मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 338, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें१६८ मनुस्मृति।
सप्तद्वारावकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत् ॥ ४८ ॥
अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः।
आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह ॥ ४६ ॥
कोई व्यर्थ झगड़ा करे तो उसको सहन करे, किसीका अपमान
न करे। और इस देह से किसी से वैर करना भी अच्छा नहीं है।
क्रोध करनेवाले पर क्रोध, निन्दक की निन्दा न करे वरन कुशल
वृत्तान्त उसका पूंछे। पांच इन्द्रियां, मन और बुद्धि इन सात द्वारों
में बिखरी हुई असत्य वाणी न बोले, किन्तु ईश्वर चिन्ता में लगा
रहे। परब्रह्म के ध्यान में मग्न, योगासन से स्थित, ममता को छोड़-
कर, केवल अपनी सहायता से ही मोक्षसुख चाहता हुआ इस
जगत् में विचरे ॥ ४७-४६ ॥
न चोत्पातनिमित्ताभ्यां न नक्षत्राङ्गविद्यया।
नानुशासनवादाभ्यां भिक्षां लिप्सेत कर्हिचित्॥५०॥
न तापसैर्ब्राह्मणैर्वा वयोभिरपि वा श्वभिः।
आकीर्णं भिक्षुकैर्वाऽन्यैरगारमुपसंव्रजेत् ॥ ५१ ॥
कॢप्तकेशनखश्मश्रुः पात्री दण्डी कुसुम्भवान्।
विचरेन्नियतो नित्यं सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ ५२ ॥
अतैजसानि पात्राणि तस्य स्युर्निर्व्रणानि च।
तेषामद्भिःस्मृतं शौचं चमसानामिवाध्वरे ॥ ५३ ॥
अलाबुं दारुपात्रं च मृण्मयं वैदलं तथा।
एतानि यतिपात्राणि मनुःस्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥५४॥
भूकम्प आदि उत्पात, ग्रह-नक्षत्र का फल, हाथकी रेखा, उप-
देश या शास्त्रार्थ के बहाने भिक्षा की इच्छा न करनी। वानप्रस्थ,
दूसरे कोई ब्राह्मण, पक्षी, कुत्ता या भिखारियों से घिरे स्थान में