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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

१६६ मनुस्मृति ।
प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम् ।
आत्मन्यग्नीन्समारोप्य ब्राह्मणःप्रव्रजेद्गृहात् ॥३८॥
संन्यासाश्रम-धर्म ।
आश्रम से आश्रम अर्थात् ब्रह्मचर्य से गृहस्थ, उससे वानप्रस्थ
में जाकर और हवन, भिक्षा, बलि आदि से थका हुआ, संन्यास
लेनेवाला पुरुष देह त्याग करने पर मोक्ष पाता है। ऋषिरृण, देव-
ऋण और पितृऋण इन तीनों से छुटकारा पाने पर, मनको मोक्ष
धर्म में लगावे अन्यथा करने से नरकगामी होता है । विधि से
वेदाध्ययन-ऋषिऋण, धर्म विवाह से पुत्रोत्पादन—पितृऋण, यज्ञ
आदि—देवऋण, इनसे यथाशक्ति छुट्टी लेकर मोक्ष में चित्त ल-
गावे । जो पुरुष वेदादि का पठन न करके संन्यास लेता है वह
नरक में पड़ता है । सर्वस्व दक्षिणा की प्रजापति इष्टि को करके
और आत्मा में अग्नि का आधान करके ब्राह्मण को संन्यास ग्रहण
करना चाहिए ॥ ३४-३८ ॥
यो दत्त्वा सर्वभूतेभ्यः प्रव्रजत्यभयं गृहात् ।
तस्य तेजोमया लोका भवन्ति ब्रह्मवादिनः॥ ३६ ॥
यस्मादण्वपि भूतानां द्विजात्नोत्पद्यते भयम् ।
तस्य देहाद्विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥ ४० ॥
आगारादभिनिष्क्रान्तः पवित्रोपचितो मुनिः ।
समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥ ४१ ॥
एक एव चरेन्नित्यं सिद्धयर्थमसहायवान् ।
सिद्धिमेकस्य संपश्यन्न जहाति न हीयते ॥ ४२ ॥
अनग्निरनिकेतः स्याद्ग्राममन्नार्थमाश्रयेत् ।
उपेक्षकोऽशङ्कुसुको मुनिर्भावसमाहितः ॥ ४३ ॥

छठवां अध्याय । १६७

छठवां अध्याय । १६७
जो पुरुष सब प्राणियों को अभय देकर, घर से चौथे आश्रम
को जाता है उसको तेजोमय लोक प्राप्त होते हैं । जिस द्विज से
प्राणियों को ज़रा भी भय नहीं होता, उसको देह त्यागने पर कहीं
किसीका भय नहीं होता । घर से निकल कर, पवित्र दण्ड और
कमण्डलु धारण करके, मौन भाव से विचरे और सब लौकिक
कार्यों से विरक्त हो जावे । अकेला ही नित्य विचरे किसीकी मदद
न लेवे, क्योंकि अकेले ही मुक्ति मिलती है । ऐसे पुरुष को न
किसी के त्याग का दुःख होता है और न उससे दूसरे कोही दुःख
पहुँचता है । अग्नि और घर को छोड़कर भिक्षा के लिए गाँव का
सहारा रक्खे । दुःख में चिन्ता न करे और स्थिर चित्त से काल
बितावे ॥ ३६-४३ ॥
कपालं वृक्षमूलानि कुचेलमसहायता ।
समता चैव सर्वस्मिन्नेतन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ ४४ ॥
नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम् ।
कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा ॥ ४५ ॥
दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् ।
सत्यपूतां वदेद्वाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥ ४६ ॥
भिक्षापात्र, वृक्ष के नीचे निवास, फटे टूटे वस्त्र, किसी की
मदद न लेना और सब के ऊपर समान भाव रखना, ये सब मुक्त
पुरुष के लक्षण हैं। न मरने की और न जीने की ही इच्छा करे
किन्तु काल की प्रतीक्षा किया करे जैसे नौकर आज्ञा की प्रतीक्षा
करता है। आँखों से देखकर भूमि में पैर धरे, जल छानकर पीवे,
सत्य वाणी बोले और मन पवित्र रखकर आचरण करे ॥ ४४-४६ ॥
अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन ।
न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥ ४७ ॥
क्रुध्यन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रुष्टः कुशलं वदेत् ।

१६८ मनुस्मृति।
सप्तद्वारावकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत् ॥ ४८ ॥
अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः।
आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह ॥ ४६ ॥
कोई व्यर्थ झगड़ा करे तो उसको सहन करे, किसीका अपमान
न करे। और इस देह से किसी से वैर करना भी अच्छा नहीं है।
क्रोध करनेवाले पर क्रोध, निन्दक की निन्दा न करे वरन कुशल
वृत्तान्त उसका पूंछे। पांच इन्द्रियां, मन और बुद्धि इन सात द्वारों
में बिखरी हुई असत्य वाणी न बोले, किन्तु ईश्वर चिन्ता में लगा
रहे। परब्रह्म के ध्यान में मग्न, योगासन से स्थित, ममता को छोड़-
कर, केवल अपनी सहायता से ही मोक्षसुख चाहता हुआ इस
जगत् में विचरे ॥ ४७-४६ ॥
न चोत्पातनिमित्ताभ्यां न नक्षत्राङ्गविद्यया।
नानुशासनवादाभ्यां भिक्षां लिप्सेत कर्हिचित्॥५०॥
न तापसैर्ब्राह्मणैर्वा वयोभिरपि वा श्वभिः।
आकीर्णं भिक्षुकैर्वाऽन्यैरगारमुपसंव्रजेत् ॥ ५१ ॥
कॢप्तकेशनखश्मश्रुः पात्री दण्डी कुसुम्भवान्।
विचरेन्नियतो नित्यं सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ ५२ ॥
अतैजसानि पात्राणि तस्य स्युर्निर्व्रणानि च।
तेषामद्भिःस्मृतं शौचं चमसानामिवाध्वरे ॥ ५३ ॥
अलाबुं दारुपात्रं च मृण्मयं वैदलं तथा।
एतानि यतिपात्राणि मनुःस्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥५४॥
भूकम्प आदि उत्पात, ग्रह-नक्षत्र का फल, हाथकी रेखा, उप-
देश या शास्त्रार्थ के बहाने भिक्षा की इच्छा न करनी। वानप्रस्थ,
दूसरे कोई ब्राह्मण, पक्षी, कुत्ता या भिखारियों से घिरे स्थान में

