मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
.६ मनुस्मृति ।
३ व्यास, ४ गौतम, ५ अत्रि, ६ उशना, ७ यम, ८ वशिष्ठ,
९ दक्ष, १० संवर्त, ११ शातातप, १२ पराशर, १३ विष्णु,
१४ आपस्तम्ब, १५ हारीत, १६ शङ्ख, १७ कात्यायन, १८ भृगु,
१९ प्रचेता, २० नारद, २१ याज्ञवल्क्य, २२ बौधायन,
२३ पितामह, २४ सुमन्तु, २५ काश्यप, २६ बभ्रु, २७ पैठीनसि,
२८ व्याघ्र, २९ सत्यव्रत, ३० भरद्वाज, ३१ गार्ग्य, ३२ कार्ष्णा-
जिनि, ३३ जाबालि, ३४ जमदग्नि, ३५ लौगाक्षि और
३६ ब्रह्मगर्भ-स्मृति ।
‘ तेषां मन्वङ्गिरोव्यासगौतमात्र्युशनोयमाः ।
वशिष्ठदक्षसंवर्तशातातपपराशराः ॥
विष्ण्वापस्तम्बहारीताः शङ्खः कात्यायनो भृगुः ।
प्रचेता नारदो योगी बौधायनपितामहौ ॥
सुमन्तुः कश्यपो बभ्रुः पैठीनो व्याघ्र एव च ।
सत्यव्रतो भरद्वाजो गार्ग्यः कार्ष्णाजिनिस्तथा ॥
जावालिर्जमदग्निश्च लौगाक्षिर्ब्रह्मसंभवः ।
इति धर्मप्रणेतारः षट्त्रिंशदृषयस्तथा ॥’
पैठीनसिस्मृति ।
याज्ञवल्क्य ने जो बीस स्मृतिकर्त्ताओं का नाम क्रम लिखा
है वह पैठीनसि लिखितक्रम से निराला है और याज्ञवल्क्योक्त
स्मृतिकर्त्ताओं में ‘बृहस्पति’ तथा ‘लिखित’ के नाम हैं वे दोनों
पैठीनसि के वाक्य में नहीं हैं उनको लेने से ३८ स्मृति हुईं।
- मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः ।
यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती ॥
[Header] भूमिका । २७
पराशरव्यासशङ्खलिखिता दक्षगौतमौ ।
शातातपो वशिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः ॥'
याज्ञवल्क्यस्मृति ।
प्रयोगपारिजात में स्मृतिकर्त्ताओंका नामक्रम पैठीनसि तथा
याज्ञवल्क्य लिखित नाम क्रम से निराला है और अठारह
स्मृति तथा अठारह उपस्मृति का विभाग करके इक्कीस स्मृतिकारों
के नाम और लिखे हैं, जिनमें १ नाचिकेत, २ स्कन्द,
३ काश्यप, ४ सनत्कुमार, ५ शांतनु, ६ जनक, ७ जातूकर्ण्य,
८ कपिञ्जल, ९ कणाद, १० विश्वामित्र, ११ गोभिल,
१२ देवल, १३ पुलस्त्य, १४ पुलह, १५ क्रतु, १६ आग्नेय,
१७ गवेय, १८ मरीचि, १९ वत्स, २० पारस्कर, २१ ऋष्यशृङ्ग
और २२ वैजावाप ये वाईस नाम अधिक हैं इनको पहले
लिखी ३८ स्मृतियों में मिलाने से ६० स्मृति हुईं ।
'मनुर्वृहस्पतिर्दक्षो गौतमोथ यमोङ्गिराः ।
योगीश्वरः प्रचेताश्च शातातपपराशरौ ॥
संवर्त्तोशनसौ शङ्खलिखितावत्रिरेव च ।
विष्ण्वापस्तम्बहारीता धर्मशास्त्रप्रवर्त्तकाः ॥
एते ह्यष्टादश प्रोक्ता मुनयो नियतव्रताः ।
जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कन्दो लौगाक्षिकाश्यपौ ॥
व्यासः सनत्कुमारश्च शांतनुर्जनकस्तथा ।
व्याघ्रः कात्यायनश्चैव जातूकर्ण्यः कपिञ्जलः ॥
बौधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च ।
पैठीनसिर्गोभिलश्चेत्युपस्मृतिविधायकाः ॥
वशिष्ठो नारदश्चैव सुमन्तुश्च पितामहः ।
विष्णुः कार्ष्णाजिनिः सत्यव्रतो गार्ग्यश्च देवलः ॥
२८ मनुस्मृति ।
जमदग्निर्भरद्वाजः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
आत्रेयश्च गवेयश्च मरीचिर्वत्स एव च ॥
पारस्करश्चर्ष्यशृंगो वैजावापस्तथैव च ।
इत्येते स्मृतिकर्तार एकविंशतिरीरिताः ॥ '
प्रयोगपारिजात ।
कल्पतरु से १ बुध, २ सोम, ३ छागलेय, ४ जाबाल
और ५ च्यवन ये पांच नाम और ज्ञात होते हैं । इनको
६० में मिलाने से ६५ स्मृति हुईं। साधुचरणप्रसाद-महोदयसंगृ-
हीत धर्मशास्त्रसंग्रह से १ आश्वलायन, २ मार्कण्डेय, ३ शौनक,
४ कण्व, ५ उपमन्यु, ६ शाण्डिल्य ये छः स्मृतियां और
प्राप्त होती हैं । इनको मिलाने से ७१ एकहत्तर स्मृति हुई ॥
वृद्ध आदिपद-विशिष्टस्मृति ।
वृद्ध मनु, वृद्ध याज्ञवल्क्य, वृद्ध वशिष्ठ और वृद्ध. शातातप;
इस प्रकार कतिपय स्मृतिकारों के नाम वृद्धपद विशिष्ट प्राप्त
होते हैं । बृहद्विष्णुस्मृति, बृहद्यमस्मृति, बृहत्पाराशरीय धर्म-
शास्त्र; इस प्रकार कई एक स्मृति बृहत्पदविशिष्ट मिलती हैं ।
