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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 649 में से

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पृष्ठ 345

छठवां अध्याय । २०५
यथानदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् ।
तथैवाश्रमिणःसर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥ ६० ॥
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति ये चार अलग अलग
आश्रम गृहस्थ से उत्पन्न हैं । ये चारों आश्रम नियम से सेवित हों
तो उत्तमगति देनेवाले हैं । इन सब आश्रमों में वेद और स्मृतियों के
अनुसार गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ कहा गया है । क्योंकि यह तीनों का पा-
लन करता है । जैसे सब नदी और नद समुद्र में जाकर ठहरते हैं,
वैसे सब आश्रमी गृहस्थ में आश्रम रखते हैं ॥ ८७-६० ॥
चतुर्भिरपि चैवैतैर्नित्यमाश्रमिभिर्द्विजैः ।
दशलक्षणको धर्मः सेवितव्यः प्रयत्नतः ॥ ६१ ॥
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ ६२ ॥
दशलक्षणानि धर्मस्य ये विप्राः समधीयते ।
अधीत्य चानुवर्त्तन्ते ते यान्ति परमांगतिम् ॥ ६३ ॥
ब्रह्मचारी आदि चारों आश्रमवाले द्विजों को दशलक्षणवाले धर्म
का सेवन यत्न से करना चाहिए । उनके लक्षण इस प्रकार हैं-
१-धैर्य, २-क्षमा, ३-दम-मनको रोकना, ४-अस्तेय-चोरी न
करना, ५-शौच-बाहर भीतरसे शुद्ध, ६-इन्द्रिय-निग्रह, ७-धी-
शास्त्रज्ञान, ८-विद्या-ब्रह्मविद्या, ९-सत्य, १०-अक्रोध-क्रोध न
करना । जो विप्र धर्म के दशलक्षणों को पढ़ते हैं और उसके अनु-
सार आचरण करते हैं, वे परमगति को पाते हैं ॥ ६१-६३ ॥
दशलक्षकं धर्ममनुतिष्ठन्समाहितः ।
वेदान्तविधिवच्छ्रुत्वा संन्यसेदनृणो द्विजः ॥ ६४ ॥
संन्यस्य सर्वकर्माणि कर्मदोषानपानुदन् ।