भिक्षा को न जावे । केश, नख और दाढ़ी मूंछों को मुड़ाकर, भिक्षा-
पात्र, दण्ड, कमण्डलु और रंगे वस्त्रों के सहित, किसी को दुःख
न देकर, नियम से विचरा करे । संन्यासी के पात्र, सोना, चांदी
आदि धातु के न हों, उन पात्रों की पवित्रता यज्ञपात्रों की भांति
जल से ही होती है । तुंबी, काठ, मिट्टी या बांस का पात्र संन्या-
सियों के लिए शास्त्र में लिखा है । इनको ' यतिपात्र '
कहते हैं ॥ ५०-५४ ॥
एककालं चरेद्भैक्षं न प्रसज्जेत विस्तरे ।
भैक्षे प्रसक्तो हि यतिर्विषयेष्वपि सज्जति ॥ ५५ ॥
विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने ।
वृत्ते शरावसंपाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत् ॥ ५६ ॥
अलाभे न विषादी स्याल्लाभे चैव न हर्षयेत् ।
प्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रासङ्गाद्विनिर्गतः ॥ ५७ ॥
अभिपूजितलाभांस्तु जुगुप्सेतैव सर्वशः ।
अभिपूजितलाभैश्च यतिर्मुक्तोऽपि बध्यते ॥ ५८ ॥
संन्यासी एकवार भिक्षा करे, अधिकवार भिक्षा न करे । क्योंकि
अधिक भिक्षा से कामादि विषयों में मन लग जाता है । रसोई का
धुंआ निकल गया हो, कूटना बंद हो चुका हो, आग बुझादी गई
हो, सब भोजन करचुके हों, पात्र फेंक दिये हों तब भिक्षा करनी
चाहिए । भिक्षा न मिलने पर खेद और मिलने पर आनन्द न माने,
जीवनमात्र का उपाय करे । शब्द, स्पर्श आदि विषयों से रहित
होवे । सत्कार के साथ मिली भिक्षाओं से घृणा करे, क्योंकि-
ऐसी भिक्षाओं से मुक्त हुआ भी संन्यासी बन्धन में पड़
जाता है ॥ ५५-५८ ॥
अल्पान्नाभ्यवहारेण रहःस्थानासनेन च ।

२०० मनुस्मृति।
ह्रियमाणानि विषयैरिन्द्रियाणि निवत्र्तयेत् ॥ ५६ ॥
इन्द्रियाणां निरोधेन रागद्वेषक्षयेण च ।
अहिंसया च भूतानाममृतत्वाय कल्पते ॥ ६० ॥
अवेक्षेत गतीर्नॄणां कर्मदोषसमुद्भवाः ।
निरये चैव पतनं यातनाश्च यमक्षये ॥ ६१ ॥
विप्रयोगं प्रियैश्चैव संयोगं च तथाप्रियैः ।
जरया चाभिभवनं व्याधिभिश्चोपपीडनम् ॥ ६२ ॥
थोड़ा भोजन से, निर्जन में निवास से, विषयों में खिंची हुई
इन्द्रियों को रोके। इन्द्रियों के रोक, राग-द्वेष के नाश और प्रा-
णियों की हिंसा न करने से पुरुष मोक्ष के योग्य होता है। मनुष्य
के कर्म दोषों से दुर्गति, नरक में पड़ना और यम-यातना आदि
का विचार करे। पुत्र, स्त्री आदि प्रियजनों का वियोग, अप्रियों
का समागम, वृद्धावस्था में तिरस्कार और रोगों से शरीरक्लेश
यह सब निषिद्ध कर्मों का फल समझना चाहिए ॥ ५६-६२ ॥
देहादुत्क्रमणं चास्मात्पुनर्गर्भे च सम्भवम् ।
योनिकोटिसहस्रेषु सृतीश्चास्यान्तरात्मनः ॥ ६३ ॥
अधर्मप्रभवं चैव दुःखयोगं शरीरिणाम् ।
धर्मार्थप्रभवं चैव सुखसंयोगमक्षयम् ॥ ६४ ॥
सूक्ष्मतां चान्ववेक्षेत योगेन परमात्मनः ।
देहेषु च समुत्पत्तिमुत्तमेष्वधमेषु च ॥ ६५ ॥
दूषितोऽपि चरेद्धर्मं यत्र तत्राश्रमे रतः ।
समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥ ६६ ॥
फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम् ।