तथा लघुहारीतस्मृति, लघुशंखस्मृति; एवं कोई कोई स्मृति लघु-
पद विशिष्ट प्राप्त होती हैं । साधुचरणप्रसाद संगृहीत धर्मशास्त्र-
संग्रह से द्विविध आङ्गिरसस्मृति, द्विविध शातातपस्मृति, द्विविध
देवलस्मृति, त्रिविध औशनसस्मृति उपलब्ध होती हैं । इनके
भी कर्ता वही वही ऋषि-मुनि माने जाते हैं और ग्रन्थसंख्या
के बृहत् तथा लघु होने के कारण ग्रन्थकर्ता वा ग्रन्थ बृहत्-लघु-
पद से अङ्कित हुए, वा वृद्ध पद ऋषि-मुनि के नाम में
गौरव के लिये लगाया गया, इसी प्रकार योगिपद । जैसा-
योगि-याज्ञवल्क्य ।
भूमिका । २६
वर्णाश्रमधर्मविचार, शास्त्रप्रकोप और परीक्षा ।
भगवान् मनु ने कहा है कि—
'अर्थे कामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते ।
धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ॥'
.. अर्थ और काम में असक्तों (अलोलुपों) के लिये धर्मोप-
देश है और धर्म खोजनेवालों को धर्मनिर्णयार्थ श्रुति (वेद)
ही सर्वोपरि प्रमाण है । वेद का प्रतिपाद्य कर्म, उपासना और
ज्ञान है । यद्यपि वेदार्थ, ऋग्-यजुः-साम भेद से तथा शाखा-
भेद से अपरिच्छिन्न है; तौभी भगवान् जैमिनि और भगवान्
वेदव्यास के निरूपित सूत्रों से वह परिच्छिन्न हो गया है ।
भलेही कालवश से वेदशाखाओं का लोप हो जाय परंतु
उक्त सूत्रों से वेद-रहस्य रक्षित हो रहा है; इस कारण वर्त-
मान काल में भी अधिकारी के लिये अभ्युदय-निःश्रेयस (भुक्ति-
मुक्ति) का द्वार खुला है । इससे स्पष्ट है कि श्रौत तथा स्मार्त
वाङ्मयमात्र का रहस्य पूर्वोत्तरमीमांसा है और उनके कर्ता
जैमिनि-व्यास वेदपारदृश्वा हैं । इस विषय में पाराशरीय
प्रमाणवचन पहिले लिखा जा चुका है ।
वेद के शब्द और अर्थ-ये दो शरीर हैं। उसमें शब्द-शरीर
की रक्षा-शिक्षा-व्याकरण-निरुक्त और छन्द से है, अर्थ-शरीर
की रक्षा ज्योतिष कल्पसूत्र और उपाङ्ग से है। इस प्रकार
ऋग्-यजुः-सामरूप वेद के शब्दार्थरूप शरीर के अङ्ग तथा
उपाङ्ग सहायक हैं। अङ्ग-उपाङ्ग कहने से यह अभिप्राय नहीं
है कि जैसे लोक में अङ्गोपाङ्ग का समुदायरूप अङ्गी है, वा
अङ्गोपाङ्ग के नाश होजाने से अङ्गी नष्ट होजाता है; किंतु वेद
३० मनुस्मृति ।
के अङ्गोपाङ्ग, वेद के शब्दार्थरूप शरीर के परिचायक-प्रदर्शक-
बोधक माने जाते हैं । जैसे किसी पाठ्य के देवदत्तआदि बोधक
हैं; किंवा किसी दृश्य के सौर आदि प्रकाश प्रकाशक हैं। और
जैसे देवदत्त के अभाव में यज्ञदत्त आदि तथा सौर प्रकाश के
अभाव में आग्नेय-प्रकाश आदि कार्य के साधक हैं, वैसेही
कालवश अङ्गोपाङ्ग के नष्ट हो जाने पर दूसरे अङ्गोपाङ्ग वेद के
सहायक होते हैं । इससे स्पष्ट है कि अङ्गोपाङ्ग के अधि-
कार नित्य हैं और वे स्वरूप से अनित्य हैं और वेद तो
स्वरूप से भी नित्य है । इसीलिये वेद का नाम श्रुति है
‘ श्रूयते गुरुपरम्परया, न तु केनचित् क्रियते इति श्रुतिः ’ जो
गुरुपरम्परा से सुनी जावै और बनाई न जावै वह श्रुति है ।
और अङ्गोपाङ्ग का साधारण नाम स्मृति है ‘स्मर्यते इति स्मृतिः’
जो वेदार्थानुकूल स्मरण की जावै वह स्मृति है । स्मरण के
न्यूनाधिक भाव से ही स्मृतियों के प्रामाण्य में न्यूनाधिक भाव
माना गया है इसीलिये वृहस्पति ने कहा है—
‘ वेदार्थोपनिबन्धत्वात्प्राधान्यं हि मनोःस्मृतम् ।
मन्वर्थविपरीता तु या स्मृतिः सा न शस्यते ॥ ’
वेदार्थ के संकलन करने से मनु का प्राधान्य है और
मनुस्मृति से विरुद्ध जो कोई स्मृति है वह प्रशंसनीय नहीं है ।
यहां यद्यपि मनुस्मृति सजातीय स्मृतियों के लक्ष्य से यह
बृहस्पति का वचन है तोभी वलावल विचार से यथासंभव
अङ्ग और उपाङ्ग भर में प्रामाण्य का न्यूनाधिक भाव मानना
पड़ता है। और यह स्मरण रहे कि अङ्ग और उपाङ्ग की संज्ञा
वलावल विचार में प्रयोजनीय नहीं है, वह वैदिक शब्दार्थ
शरीर के अनुसार की गई है ।
भूमिका। ३१
यह अवश्य विज्ञेय है कि शब्द और अर्थ का नित्य संबन्ध
