग्निहोत्रादि कर्म करें ॥ ७७-७८ ॥
यजेत राजा क्रतुभिर्विविधैराप्तदक्षिणैः ।
धर्मार्थं चैव विप्रेभ्यो दद्याद्भोगान् धनानि च ॥ ७९ ॥
सांवत्सरिकमाप्तैश्च राष्ट्रादाहारयेद्बलिम् ।
स्याच्चाम्नायपरो लोके वर्तेत पितृवन्नृषु ॥ ८० ॥
अध्यक्षान् विविधान्कुर्यात्तत्र तत्र विपश्चितः ।
तेऽस्य सर्वाण्यवेक्षेरन्नृणां कार्याणि कुर्वताम् ॥ ८१ ॥
आवृत्तानां गुरुकुलाद्विप्राणां पूजको भवेत् ।
नृपाणामक्षयो ह्येष निधिर्ब्राह्मोऽभिधीयते ॥ ८२ ॥
न तं स्तेना न चामित्रा हरन्ति न च नश्यति ।
तस्माद्राज्ञा निधातव्यो ब्राह्मणेष्वक्षयो निधिः ॥ ८३ ॥
राजा, बहुत दक्षिणावाले अनेक यज्ञों को करे और धर्म के लिए
ब्राह्मणों को नाना विधि दान-दक्षिणा देवै । किसी विश्वासपात्र
मनुष्य के द्वारा साल में राजकर का संग्रह करावे, प्रजा में नीति से
बर्ताव करे और पिता के समान स्नेह करे। नाना प्रकार के कामों
को जानने वाले पुरुष, अलग अलग कामों पर अध्यक्ष-अफ़सर
नियुक्त करे। जो राजा के सब कार्यकर्त्ताओं पर निगरानी रक्खें।