छठवां अध्याय । २०१

छठवां अध्याय । २०१
न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति ॥ ६७ ॥
इस देह से निकलना, फिर गर्भ में उत्पत्ति और लाखों योनियों
में इस जीवात्मा का जाना, ये सब अपने कर्मफलं हैं। अधर्म से
दुःख में पड़ना और धर्म से अक्षय सुख-मोक्ष मिलना-इसका
विचार करे। योग से परमात्मा की सूक्ष्मता का ध्यान करे । और
उत्तम-अधम योनियों में शुभाशुभ फलभोगार्थ जीवों की उत्पत्ति
का विचार करे। आश्रम के विरुद्ध कोई दोष भी लगे, तोभी जीवों
पर समभाव रखकर, धर्माचरण करता रहे । क्योंकि दण्ड-कम-
ण्डलु चिह्न धारण करना ही धर्माचरण नहीं कहलाता । निर्मली
के फल का नाम लेने से ही जल निर्मल नहीं होता, उसको जल
में छोड़ने से होता है । ऐसेही आश्रमचिह्न धारण से फल नहीं
होता किन्तु आचरण से होता है ॥ ६३-६७ ॥
संरक्षणार्थं जन्तूनां रात्रावहनि वा सदा ।
शरीरस्यात्यये चैव समीक्ष्य वसुधां चरेत् ॥ ६८ ॥
अह्ना रात्र्या च याञ्जन्तून् हिनस्त्यज्ञानतो यतिः ।
तेषां स्नात्वा विशुद्धयर्थं प्राणायामान्षडाचरेत् ॥ ६९ ॥
: प्राणायामा ब्राह्मणस्य त्रयोऽपि विधिवत्कृताः ।
व्याहृतिप्रणवैर्युक्ता विज्ञेयं परमं तपः ॥ ७० ॥
दिन या रात में, संन्यासी को भूमि में जीवों को बचाकर पैर
रखना चाहिए। चाहे शरीर को दुःख भी मिले। जो यति चलता
फिरता अनजान में, जीवों की हिंसा करता है, उस पाप के ना-
शार्थ स्नान करके छ प्राणायाम करना चाहिए । यदि ब्राह्मण
प्रणव और व्याहृति से विधिपूर्वक तीन भी प्राणायाम करे तो भी
उसको परम तप मानना चाहिए ॥ ६८-७० ॥
दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः ।
२६

२०२ मनुस्मृति।
तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥७१॥
प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्च किल्बिषम् ।
प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान्॥७२॥
उच्चावचेषु भूतेषु दुर्ज्ञेयामकृतात्मभिः ।
ध्यानयोगेन संपश्येद्गतिमस्यान्तरात्मभिः ॥ ७३ ॥
सम्यग्दर्शनसंपन्नः कर्मभिर्न निवध्यते ।
दर्शनेन विहीनस्तु संसारं प्रतिपद्यते ॥ ७४ ॥
जैसे सुवर्ण आदि धातुओं का मैल अग्नि में धौंकने से जल
जाता है वैसेही प्राणायाम से इन्द्रियों के दोष जलजाते हैं। प्राणा-
याम से दोषों को, ब्रह्म में मनकी धारणा से पाप को, इन्द्रियसंयम
से विषयों को और ध्यान से काम, क्रोध, मोह आदि को जलावे।
इस जीव की ऊंची, नीची योनियों में जन्मप्राप्ति का ध्यान योग
से विचार करे, क्योंकि, जीवगति सब को ज्ञात नहीं होती । ब्रह्म
साक्षात्कार करनेवाला पुरुष कर्मबन्धन में नहीं बँधता और
जो उससे रहितहै वह जन्म-मरण के बन्धन में पड़ता है ॥ ७१-७४॥
अहिंसयेन्द्रियासङ्गैर्वैदिकैश्चैव कर्मभिः ।
तपसश्चरणैश्चोग्रैः साधयन्तीह तत्पदम् ॥ ७५ ॥
अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् ।
चर्मावनद्धं दुर्गन्धिपूर्णं मूत्रपुरीषयोः ॥ ७६ ॥
जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम् ।
रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत् ॥ ७७ ॥
नदीकूलं यथा वृक्षो वृक्षं वा शकुनिर्यथा ।
तथा त्यजन्निमं देहं कृच्छ्राद्ग्राह्याद्विमुच्यते ॥ ७८ ॥