है, तथा शब्द का दोष अर्थ में संक्रान्त होता है। अतएव
शब्दनिष्ठ स्वर के भेद से अर्थ का भेद हो जाता है। यह बात
शिक्षा-निरुक्त लिखित इस मन्त्र से स्पष्ट है। जैसा—
' मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा
मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह ।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति
यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥ '
स्वर अथवा वर्ण से हीन, अतएव दोषग्रस्त होने से
मिथ्या उच्चारित, मन्त्र-वाक्य; वास्तविक अर्थ को नहीं कहता
है। वह मन्त्ररूप वज्र यजमान को मार देता है। जैसे स्वर
के दोष से इन्द्रशत्रु मारा गया। आशय यह है कि पूर्व
काल में इन्द्रने त्वष्टा के विश्वरूप नामक पुत्र को मारा, तब
त्वष्टा क्रुद्ध होकर इन्द्रको मारनेवाले वृत्र नामक दूसरे पुत्र
की कामना से आभिचारिक यज्ञ किया और ' इन्द्र का
शत्रु होकर बढ़ो ' इस इच्छा से 'इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व' इस वाक्य का
उच्चारण किया। उसमें षष्ठीतत्पुरुष समास के अनुसार
अन्तोदात्त का उच्चारण करना था, परंतु प्रमाद से बहुव्रीहि
समास के अनुसार आद्युदात्त का उच्चारण हो गया, जिसका
विपरीत फल हुआ कि वृत्र को इन्द्रने मारा। अर्थात् ' इन्द्र-
शत्रुः' इस पद का ' इन्द्रस्य शत्रुः ' ऐसा तत्पुरुष समास
करने से ' इन्द्र का शत्रु.' यह अर्थ होता है; और ' इन्द्रः शत्रु-
र्यस्य सः ' ऐसा बहुव्रीहि करने से ' इन्द्र है शत्रु (मारने
वाला) जिसका ' यह अर्थ होता है। यह विषय वैयाकरणों
में अति प्रसिद्ध है।
४२ मनुस्मृति ।
इसी प्रकार–" विज्ञानमानन्दं ब्रह्म " इत्यादिक श्रुति में
विज्ञान-पद में मतुबर्थीय अच्प्रत्यय कल्पना करके 'विज्ञानरूप '
ऐसा परम्परा गत अर्थ को न मानकर ' विज्ञानवान् ' ऐसा नवीन
अर्थ कल्पना करते हैं। अर्थात् विज्ञान-पद से ' विज्ञानवान् ' यह
अर्थ निकालने के लिये जब ' विज्ञानमस्यातीति विज्ञानम्=जिस
के विज्ञान है वह विज्ञान=विज्ञानवान्' ऐसी व्याख्या की जाती है
तब ' विज्ञान ' पद अन्तोदात्त होगा, परंतु ' विज्ञायते यत् तत्=
जो जाना जाय ' ऐसी परम्परागत व्याख्या से ' विज्ञान ' पद
स्वरित स्वरान्त है। आशय यह है कि जो गुरुपरम्परा से सस्वर-
वेद पढ़े हैं वे लोग ' विज्ञान ' पद को स्वरित ही पढ़ते हैं, तब
पूर्वयुक्ति से ' विज्ञान ' पद को अन्तोदात्त बना डालना कैसा
अनर्थ का काम है ? शिव शिव, हरे हरे । एवं साहस करने
ही से वेददूषक-ब्रह्मघ्न आदि उपाधि के पात्र बनते हैं।
इसी प्रकार–" कृष्णोऽस्याखरेष्ठोऽग्नये " इस सुप्रसिद्ध
यजुर्वेदीय-मन्त्र में ' कृष्ण ' पद आद्युदात्त पढ़ाजाता है
जिससे वहां ' कृष्ण ' पद का मृग अर्थ परम्परा प्राप्त है।
यदि ' कृष्ण ' पद अन्तोदात्त पढ़ा जाय तो वर्णवाची हो
जायगा इत्यादि ।
इन बातों से साफ जाहिर होता है कि वेदों में थोड़े ही
हेरफेर से अर्थ का अनर्थ होजाता है इसी भय से पूर्वकाल
में वेद अयातयाम ( ताजे ) बनारक्खे जाते थे उनके यथार्थ
धारण करनेवाले ' ऋषि ' तथा ' मन्त्रद्रष्टा ' कहलाते ,
थे और गुरुमुख से यथावत् उनको पढ़नेवाले ' अनूचान ' नाम
से विख्यात होते थे । मनु ने लिखा है–
भूमिका । ३३
‘ न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥ ’
बड़ी अवस्था होने से या बाल पकने से या धनवान् होनेसे
या सुयोग्य बान्धवों से महत्त्व नहीं प्राप्त होता है। ऋषियों ने
नियम किया है कि जो अनूचान ( साङ्गवेद का अध्येता ) है
वही हमारे महान् है।
कालवश जब क्षत्रियसम्म्राट् का अभाव हुआ, वर्णाश्रम की
शिक्षाप्रणाली शिथिल होगई, वैदिक शुद्धज्ञान लुप्तप्राय होगया;
तभी से वर्णाश्रमव्यवस्था में चलनेवाले मनुष्यों की वृत्तियां
बदल गईँ, नानाप्रकार की धार्मिकशिक्षा चलपड़ीं, ब्राह्मण धर्म-
