मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 30, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें२८ मनुस्मृति ।
जमदग्निर्भरद्वाजः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
आत्रेयश्च गवेयश्च मरीचिर्वत्स एव च ॥
पारस्करश्चर्ष्यशृंगो वैजावापस्तथैव च ।
इत्येते स्मृतिकर्तार एकविंशतिरीरिताः ॥ '
प्रयोगपारिजात ।
कल्पतरु से १ बुध, २ सोम, ३ छागलेय, ४ जाबाल
और ५ च्यवन ये पांच नाम और ज्ञात होते हैं । इनको
६० में मिलाने से ६५ स्मृति हुईं। साधुचरणप्रसाद-महोदयसंगृ-
हीत धर्मशास्त्रसंग्रह से १ आश्वलायन, २ मार्कण्डेय, ३ शौनक,
४ कण्व, ५ उपमन्यु, ६ शाण्डिल्य ये छः स्मृतियां और
प्राप्त होती हैं । इनको मिलाने से ७१ एकहत्तर स्मृति हुई ॥
वृद्ध आदिपद-विशिष्टस्मृति ।
वृद्ध मनु, वृद्ध याज्ञवल्क्य, वृद्ध वशिष्ठ और वृद्ध. शातातप;
इस प्रकार कतिपय स्मृतिकारों के नाम वृद्धपद विशिष्ट प्राप्त
होते हैं । बृहद्विष्णुस्मृति, बृहद्यमस्मृति, बृहत्पाराशरीय धर्म-
शास्त्र; इस प्रकार कई एक स्मृति बृहत्पदविशिष्ट मिलती हैं ।
तथा लघुहारीतस्मृति, लघुशंखस्मृति; एवं कोई कोई स्मृति लघु-
पद विशिष्ट प्राप्त होती हैं । साधुचरणप्रसाद संगृहीत धर्मशास्त्र-
संग्रह से द्विविध आङ्गिरसस्मृति, द्विविध शातातपस्मृति, द्विविध
देवलस्मृति, त्रिविध औशनसस्मृति उपलब्ध होती हैं । इनके
भी कर्ता वही वही ऋषि-मुनि माने जाते हैं और ग्रन्थसंख्या
के बृहत् तथा लघु होने के कारण ग्रन्थकर्ता वा ग्रन्थ बृहत्-लघु-
पद से अङ्कित हुए, वा वृद्ध पद ऋषि-मुनि के नाम में
गौरव के लिये लगाया गया, इसी प्रकार योगिपद । जैसा-
योगि-याज्ञवल्क्य ।