छठवां अध्याय । २०३

छठवां अध्याय । २०३
अहिंसा, इन्द्रियनिग्रह, वैदिक कर्मानुष्ठान, व्रत आदि उग्र तपों
से इस लोक में ब्रह्मपद का साधन होता है । यह शरीर हड्डी
रूप खंभा में स्नायुरूप डोरियों से बँधा, मांस और रुधिर रूप
गारा से लिपा चमड़ा से मढ़ा, मल-मूत्र और दुर्गन्धि से पूर्ण है ।
बुढ़ापा शोक, रोग, दुःख का घर है, रजोगुणी है, अनित्य है,
पांच महाभूतों का निवासस्थान है, इससे ममता छोड़देनी चा-
हिए । जैसे नदीतट को वृक्ष छोड़ देता है, पक्षी वृक्ष को छोड़ देता
है, वैसे संन्यासी इस देह की ममता छोड़ देवे तो कठिन संसारी
ग्राह से छूट जाता है ॥ ७५-७८ ॥
प्रियेषु स्वेषु सुकृतमप्रियेषु च दुष्कृतम् ।
विसृज्य ध्यानयोगेन ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥ ७६ ॥
यदा भावेन भवति सर्वभावेषु निःस्पृहः ।
तदा सुखमवाप्नोति प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥ ८० ॥
अनेन विधिना सर्वांस्त्यक्त्वा सङ्गान् शनैः शनैः ।
सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तो ब्रह्माण्येवावतिष्ठते ॥ ८१ ॥
ध्यानिकं सर्वमेवैतद्यदेतदभिशब्दितम् ।
नह्यनध्यात्मवित्कश्चित्क्रियाफलमुपाश्नुते ॥ ८२ ॥
ब्रह्मज्ञानी पुरुष अपने प्रिय पुरुषों के ऊपर पुण्य और अप्रियों
के ऊपर पाप त्यागकर, ध्यानयोग से सनातन ब्रह्मपद को प्राप्त
होता है । जब संन्यासी सब भांति निःस्पृह होजाता है, तब इस
लोक में सुख पाता है और मरण के बाद मोक्षसुख को पाता है ।
इस रीति से धीरे धीरे संग को छोड़कर दुःखसुख से मुक्त होकर,
ब्रह्म में ही स्थित होजाता है । यह जो धन, पुत्र आदि की ममता
का त्याग कहा है, वह सब परमात्मा के ध्यान से ही होसकता
है । जिसको आत्मा के स्वरूप का ज्ञान नहीं है वह ध्यानादि कर्मों
का फल नहीं पाता है ॥ ७६-८२ ॥

३०४ मनुस्मृति ।
अधियज्ञं ब्रह्म जपेदाधिदैविकमेव च ।
आध्यात्मिकं च सततं वेदान्ताभिहितं च यत् ॥ ८३ ॥
इदं शरणमज्ञानामिदमेव विजानताम् ।
इदमन्विच्छतां स्वर्गमिदमानन्त्यमिच्छताम् ॥ ८४ ॥
अनेन क्रमयोगेन परिव्रजति यो द्विजः ।
स विधूयेह पाप्मानं परंब्रह्माधिगच्छति ॥ ८५ ॥
एष धर्मोऽनुशिष्टो वो यतीनां नियतात्मनाम् ।
वेदसंन्यासिकानां तु कर्मयोगं निबोधत ॥ ८६ ॥
यज्ञ, देवता और आत्मा के विषय में जो वेदमन्त्र हैं और वे-
दान्त ( ब्रह्मज्ञान ) प्रतिपादक जो मन्त्र हैं उनका सदा पाठ और
जप विचार करे । यह वेद ज्ञानी, अज्ञानी और स्वर्ग, मोक्ष की
इच्छावालों का भी शरण है अर्थात् वेद ही सर्वस्व है । इस क्रम
से जो द्विज संन्यास धारण करता है, वह सब पापों से छूटकर,
ब्रह्मभाव में लीन होजाता है । इस प्रकार, यह धर्म जितेन्द्रिय
यतियों का कहा गया ,है अब वेद संन्यासी, अर्थात् जो चिह्न
धारण गृहत्याग न करके ज्ञान सेही संन्यासी है उनका कर्मयोग
सुनो ॥ ८३-८६ ॥
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा ।
एते गृहस्थप्रभवाश्चत्वारः पृथगाश्रमाः ॥ ८७ ॥
सर्वेऽपि क्रमशस्त्वेते यथाशास्त्रं निषेविताः ।
यथोक्तकारिणं विप्रं नयन्ति परमां गतिम् ॥ ८८ ॥
सर्वेषामपि चैतेषां वेदस्मृतिविधानतः ।
गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठः स त्रीनेतान् बिभर्त्ति हि ॥ ८६ ॥

छठवां अध्याय । २०५

छठवां अध्याय । २०५
यथानदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् ।
तथैवाश्रमिणःसर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥ ६० ॥
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति ये चार अलग अलग
आश्रम गृहस्थ से उत्पन्न हैं । ये चारों आश्रम नियम से सेवित हों
तो उत्तमगति देनेवाले हैं । इन सब आश्रमों में वेद और स्मृतियों के
अनुसार गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ कहा गया है । क्योंकि यह तीनों का पा-
लन करता है । जैसे सब नदी और नद समुद्र में जाकर ठहरते हैं,
वैसे सब आश्रमी गृहस्थ में आश्रम रखते हैं ॥ ८७-६० ॥
चतुर्भिरपि चैवैतैर्नित्यमाश्रमिभिर्द्विजैः ।
दशलक्षणको धर्मः सेवितव्यः प्रयत्नतः ॥ ६१ ॥
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ ६२ ॥
दशलक्षणानि धर्मस्य ये विप्राः समधीयते ।
अधीत्य चानुवर्त्तन्ते ते यान्ति परमांगतिम् ॥ ६३ ॥
ब्रह्मचारी आदि चारों आश्रमवाले द्विजों को दशलक्षणवाले धर्म
का सेवन यत्न से करना चाहिए । उनके लक्षण इस प्रकार हैं-
१-धैर्य, २-क्षमा, ३-दम-मनको रोकना, ४-अस्तेय-चोरी न
करना, ५-शौच-बाहर भीतरसे शुद्ध, ६-इन्द्रिय-निग्रह, ७-धी-
शास्त्रज्ञान, ८-विद्या-ब्रह्मविद्या, ९-सत्य, १०-अक्रोध-क्रोध न
करना । जो विप्र धर्म के दशलक्षणों को पढ़ते हैं और उसके अनु-
सार आचरण करते हैं, वे परमगति को पाते हैं ॥ ६१-६३ ॥
दशलक्षकं धर्ममनुतिष्ठन्समाहितः ।
वेदान्तविधिवच्छ्रुत्वा संन्यसेदनृणो द्विजः ॥ ६४ ॥
संन्यस्य सर्वकर्माणि कर्मदोषानपानुदन् ।