ध्वज बन गये, मनमानी धार्मिक व्यवस्थाएं करने लगे, अपने
अपने मतों के पुष्टि के लिये श्रुति स्मृतियों के यथेष्ट व्याख्यान
होने लगे, ग्रन्थों में नानाविध वाक्य मिला दिये गये, श्रुति
स्मृति के नाम से कितने एक नवीन ग्रन्थ बना डाले गये,
यहां तक, कि कईएक स्थलों में आर्ष और पौरुष विवेक संदेह-
सागर में डूब गया।
काल की महिमा है कि जो व्याकरण-न्याय वेदार्थ की
रक्षा के लिये पढ़े पढ़ाये जाते थे, जिनके बदौलत वेद के
शब्द और अर्थ से शरीर में किसी प्रकार की भी पीड़ा नहीं पहुँ-
चती थी वही ( व्याकरण-न्याय ) अब विपरीतभाव के लिये
उपस्थित किये कराये जाते हैं। व्याकरण-भाष्य में वारंवार
दिखलाया है कि वेदों के रक्षार्थ व्याकरण है। परंतु अब
वेदों का मनमाना अर्थ करने के लिये व्याकरण-चीर तयार
किया जाता है। और न्यायदर्शन में कहा है कि तत्त्वनिर्णय
३४ मनुस्मृति ।
के रक्षार्थ जल्प-वितण्डा हैं । परंतु इस समय अपने अपने
मतों के रक्षार्थ जल्प-वितण्डा का प्रयोग होता है ।
प्रसङ्गवश यह कहना पड़ता है कि चार्वाक, बौद्ध और जैन
वेददूषक अवश्य हुये हैं, पर उनसे वैदिक धर्म पर ऐसा आघात
नहीं पहुँचा कि जिसका प्रतीकार न हुआ हो। क्योंकि वे सब
खुल्लमखुल्ला वेददूषक हुए इस कारण समय समयपर उनकी
चिकित्सा भी होती गई । पर इस दुर्बल धार्मिक-संस्था में जो
प्रच्छन्न (गुप्त) चार्वाक आदि प्रबल हो रहे हैं इनका शासन
अतिकठिन क्या, बल्कि अशक्य सा होरहा है । इस शोचनीय
दशा का उल्लेख विद्याँ (दार्शनिकनिबन्ध) में यों आया है—
'प्रत्यक्षीक्रियतेऽद्य वेदपुरुषो व्याख्याकशालाञ्चितो
दृश्यन्ते स्मृतयोऽपि दुर्बलदशाः स्वेच्छा 'नियोगाङ्किताः ।'
तर्कोद्भावनया पुराणघटनोपन्यासतां नीयते
'क्षुभ्यद्धर्ममृगान्तरेषु वलते शार्दूलविक्रीडितम् ॥
साध्यन्ते परमोहनाय शतधा साध्यानि वेदादितो
वेदार्थेष्वपि साध्यभङ्गसमये श्रद्धाऽन्यथोत्पाद्यते ।
आपातामलवस्तुसंगतिकथाव्याजृम्भणाडम्बरै-
राशूपाजितगौरवं प्रतिसभं निःशङ्कमाभाष्यते ॥
आस्तिक्यं प्रथयन्ति धर्मविषये भस्मोर्ध्वपुण्ड्रादिकै-
रन्तर्ध्वस्तसमस्तशास्त्रविधयो नास्तिक्यमध्यासते ।
मन्ये प्राग्यत एव वेदविटपी शाखासहस्रं दधौ
तस्मादेव धरामरेन्द्रकुलतः संप्रत्युपैत्यत्ययम् ॥ '
१ 'तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं जलपवितण्डे बीजप्ररोहसंरक्षणार्थं कण्टकशाखा-
वरणवत्' गौ० सू०
२ यह निबन्ध उक्त पूज्यपाद श्रीद्विवेदी जी कृत है ।
१। कर्मकाण्ड। वेद प्रतिपाद्य कर्म, श्रौत और स्मार्त भेद
'भूमिका।' ३५
१। कर्मकाण्ड। वेद प्रतिपाद्य कर्म, श्रौत और स्मार्त भेद
से दो प्रकार का है; इसका उल्लेख पहिले भी हो चुका है।
यद्यपि श्रुतियों के आधार पर स्मार्तकर्म हैं और श्रौतकर्म
साक्षात् श्रुतियों से सिद्ध हैं, इस युक्तिसे श्रौतकर्म का प्राधान्य
प्राप्त होता है तो भी स्मार्तकर्म उपनयन के विना श्रौतकर्म अग्निहोत्र
आदि नहीं हो सकता यह वैदिक सिद्धान्त है। इसीलिये
श्रौतकर्म का अधिकारी बनने के लिये पहिले उपनयनद्वारा
द्विजाति होना अत्यावश्यक है।
उपनयन=यज्ञोपवीत=जनेऊ। उपनयनसंस्कार के पूर्व
पश्चाद्भावी संस्कारों की चर्चा आगे की जायगी, पहिले यह
जानना बहुत जरूरी है कि 'उपनयन' ऐसा प्रधान संस्कार
जिसके ऊपर सारी वर्णाश्रम-व्यवस्था का भार है, वह इस
समय कष्टतरदशा को झेल रहा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य
से विवाहिता-ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या में उत्पन्न बालक अपने
अपने समय पर उपनयन होने से 'द्विजाति' पद को
प्राप्त करते थे। क्षत्रिय, वैश्यों की कथा पीछे की जायगी, पहिले
उन अभागे ब्राह्मण बालकों की दशा दिखलाई जाती है कि
जिनके माता पिता दान लेने के लिये द्विजोत्तम बनकर अग्रसर
होते हैं। बहुधा देखने में आता है कि आठ वर्ष क्या, बल्कि
सोलह वर्ष का जवान बन गया है लेकिन गले से जनेऊ लिपटने
