मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 357, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवां अध्याय । २१७
कर कार्य हो वह करे । उन मन्त्रियों में विद्वान्, धार्मिक ब्राह्मण
मन्त्री के साथ संधि, विग्रह, आदि छ गुणोंवाला विचार करे।
विश्वास के साथ उस मंत्रीपर, सब कामों का भार रक्खे और
उसके साथ सम्मति लेकर कार्य करे । पवित्र, बुद्धिमान्, स्थिर-
स्वभाव, संन्मार्ग से धन लानेवाले, परीक्षा किये हुए और भी
मन्त्रियों को रक्खे ॥ ५५-६० ॥
निवर्तेतास्य यावद्भिरिति कर्तव्यता नृभिः ।
तावतोऽतन्द्रितान् दक्षान् प्रकुर्वीत विचक्षणान् ॥ ६१ ॥
तेषामर्थे नियुञ्जीत शूरान् दक्षान् कुलोद्गतान् ।
शुचीनाकरकर्मान्ते भीरूनन्तर्निवेशने ॥ ६२ ॥
जितने मनुष्यों से पूरा काम निकले, उतने निरालस बुद्धिमान्
राजकर्मचारियों की भरती करे । उनमें शूर, चतुर, कुलीन को
खज़ाने के काम में नियुक्त करे, और डरपोकों को महलों के भीतर
नियुक्त करे ॥ ६१-६२ ॥
दूतं चैव प्रकुर्वीत सर्वशास्त्रविशारदम् ।
इङ्गिताकारचेष्टज्ञं शुचिं दक्षं कुलोद्गतम् ॥ ६३ ॥
अनुरक्तः शुचिर्दक्षः स्मृतिमान् देशकालवित् ।
वपुष्मान् वीतभीर्वाग्मी दूतो राज्ञः प्रशस्यते ॥ ६४ ॥
अमात्ये दण्ड आयत्तो दण्डे वैनयिकी क्रिया ।
नृपतौ कोशराष्ट्रे च दूते संधिविपर्ययौ ॥ ६५ ॥
दूत एव हि संधत्ते भिनत्त्येव च संहतान् ।
दूतस्तत्कुरुते कर्म भिद्यन्ते येन मानवाः ॥ ६६ ॥
स विद्यादस्य कृत्येषु निगूढेङ्गितचेष्टितैः ।
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