२०६ मनुस्मृति।
नियतो वेदमभ्यस्य पुत्रैश्वर्ये सुखं वसेत् ॥ ९५ ॥
एवं संन्यस्य कर्माणि स्वकार्यपरमोऽस्पृहः ।
संन्यासेनापहत्यैनः प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ ९६ ॥
एष वोऽभिहितो धर्मो ब्राह्मणस्य चतुर्विधः ।
पुण्योऽक्षयफलः प्रेत्य राज्ञां धर्मं निबोधत ॥ ९७ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां
षष्ठोऽध्यायः ॥
ऋषि, देव और पितरों के ऋण से मुक्त होकर, दशलक्षण धर्म
का सेवन करता हुआ द्विज वेदान्त को सुनकर संन्यास धारण
करे। सब अग्निहोत्रादि कर्मों को छोड़कर, पापों का प्राणायाम
से नाश करके, जितेन्द्रिय होकर वेद का अध्ययन करे और पुत्रों
के दिये भोजन, वस्त्रादि का सुख से उपभोग करे। इस प्रकार,
सब कर्मों को छोड़कर, केवल आत्मसाक्षात्कार में तत्पर रहकर,
संन्यास धारण करने से ब्रह्मपद को पहुँचता है। यह पवित्र
और परलोक में अक्षय फल देनेवाला ब्राह्मण का चारों प्रकार
का धर्म कहा गया है। अब राजधर्म को सुनो ॥ ९४-९७ ॥
छठवां अध्याय पूरा हुआ।

अथ सप्तमोऽध्यायः ।
राजधर्मान्प्रवक्ष्यामि यथावृत्तो भवेन्नृपः ।
संभवश्च यथा तस्य सिद्धिश्च परमा यथा ॥ १ ॥
ब्राह्मं प्राप्तेन संस्कारं क्षत्रियेण यथाविधि ।
सर्वस्यास्य यथान्यायं कर्तव्यं परिरक्षणम् ॥ २ ॥
अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात् ।
रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत्प्रभुः ॥ ३ ॥
इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च ।
चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥ ४ ॥
यस्मादेषां सुरेन्द्राणां मात्राभ्यो निर्मितो नृपः ।
तस्मादभिभवत्येष सर्वभूतानि तेजसा ॥ ५ ॥
तपत्यादित्यवच्चैष चक्षूंषि च मनांसि च ।
न चैनं भुवि शक्नोति कश्चिदप्यभिवीक्षितुम् ॥ ६ ॥
सोऽग्निर्भवति वायुश्च सोऽर्कःसोमःस धर्मराट् ।
स कुबेरः स वरुणः स महेन्द्रः प्रभावतः ॥ ७ ॥
सातवां अध्याय ।
राजधर्म ।
जैसा राजा का आचरण होना चाहिए, जैसे उसकी उत्पत्ति
हुई है, और जिस प्रकार उसको परम सिद्धि प्राप्त होती है वह
सब कहा जाता है । उपनयन संस्कारवाले क्षत्रिय राजा को न्याया-

२०८ मनुस्मृति ।
नुसार इस जगत् की रक्षा करनी चाहिए। इस जगत् में जब राजा
नहीं था और प्रजा भय से व्याकुल होने लगी, तब परमात्मा ने जगत्
की रक्षा के लिए राजा को उत्पन्न किया। इन्द्र, वायु, यम, सूर्य,
अग्नि, वरुण, चन्द्रमा और कुबेर इन आठ लोकपालों के सनातन
अंश को लेकर परमात्मा ने राजा बनाया है। इन लोकपालों की
मात्रा से राजा बनाया गया है, इसलिए वह अपने तेज से सब प्रा-
णियों को दबा देता है। राजा को जो देखता है उसके आँख और
मन पर सूर्य का सा प्रभाव पड़ता है, इसलिए सामने होकर कोई
राजा को देख नहीं सकता। राजा अपने प्रभाव में अग्नि, सूर्य,
चन्द्रमा, यम, कुबेर, वरुण और इन्द्र के समान है॥३-७॥
बालोऽपि नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः ।
महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ॥ ८ ॥
एकमेव दहत्यग्निर्नरं दुरुपसर्पिणम् ।
कुलं दहति राजाग्निः सपशुद्रव्यसञ्चयम् ॥ ९ ॥
कार्यं सोऽवेक्ष्य शक्तिं च देशकालौ च तत्त्वतः ।
कुरुते धर्मसिद्ध्यर्थं विश्वरूपं पुनः पुनः ॥ १० ॥
यस्य प्रसादे पद्मा श्रीर्विजयश्च पराक्रमे ।
मृत्युश्च वसति क्रोधे सर्वतेजमयो हि सः ॥ ११ ॥
तं यस्तु द्वेष्टि संमोहात्स विनश्यत्यसंशयम् ।
तस्य ह्याशु विनाशाय राजा प्रकुरुते मनः ॥ १२ ॥
राजा बालक हो तो भी यह मनुष्य है ऐसा मानकर उसका
अपमान न करे। क्योंकि—यह मनुष्य रूप में बड़ाभारी देवता
स्थित है। अग्नि एकही मनुष्य को उसकी असावधानी से
जलाता है, पर राजारूप अग्नि कुचाल से कुल, धन और पशु
सहित भस्म कर देता है। राजा देश, काल, कार्य और शक्ति को