का अवसर नहीं आया। यदि भाग्यवश अवसर भी आया तो
किसी देवता वा तीर्थ के स्थान पर जाकर जनेऊ गले में डाल
लिया गया। यदि लड़के के माता पिता धनिक हुए तो विवाह-
मुहूर्त्त के एक दो दिन पेश्तर, कैसा ही दुर्मुहूर्त्त क्यों न हो,
झटपट गले में जनेऊ डाल दिया जायगा! उस पर भी
३६ मनुस्मृति ।
किसी किसी प्रदेश में यह 'विशेष' है कि बालक के पिता के
भगिनीपति या जामाता आदि ही गायत्री का उपदेश किया
करते हैं और वे 'मान्य' शब्द से पुकारे जाते हैं। कहीं
कहीं कुलगुरु कान फूंका करते हैं, वे चाहे गायत्री से परिचित
हों वा अपरिचित । और यही दशा उन मान्यधुरंधरों की भी है।
किसी मौके पर यहां तक नौबत गुजरती है कि 'रामनाम'
सुना दिया गया। क्या इससे भी गायत्री बड़ी है ! हरे हरे,
ऐसा अँधियारा छा गया। देखो 'रामनाम' बड़ा पदार्थ
है, इसमें कोई शक नहीं पर 'गायत्री' भी वह पदार्थ है
जिसकी पाबन्दी वर्णाश्रम श्रृंखला में बँधकर रामजी ने भी की थी।
और ऐसा भी देखने में आया है कि जिन लड़कों के माता पिता
सामान्य हैं, या विवाह की राह देख रहे हैं, या लापरवाह
हैं उनके दश, बीस, पचास, सौ लड़कों को एकत्र करके कोई
कोई साहसिक धनी एकदम जनेऊ करा डालते हैं। यह
ताण्डव प्रातःकाल से लेकर सायंकाल तक पांच सात ब्राह्मणों
से खतम होता है........इत्यादि ।
लड़कों के पिता लोग 'गोत्र, प्रवर' से अपरिचित रहते
हैं, ऐसी दशा में संध्या-तर्पण की तो बात ही क्या है ? कोई
गोत्र से परिचित भी रहते हैं पर 'प्रवर' से अपरिचित रहते
हैं। कोई गोत्र से परिचित होकर भी गोत्र का व्यवहार नहीं
करते हैं, किंतु गोत्र की जगह 'गोत' एक निराला ही पदार्थ
मानते हैं और उस गोत ही से विवाह-संबंध करते हैं। ऐसी
दशा में 'सगोत्रा' तथा 'समानप्रवरा' कन्या से विवाह
करने में कितना बड़ा दोष है यह बात धर्मशास्त्र या लोक-
१ परिणीय सगोत्रां तु समानप्रवरां तथा।
त्यागं कुर्याद्द्विजस्तस्यास्ततश्चान्द्रायणं चरेत् ॥
भूमिका । ३७
व्यवहार से छिपी नहीं है। यह केवल मूर्खों ही की कथा
नहीं है किंतु विद्वानों की भी है और उनको समाधान भी
मिलता ही जाता होगा।
बाक़ी रहे क्षत्रिय और वैश्य; उनको क्या कहा जावे ?
ब्राह्मणों को चारा देते हैं, तो भी 'दोषा वाच्या गुरोरपि'
इस न्याय का आश्रय लेकर कुछ कहा जाता है क्योंकि
याज्य होने से धर्मशास्त्रानुसार उनके ऊपर ब्राह्मणों का
अधिकार पुश्तैनी है। दुःख का विषय है कि क्षत्रिय और
वैश्य जाति से जनेऊ का व्यवहार उठ सा गया। कई घराने
तो ऐसें मिलेंगे कि उनमें से यदि किसी एक बूढ़े को पूछा
जावै कि आपके पुरुषों में किसका जनेऊ हुआ था तो देखना तो
दूर है पर सुनने का भी पता न चलेगा। कई घराने में किसी
क़दर जनेऊ होता भी है तो और घरानों के साथ खान् पान
संबंध होने से गजस्नान के समान उसका होना न होना बरा-
बर है। दूसरी यह बात है कि छोटे छोटे क्षत्रिय तथा वैश्य
विवाह आदि संबंधों के कारण बड़ों के अधीन हो रहे हैं
और बड़े तो बड़े ही हैं जिनमें बहुतेरे क्षत्रियों की उपभोग-
सामग्री महंमदियों की सी है और बहुतेरे वैश्यों का आचार
जैनों का सा है इसीलिये 'कलावाद्यन्तयोः स्थितिः' यह
कहना कई अंशों में यथार्थ हो गया है। और जो ब्राह्मणों के
प्रभाव से तथा अपने अपने अज्ञान से नवीन-त्रैवर्णिक जाति
बनती जाती है उसके विचार की आवश्यकता नहीं है। चातु-
र्वर्ण्यशिक्षा में कहा है—
३८ मनुस्मृति ।
‘ उत्पद्यतां नाम विलीयतां
वा नवा नवा जातिरहो तया किम् ।
न यत्र पारस्परिकी प्रतीतिः
क्रियापि सा जातिरनर्गला किम् ॥
जातिस्तदुत्कर्षविधिर्द्वयीति
स्मार्ती न लौकिक्यथ शासनेन ।
तत्राश्रयो युज्यत आत्मवृद्ध्यै
नहीच्छया सिध्यति भागधेयम् ॥’
अब ‘उपनयन’ के पूर्वपश्चाद्भावी संस्कारों का क्रम
दिखलाया जाता है, यह क्रम यद्यपि स्मृतिपाठभेद के कारण
