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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 649 में से

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पृष्ठ 350

२१० मनुस्मृति ।
समीक्ष्य स धृतः सम्यक् सर्वा रञ्जयति प्रजाः ।
असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः ॥ १६ ॥
यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः ।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन् दुर्बलान्बलवत्तराः ॥ २० ॥
देश, काल, शक्ति और विद्या का विचार करके यथायोग्य अप-
राधियों को दण्ड देवे । वह दण्ड ही राजा है, पुरुष है, वही राज्य
को नियम में रखनेवाला है, शासक है और वही चारों आश्रमधर्म
का प्रतिभू-ज़ामिन है। दण्ड सम्पूर्ण प्रजा का शासन करता है,
दण्ड ही रक्षा करता है, सोते हुए दण्ड ही जागता है, विद्वान्
लोग दण्ड को ही धर्म मानते हैं । उस दण्ड का विचारपूर्वक
प्रयोग होने से वह सब प्रजा प्रसन्न करता है और अविचार से,
सब तरह से नाशकारक होता है । यदि राजा निरालस होकर
अपराधियों को दण्ड न दे तो काँटे में मछलियों की भांति बल-
वान् लोग निर्बलों को भून डालें ॥ १६-२० ॥
अद्यात्काकः पुरोडाशं श्वा च लिह्याद्धविस्तथा ।
स्वाम्यं च न स्यात्कस्मिंश्चित्प्रवर्तेताधरोत्तरम् ॥ २१ ॥
सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।
दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥ २२ ॥
देवदानवगन्धर्वरक्षांसि पतगोरगाः ।
तेऽपि भोगाय कल्पन्ते दण्डेनैव निपीडिताः ॥ २३ ॥
राजा दण्ड न करे तो कौआ पुरोडाश खा जायँ, कुत्ता यज्ञ
बलि चाट जायँ, कोई किसी का स्वामी न हो सके और सब
ऊंची नीची बातों का विचार भ्रष्ट हो जाय । पवित्र मन का पुरुष
दुर्लभ है। सब लोग दण्डही से सन्मार्ग में रहते हैं और जगत् के
वैभव को भोग सकते हैं। देव, दानव, गन्धर्व, राक्षस, पक्षी और सर्प