सातवां अध्याय। २०६

सातवां अध्याय। २०६
ठीक ठीक विचार कर, अपने राजधर्म की सिद्धि के लिए अनेक
रूप कभी क्षमा, कभी कोप, कभी मित्रता इत्यादि धारण करता
है। जिसकी प्रसन्नता में लक्ष्मी, पराक्रम में जय और क्रोध में
मृत्यु का वास है, वह राजा सर्वतेजोमय है। उसके साथ अज्ञान
से जो द्वेष करता है, वह निःसंदेह नष्ट होजाता है। क्योंकि
उसके नाश का विचार शीघ्रही राजा मन में करता है ॥ ८-१२ ॥
तस्माद्धर्मं यमिष्टेषु स व्यवस्येन्नराधिपः ।
अनिष्टं चाप्यनिष्टेषु तं धर्मं न विचालयेत् ॥ १३ ॥
तस्यार्थे सर्वभूतानां गोप्तारं धर्ममात्मजम् ।
ब्रह्मतेजोमयं दण्डमसृजत्पूर्वमीश्वरः ॥ १४ ॥
तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
भयाद्भोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च ॥ १५ ॥
इसलिए राजा अपने अनुकूल मित्र और शत्रु के लिए जिस
धर्म क़ानून का स्थापन करे उसको कभी न तोड़ना चाहिए।
प्रजापति ने राजा के लिए सब प्राणियों की रक्षा करनेवाले,
ब्रह्मतेजोमय, धर्मरूप और अपने पुत्ररूप दण्ड को पहले ही से
पैदा किया है। दण्ड के भय से चराचर सब प्राणी अपने भोग
को प्राप्त होते हैं और धर्म से विचलित नहीं होते ॥ १३-१५ ॥
तं देशकालौ शक्तिं च विद्यां चावेक्ष्य तत्त्वतः ।
यथार्हतः संप्रणयेन्नरेष्वन्यायवर्तिषु ॥ १६ ॥
स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः।
चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥ १७ ॥
दण्डो शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥ १८ ॥
२७

२१० मनुस्मृति ।
समीक्ष्य स धृतः सम्यक् सर्वा रञ्जयति प्रजाः ।
असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः ॥ १६ ॥
यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः ।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन् दुर्बलान्बलवत्तराः ॥ २० ॥
देश, काल, शक्ति और विद्या का विचार करके यथायोग्य अप-
राधियों को दण्ड देवे । वह दण्ड ही राजा है, पुरुष है, वही राज्य
को नियम में रखनेवाला है, शासक है और वही चारों आश्रमधर्म
का प्रतिभू-ज़ामिन है। दण्ड सम्पूर्ण प्रजा का शासन करता है,
दण्ड ही रक्षा करता है, सोते हुए दण्ड ही जागता है, विद्वान्
लोग दण्ड को ही धर्म मानते हैं । उस दण्ड का विचारपूर्वक
प्रयोग होने से वह सब प्रजा प्रसन्न करता है और अविचार से,
सब तरह से नाशकारक होता है । यदि राजा निरालस होकर
अपराधियों को दण्ड न दे तो काँटे में मछलियों की भांति बल-
वान् लोग निर्बलों को भून डालें ॥ १६-२० ॥
अद्यात्काकः पुरोडाशं श्वा च लिह्याद्धविस्तथा ।
स्वाम्यं च न स्यात्कस्मिंश्चित्प्रवर्तेताधरोत्तरम् ॥ २१ ॥
सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।
दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥ २२ ॥
देवदानवगन्धर्वरक्षांसि पतगोरगाः ।
तेऽपि भोगाय कल्पन्ते दण्डेनैव निपीडिताः ॥ २३ ॥
राजा दण्ड न करे तो कौआ पुरोडाश खा जायँ, कुत्ता यज्ञ
बलि चाट जायँ, कोई किसी का स्वामी न हो सके और सब
ऊंची नीची बातों का विचार भ्रष्ट हो जाय । पवित्र मन का पुरुष
दुर्लभ है। सब लोग दण्डही से सन्मार्ग में रहते हैं और जगत् के
वैभव को भोग सकते हैं। देव, दानव, गन्धर्व, राक्षस, पक्षी और सर्प