कई स्थलों में भिन्न भिन्न प्राप्त होता है तो भी प्रौढ़ विद्वानों के
लेखानुसार ठीक कर लिया गया है। “ १ गर्भाधान, २ पुंस-
वन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ अन्न-
प्राशन, ७ चौल, ८ उपनयन, १२ चतुर्वेदव्रत, १३ स्नान
(समावर्तन) १४ सहधर्मचारिणी-संयोग (विवाह) १६ पञ्च-
महायज्ञ, २० अष्टका, २१ पार्वण, २२ श्राद्ध, २३ श्रावणी,
२४ आग्रहायणी, २५ चैत्री, २६ आश्वयुजी, २७ अग्न्याधान,
२८ अग्निहोत्र, २९ दर्शपौर्णमास, ३० चातुर्मास्य, ३१ आग्र-
यणेष्टि, ३२ निरूढपशुबन्ध, ३३ सौत्रामणी, ३४ अग्निष्टोम,
३५ अत्यग्निष्टोम, ३६ उक्थ, ३७ षोडशी, ३८ वाजपेय,
३६ अतिरात्र, ४० आप्तोर्याम ये चालीस संस्कारों के नाम हैं।
इनके अनुष्ठान-क्रम और लक्षण कल्पसूत्रों से जाने जाते हैं।
इनमें गर्भाधान से लेकर विवाहपर्यन्त चौदह संस्कारों से
पवित्र गृहस्थ=गृही=घरवाला बनता है और अगले संस्कारों
से वह उत्तरोत्तर माननीय बनता है (और चतुर्वेदव्रत के
अध्याय में बहुत कुछ लिखा है । अष्टकादि आश्वयुजीपर्यन्त
भूमिका । ३६
अनन्तर ही पूर्वकाल में आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद, अथर्व
वेद की शिक्षा प्राप्त की जाती थी ) इनमें भी पञ्चमहायज्ञ
गृहस्थ का नित्यकर्म है, जिसके बारे में भगवान् मनु ने तृतीय
अध्याय में बहुत कुछ लिखा है । अष्टकादि आश्वयुजीपर्यन्त
सात स्मार्तकर्म पाकनिष्ठ हैं, अग्न्याधानादि सौत्रामणीपर्यन्त
सात श्रौतकर्म हविपनिष्ठ हैं और अग्निष्टोमादि आप्तोर्याम-
पर्यन्त सात श्रौतकर्म सोम ( पूतिका ) निष्ठ हैं । उक्त चालीस
संस्कारों के अलावा ये आठ आत्मगुण हैं—१ दया,
२ क्षान्ति, ३ अनसूया, ४ शौच, ५ अनायास, ६ माङ्गल्य,
७ अकार्पण्य, ८ अस्पृहा । आन्तरक्रिया साध्य होने से
इनका भी उल्लेख संस्कारप्रकरण में किया है ।
' गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तोन्नयनं जातकर्म नामकरणान्न-
प्राशनचौलोपनयनं चत्वारि वेदव्रतानि स्नानं सहधर्मचारिणी-
संयोगः पञ्चानां यज्ञानामनुष्ठानमष्टका पार्वणं श्राद्धं श्रावण्या-
ग्रहायणी चैत्र्याश्वयुजीति सप्त पाकसंस्थाः अग्न्याधानमग्नि-
होत्रं दर्शपूर्णमासौ चातुर्मास्यान्याग्रयणेष्टिर्निरूढपशुबन्धः
सौत्रामणीति सप्त हविर्यज्ञसंस्थाः अग्निष्टोमोऽत्यग्निष्टोम उक्थः
षोडशी वाजपेयोऽतिरात्र आप्तोर्याम इति सप्त सोमसंस्था इत्येते
चत्वारिंशत्संस्काराः । अष्टावात्मगुणा दया सर्वभूतेषु क्षान्ति-
रनसूया शौचमनायासो माङ्गल्यमकार्पण्यमस्पृहेति ॥ , '
गौतम ।
' सर्वथापि-३ । ४ । ३४ । ' इस ब्रह्मसूत्र के शारीरक
व्याख्यानुसार ' १ निरशनसंहिताध्ययन, २ प्रायणकर्म,
१ वर्तमानकालिक मनुष्यशिक्षा का वर्णन ' चातुर्वर्ण्यशिक्षा ' में देखो ।
४० मनुस्मृति ।
३ जप, ४ उत्क्रमण, ५ दैहिक, ६ भस्मसमूह्न, ७ अस्थि-
संचयन, ८ श्राद्ध, ' ये आठ संस्कार और प्राप्त होते हैं
इनको लेने से अड़तालीस संस्कार होते हैं ।
' यस्यैते अष्टाचत्वारिंशत् संस्कारा इत्याद्या च '
शारीरक ।
आङ्गिरा ने ये पचीस संस्कार कहे हैं—
' पञ्चविंशतिसंस्कारैः संस्कृता ये द्विजातयः ।
ते पवित्राश्च योग्याश्च श्राद्धादिषु सुयन्त्रिताः ॥
गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तो बलिरेव च ।
जातकृत्यं नामकर्म निष्क्रमोऽन्नाशनं तथा ॥
चौलकर्मोपनयनं तद्व्रतानां चतुष्टयम् ।
स्नानोद्वाहौ चाग्रयणमष्टका च यथायथम् ॥
श्रावण्यामाश्वयुज्यां च मार्गशीर्ष्यां च पार्वणम् ।
उत्सर्गश्चाप्युपाकर्म महायज्ञाश्च नित्यशः ।
संस्कारा नियता ह्येते ब्राह्मणस्य विशेषतः ॥ '
ये पचीस संस्कार नैमित्तिक, वार्षिक, मासिक और नित्य
भेद से चार प्रकार के होते हैं यह अश्वलायन ने कहा है—
' नैमित्तिकाः षोडशोक्ताः समुद्राहावसानकाः ।
सप्तैवाग्रयणाद्याश्च संस्कारा वार्षिका मताः ॥
मासिकं पार्वणं प्रोक्तमसक्तानां तु वार्षिकम् ।
महायज्ञास्तु नित्याः स्युः सन्ध्यावच्चाग्निहोत्रवत् ॥ '
इनमें गर्भाधानादि विवाहान्त सोलह संस्कार नैमित्तिक
और आग्रयण-आदि उपाकर्मपर्यन्त सात संस्कार मासिक,
किंवा वार्षिक हैं । पञ्चमहायज्ञ, संध्योपासन तथा अग्निहोत्र
के समान नित्य हैं ।
भूमिका । ४१
व्यास ने ये सोलह संस्कार कहे हैं—
‘ गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तो जातकर्म च ।
नामक्रिया-निष्क्रमणेऽन्नाशनं वपनक्रिया ॥
कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारम्भक्रियाविधिः ।
केशान्तः स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रहः ॥
त्रेताग्निसंग्रहश्चेति संस्काराः षोडश स्मृताः ।
नवैताः कर्णवेधान्ता मन्त्रवर्जं क्रियाः स्त्रियः ॥
विवाहो मन्त्रतस्तस्याः शूद्रस्यामन्त्रतो दश ॥’
इनमें गर्भाधानादि विवाहान्त चौदह संस्कार, पंद्रहवां स्मार्त्त
अग्न्याधान, सोलहवां श्रौत अग्न्याधान है ।
सारांश यह है कि अपने अपने कल्पसूत्र ( स्मार्त्तसूत्र श्रौत
सूत्रों) के अनुसार अधिक अथवा न्यून जितने संस्कार प्राप्त
होवें उनका ही करना योग्य है । और पहिले जो संस्कारों
की अधिक वा न्यून संख्या लिखी है वह सब वैदिक शाखा
सूत्रों के भेद से है । इसीलिये गोत्र, प्रवर के समान शाखा-
सूत्र का भी स्मरण रखना अत्यावश्यक है । नहीं तो किस
किस वाक्य के अनुसार संस्कार किया जायगा । सर्वथा
संस्कार का उच्छेद होगा या दूसरे का बेटा बनना पड़ेगा ।
उक्त व्यवस्था में यह गृह्यपरिशिष्टकार का वाक्य है—
‘ बह्वल्पं वा स्वगृह्योक्तं यस्य यावत् प्रकीर्तितम् ।
तस्य तावति शास्त्रार्थे कृते सर्वः कृतो भवेत् ॥’
इसी प्रकार कात्यायन का वाक्य है—
‘ ऊनो वाऽप्यतिरिक्तो वा यः स्वशाखास्थितो विधिः ।
तेन संतनुयाद् यज्ञं न कुर्यात् पारशाखिकम् ॥
४२ मनुस्मृति ।
परशाखोऽपि कर्तव्यः स्वशाखायां न नोदितः ।
सर्वशाखासु यत् कर्म एकं प्रत्यवशिष्यते ॥'
ऐसी दशा में अन्यान्य स्मृतियों की उपेक्षा करके अपनी
अपनी गृह्यस्मृति (स्मार्तसूत्र) के अनुसार यावच्छक्य गर्भा-
धानादि संस्कारों का अनुष्ठान करना न्यायप्राप्त है। जैसे
शुक्लयजुर्वेदीय-माध्यंदिनी शाखावालों को उनकी गृह्यस्मृति
(पारस्करस्मार्तसूत्र) के अनुसार ये संस्कार करने चाहियें-
(१) आर्तव (ऋतु) काल में गर्भाधान ।
(२) दूसरे वा तीसरे मासमें गर्भचलन के पूर्व पुंसवन ।
(३) छठे वा आठवें मास में सीमन्त (सीमन्तोन्नयन) ।
(४) उत्पन्न होने पर जातकर्म ।
(५) ग्यारहवें दिन नामकर्म ।
(६) चौथे मासमें निष्क्रमण (बालक को घर से बाहर लाना)
(७) छठे मास में अन्नप्राशन ।
(८) पहिले वा तीसरे वा कुलाचार के अनुसार चूडा
(चौल) । (गृह्यस्मृति वा याज्ञवल्क्य में अनुक्त कर्णवेध, चौल
वा उपनयन के साथ यथाचार अनुष्ठेय है)
(९) गर्भाधान से आठवें वा आठवें वर्ष में ब्राह्मण का,
गर्भाधान से ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय का, बारहवें में वैश्य का,
उपनयन संस्कार कहा है। यदि उक्त काल से दूना गौण
काल (१६, २२, २४ वर्ष) व्यतीत हो जाय तो बाद
'व्रात्यस्तोम' नामक प्रायश्चित्त किये बिना वे सब
१। इस समय पंचगौडों में तो उपनयन, वेदारम्भ, केशान्त और समावर्तन
ये चारों संस्कार एक ही दिन में खतम कर दिये जाते हैं ।
२। स्मार्त व्रात्यस्तोम कर्म दुर्लभ होरहा है ।
भूमिका । ४३
(ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य के अभागे लड़के) उपनयन के अधिकारी
कथमपि नहीं हो सकते और यह भी स्मरण रखने योग्य है
कि यदि इस काल के अभ्यन्तर स्त्रीपरिग्रह हो जाय तो अधि-
काधिक प्रायश्चित्त के भागी बनेंगे । जातकर्मार्दि चूडान्त पांच
संस्कार कन्या के अमन्त्रक (मन्त्रवर्जित) होते हैं और कन्या
का उपनयन-संस्कार नहीं होता है । अतएव वेदारम्भ-के-
शान्त-समावर्तन भी नहीं होते हैं ।
(१०) उपनयन के अनन्तर वेदारम्भ (स्वशाखाध्यय-