सातवां अध्याय। २११

सातवां अध्याय। २११
भी दण्डही से दबकर अपने भोग को भोग सकते हैं॥ २१-२३॥
दुष्येयुः सर्ववर्णाश्च भिद्येरन् सर्वसेतवः ।
सर्वलोकप्रकोपश्च भवेद्दण्डस्य विभ्रमात् ॥ २४ ॥
यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा ।
प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत्साधु पश्यति ॥ २५ ॥
तस्याहुः संप्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम् ।
समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम् ॥ २६ ॥
तं राजा प्रणयन्सम्पक् त्रिवर्गेणाभिवर्धते ।
कामात्मा विषमः क्षुद्रो दण्डेनैव निहन्यते ॥ २७ ॥
दण्डो हि सुमहत्तेजो दुर्धरश्चाकृतात्मभिः ।
धर्माद्विचलितं हन्ति नृपमेव सबान्धवम् ॥ २८ ॥
दण्ड के बिना सब वर्ण विरुद्धाचरण में प्रवृत्त हो जावें और
चतुर्वर्गरूप पुल टूटजावे । और सबलोगों में उपद्रव हो जावे ।
जिस देश में श्यामवर्ण, रक्तनेत्र, पापनाशक दण्ड बिचरता है और
राजा सब तरफ न्यायदृष्टि से देखता है, वहां प्रजा को दुःख
नहीं होता । जो राजा उस दण्ड का उचित प्रयोग करता है वह
अर्थ, धर्म और काम से वृद्धि पाता है। परन्तु कामी, क्षुद्रवृत्ति
हो तो उस दण्ड से स्वयं नष्ट हो जाता है। वास्तव में दण्ड में
बड़ा तेज है, उसका धारण साधारण राजा नहीं कर सकते हैं। धर्म
से चलित राजा को यह कुटुम्ब सहित नष्ट कर देता है ॥ २४-२८ ॥
ततो दुर्गं च राष्ट्रं च लोकं च सचराचरम् ।
अन्तरिक्षगतांश्चैव मुनीन् देवांश्च पीडयेत् ॥ २९ ॥
सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना ।

२१२ मनुस्मृति ।
न शक्यो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेषु च ॥ ३० ॥
शुचिना सत्यसंधेन यथाशास्त्रानुसारिणा ।
प्रणेतुं शक्यते दण्डः सुसहायेन धीमता ॥ ३१ ॥
उसके बाद क़िला, देश और चराचर जगत् का नाश करता
है। अन्तरिक्षवासी देवता और मुनियों को भी पीड़ा पहुँचाता
है। मन्त्री या सेना की सहायता से रहित, लोभी, मूर्ख, निर्बुद्धि,
विषयासक्त राजा से वह दण्ड अर्थात् राजधर्म नहीं चल सकता।
न्यायपूर्वक मिले धन से शुद्ध, सत्यप्रतिज्ञ, शास्त्रानुसार बर्ताव
करनेवाला बुद्धिमान् राजा, मन्त्री आदि की सहायता से दण्ड-
विधान कर सकता है अर्थात् ऐसा राजा शिक्षा करने लायक़
होता है ॥ २६-३१ ॥
स्वराष्ट्रे न्यायवृत्तः स्याद्भृशदण्डश्च शत्रुषु ।
सुहृत्स्वजिह्मः स्निग्धेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः॥ ३२ ॥
एवंवृत्तस्य नृपतेः शिलोञ्छेनापि जीवतः ।
विस्तीर्यते यशो लोके तैलबिन्दुरिवाम्भसि ॥ ३३ ॥
अतस्तु विपरीतस्य नृपतेरजितात्मनः ।
संक्षिप्यते यशो लोके घृतबिन्दुरिवाम्भसि ॥ ३४ ॥
स्वे स्वे धर्मे निविष्टानां सर्वेषामनुपूर्वशः ।
वर्णानामाश्रमाणां च राजा सृष्टोऽभिरक्षिता ॥ ३५ ॥
राजा को अपने राज्य में न्यायकारी और शत्रुओं को सदा
दण्ड देनेवाला, हितैषियों से कुटिलता रहित और ब्राह्मणों पर
क्षमावान् होना चाहिए। ऐसा बर्ताव करनेवाले, शिलोञ्छवृत्ति
से भी जीते हुए राजा का यश लोक में जल में तेल की बूंद के
समान फैलता है । विषयासक्त और उक्तरीति से विपरीत
आचरण करनेवाले का यश पानी में घी के बूंद की भांति संकोच

सातवां अध्याय । २१३

सातवां अध्याय । २१३
को प्राप्त होता है। अपने अपने धर्म में चलनेवाले सब वर्णों
और आश्रमों की रक्षा करनेवाला प्रजापति ने राजा उत्पन्न
किया है ॥ ३२-३५ ॥
तेन यद्यत्सभृत्येन कर्तव्यं रक्षता प्रजाः ।
तत्तद्वोऽहं प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ ३६ ॥
ब्राह्मणान् पर्युपासीत प्रातरुत्थाय पार्थिवः ।
त्रैविद्यवृद्धान् विदुषस्तिष्ठेत्तेषां च शासने ॥ ३७ ॥
वृद्धांश्च नित्यं सेवेत विप्रान् वेदविदःशुचीन् ।
वृद्धसेवी हि सततं रक्षोभिरपि पूज्यते ॥ ३८ ॥
इसलिए मन्त्रियों सहित राजा को प्रजारक्षा के लिए जो जो
कर्म करने चाहिएं उनको क्रम से कहता हूं—राजा को प्रातःकाल
उठकर तीनों वेदों में पारङ्गत, श्रेष्ठ, विद्वान्, ब्राह्मणों के साथ बैठना
और उनकी आज्ञानुसार आचरण करना चाहिए। वेदज्ञ, पवित्र,
वृद्ध ब्राह्मणों की नित्य सेवा राजा करे, क्योंकि वृद्धसेवा में तत्पर
राजा दुष्ट कुजीवों से भी सत्कार पूजा पाता है ॥ ३६-३८ ॥
तेभ्योऽधिगच्छेद्विनयं विनीतात्मापि नित्यशः ।
विनीतात्मा हि नृपतिर्न विनश्यति कर्हिचित् ॥ ३६ ॥
बहवोऽविनयान्नष्टा राजानः सपरिच्छदाः ।
वनस्था अपि राज्यानि विनयात्प्रतिपेदिरे ॥ ४० ॥
वेनो विनष्टोऽविनयान्नहुषश्चैव पार्थिवः ।
सुदासो यवनश्चैव सुमुखो निमिरेव च ॥ ४१ ॥
पृथुस्तु विनयाद्राज्यं प्राप्तवान् मनुरेव च ।
कुबेरश्च धनैश्वर्यं ब्राह्मण्यं चैव गाधिजः ॥ ४२ ॥