नारम्भ) ।
(११) यथासंभव अध्ययन के बाद केशान्तकर्म
(गोदानविधि) ।
(१२) केशान्तकर्म के अनन्तर समावर्तन ।
(१३) सोलहवें वर्ष के अनन्तर विवाह । यह विवाह-
संस्कार कन्या का आठवें वर्ष से ग्यारहवें वर्ष तक होना
आवश्यक है और विवाह संस्कार के पहिले साधारण शिक्षा
पश्चात् विशेष शिक्षा ब्रह्मचर्य व्रतपूर्वक अवश्य कर्त्तव्य है ।
(१४) विवाह के अनन्तर ही वा भाइयों से पृथक् होने पर
आवसथ्याधान (गृह्याग्निस्थापन) ।
(१५) यथाकाल पञ्चमहायज्ञ ।
(१६) श्रावण की पौर्णमासी में उपाकर्म ।
१। स्त्रियों की शिक्षाविधि ‘विद्या’ और ‘चातुर्वर्ण्यशिक्षा’ में देखो ।
२। ‘आवसथ्याधान’ किये बिना भी ‘पञ्चमहायज्ञ’ हो सकता है और
गृहस्थ को अत्यन्त आवश्यक है ।
४४ मनुस्मृति ।
( १७ ) पौष मास के रोहिणी नक्षत्र में वा कृष्णाष्टमी में
उत्सर्ग । .... .... .... इत्यादि ।
इसी प्रकार माध्यंदिनी शाखावालों को कात्यायन श्रौत
सूत्रानुसार अग्न्याधानादि श्रौतकर्म करना चाहिये ।
( १ ) अग्न्याधान । इसका आरम्भ ब्राह्मण-द्विज वसन्त
ऋतु में, क्षत्रिय-द्विज ग्रीष्मऋतु में, वैश्य-द्विज शरद् ऋतु में
करते हैं । अग्न्याधान में अध्वर्यु, होता, उद्गाता और ब्रह्मा
ये चार ऋत्विक् होते हैं । अग्न्याधान-शाला में पश्चिम की
ओर 'गार्हपत्य' नाम अग्नि का वृत्ताकार कुण्ड होता है । इस
से पूर्व की ओर 'आहवनीय' नाम अग्नि का चतुरस्र कुण्ड
होता है । दक्षिण की ओर 'अन्वाहार्यपचन' नाम अग्नि
का वृत्तार्धाकार कुण्ड होता है । गार्हपत्य और आहवनीय
कुण्ड के अन्तराल भूमि में एक विशिष्ट वेदिका बनाई जाती
है, जिसका पूर्व भाग 'अंश' पश्चिम भाग 'श्रोणि' कहलाता है ।
( २ ) अग्निहोत्र । यह सायं और प्रातः वेदमन्त्र से
जो अग्नि में आहुति दी जाती है उस कर्म का नाम है ।
' यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासत ।
एवं, सर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासते ॥ '
( छां. उ. )
( ३ ) दर्शपौर्णमास । यह इष्टि आहिताग्नि ( अग्न्याधान-
कर्ता ) को प्रतिमास करना पड़ता है .... इत्यादि ।
इसी प्रकार आश्वलायन-शाङ्खायन आदि सूत्रों के अनुसार
ऋग्वेदियों के कर्म; आपस्तम्ब-हिरण्यकेशीय-सत्याषाढ
१-स्मार्त कर्म में ' अष्टका ' आदि कतिपय कर्म और श्रौतकर्म में आगिले
सभी भाग छोड़ दिये हैं । उनमें राजसूय, अश्वमेध क्षत्रिय के विषय हैं ।
भूमिका । ४५
आदि सूत्रों के अनुसार कृष्णयजुर्वेदियों के कर्म; गोभिल-
कौथुम आदि सूत्रों के अनुसार सामवेदियों के कर्म और
शौनक सूत्रानुसार अथर्ववेदियों के कर्म होते हैं। और यह
स्मरण रहे कि सर्वत्र स्मार्तकर्म में स्मार्तसूत्र और श्रौतकर्म में
श्रौतसूत्र ही शरण हैं। शाखा-सूत्र के विस्मरण में वा उच्छेद
में अन्यान्य स्मृतियों का शरण लेना यह अगतिक गति है।
एवं, प्रेतकर्म में गरुड़पुराण का शरण लेना भी अपनी अपनी
गृह्यस्मृति के अभावदशा में है। क्योंकि प्रायः पुराणों में
सर्वशाखीय कर्मों का निरूपण है इस कारण पौराणिक-कर्म लेने
से गृह्यस्मृति का अनादर होता है वह सर्वथा विरुद्ध है।
प्रेतकर्म-श्राद्ध । मरीचि ने कहा है—
' प्रेतं पितॄंश्च निर्दिश्य भोज्यं यत् प्रियमात्मनः ।
श्रद्धया दीयते यत्तु तच्छ्राद्धं परिकीर्तितम् ॥ '
मृतपित्रादि 'सपिण्डीकरण' श्राद्ध के पहिले "प्रेत =
प्र + इत " शब्द से कहे जाते हैं। मृतपित्रादिकों के उद्देश्य
से जो आत्मप्रिय भोजनादि ब्राह्मण को श्रद्धा से दिया जावे
वह 'श्राद्ध' कहलाता है। श्राद्ध चार प्रकार का है-एकोद्दिष्ट,
सपिण्डन; पार्वण और नान्दी। एकोद्दिष्ट तीन प्रकार का
है—नव, नवमिश्र और पुराण।
(१) मरण दिन से लेकर दशवें दिन तक जो श्राद्ध कहे
हैं वे 'नव' हैं।
(२) एकादशाहादि ऊनवार्षिक पर्यन्त श्राद्ध 'नव-
मिश्र' हैं।
१ इस समय ब्राह्मण सपत्ति के अभाव से अपात्रक श्राद्ध ही बहुधा होता है।