२१४ मनुस्मृति ।
शिक्षित राजा भी ऐसे योग्य ब्राह्मणों से नित्य विनय सीखे ।
क्योंकि विनीत राजाको कभी हानि नहीं पहुँचती । बहुत से राजा
अविनय से धन सम्पत्ति सहित नष्ट होगये और बहुत से जङ्गल में
रहकर भी अपने विनय से राज्य पागए हैं । राजा वेन, नहुष,
सुदास, यवन, सुमुख और निमि अपने अविनय-दुराचार से नष्ट
होगये । पृथु और मनुने विनय से राज्य पाया। कुवेर ने धनाधिपत्य
और विश्वामित्र ने ब्राह्मण्य को पाया ॥ ३६-४२ ॥
त्रैविद्येभ्यस्त्रयीं विद्यां दण्डनीतिं च शाश्वतीम् ।
आन्वीक्षिकीं चात्मविद्यां वार्तारम्भांश्च लोकतः ॥ ४३ ॥
इन्द्रियाणां जये योगं समातिष्ठेदिवानिशम् ।
जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः ॥ ४४ ॥
दशकामसमुत्थानि तथाष्टौ क्रोधजानि च ।
व्यसनानि दुरन्तानि प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥ ४५ ॥
कामजेषु प्रसक्तो हि व्यसनेषु महीपतिः ।
वियुज्यन्तेऽर्थधर्माभ्यां क्रोधजेष्वात्मनैव तु ॥ ४६ ॥
वेदज्ञों से वेद, दण्डनीति, ब्रह्मविद्या को पढ़े । और अर्थशास्त्र
वगैरह व्यवहार विद्या को पढ़े । इन्द्रियों को वश में रखने का सदा
उद्योग करे क्योंकि जितेन्द्रिय राजा ही प्रजा को वश में रख
सकता है । काम से पैदाहुए दश और क्रोध से पैदाहुए आठ
व्यसनों का कोई अन्त नहीं है इनसे राजा को यत्नपूर्वक बचना
चाहिए । काम से पैदा व्यसनों में आसक्त राजा अर्थ और धर्म से
हीन होजाता है और क्रोध से पैदाहुए व्यसनों में लग जाने से
अपने शरीर से ही नष्ट होजाता है ॥ ४३-४६ ॥
मृगयाक्षो दिवास्वप्नः परीवादः स्त्रियो दमः ।
तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः ॥ ४७ ॥

सातवां अध्याय। २१५

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सातवां अध्याय। २१५

पैशुन्यं साहसं द्रोहं ईर्ष्यासूयार्थदूषणम् ।
वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोऽपि गणोऽष्टकः॥ ४८ ॥
द्वयोरप्येतयोर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः ।
तं यत्नेन जयेल्लोभं तज्जावेतावुभौ गणौ ॥ ४६ ॥
पानमक्षास्त्रियश्चैव मृगया च यथाक्रमम् ।
एतत्कष्टतमं विद्याच्चतुष्कं कामजे गणे ॥ ५० ॥
दण्डस्य पातनं चैव वाक्पारुष्यार्थदूषणे ।
क्रोधजेऽपि गणे विद्यात्कष्टमेतत्त्रिकं सदा ॥ ५१ ॥
शिकार, जुआ, दिन में सोना, दूसरे के दोषों को कहना, स्त्री-
संभोग, मद्यपान, नाच, बाजा और व्यर्थ घूमना ये दश कामके व्यसन
हैं अर्थात् काम से पैदा हुए हैं। चुगली, साहस, द्रोह, ईर्षा, दूसरे
के गुणों में दोष लगाना, द्रव्य हरलेना, गाली देना, कठोरपन ये आठ
क्रोध से उत्पन्न व्यसन हैं। विद्वान् लोग इन दोनों प्रकार के दोषों
का कारण लोभ कहते हैं, इसलिए लोभ को अवश्य छोड़ देना चा-
हिए । काम से पैदा व्यसनों में मद्यपान, जुआ, स्त्रीसंग और
शिकार ये एक से एक बढ़कर दुःखदायी हैं । और क्रोध से पैदा
व्यसनों में मारपीट, कठोर वचन, दूसरे की धनहानि करना ये
तीन बड़े दुःखदायी हैं ॥ ४७-५१ ॥
सप्तकस्यास्य वर्गस्य सर्वत्रैवानुषङ्गिणः ।
पूर्वं पूर्वं गुरुतरं विद्याद्व्यसनमात्मवान् ॥ ५२ ॥
व्यसनस्य च मृत्योश्च व्यसनं कष्टमुच्यते ।
व्यसन्यधोऽधो व्रजति स्वर्यात्यव्यसनी मृतः ॥ ५३ ॥
मौलाञ्छास्त्रविदः शूराल्लब्धलक्षान्कुलोद्गतान् ।
सचिवान्सप्त चाष्टौ वा प्रकुर्वीत परीक्षितान् ॥ ५४ ॥