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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

३२ : मनुस्मृति ।
भवत्पूर्वं चरेद्भैक्ष्यमुपनीतो द्विजोत्तमः ।
भवन्मध्यं तु राजन्यो वैश्यस्तु भवदुत्तरम् ॥ ४६ ॥
मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनीं निजाम् ।
भिक्षेत भिक्षां प्रथमं याचैनं नावमानयेत् ॥ ५० ॥
ब्रह्मचारी दण्ड लेकर, सूर्य का आराधन और अग्नि की प्रद्-
क्षिणा करके विधिपूर्वक भिक्षा मांगे । ब्राह्मण ब्रह्मचारी भिक्षा
मांगते समय, ‘भवति भिक्षां देहि’ क्षत्रिय ‘भिक्षां भवति देहि,’
वैश्य ‘भिक्षां देहि भवति’ ऐसा बोले । ब्रह्मचारी को, पहले माता
से, माता की बहन से, बहन से और जो ब्रह्मचारी का अपमान
न करती हो उस से भिक्षा मांगना चाहिए ॥ ४८-५० ॥
समाहृत्य तु तद्भैक्ष्यं यावदर्थममायया ।
निवेद्य गुरवेऽश्नीयादाचम्य प्राङ्मुखः शुचिः ॥ ५१ ॥
आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः ।
श्रियं प्रत्यङ्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते ह्युदङ्मुखः॥५२॥
उपस्पृश्य द्विजो नित्यमन्नमद्यात्समाहितः ।
भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः खानि च संस्पृशेत्॥५३॥
पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन् ।
दृष्ट्वा हृष्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः ॥ ५४ ॥
पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्जं प्रयच्छति ।
अपूजितं तु तद्भुक्तमुभयं नाशयेदिदम् ॥ ५५ ॥
अपने प्रयोजन भर को निष्कपटभाव से भिक्षा लाकर, गुरु को
निवेदन करे और पवित्रता से पूर्वदिशा को मुख करके आचमन-
पूर्वक भोजन करे । आयु के लिए पूर्वमुख, यश के लिए दक्षिण
मुख, संपत्ति के लिए पश्चिम मुख, सत्य के लिए उत्तरमुख होकर
भोजन करे। द्विजों को नित्य सावधानी से आचमनपूर्वक भोजन

दूसरा अध्याय । ३३

दूसरा अध्याय । ३३
करके फिर आचमन और जल के हाथ से आँख, कान, नाक का
स्पर्श करना चाहिए। अन्न को आदर से ग्रहण करे, उसकी निन्दा
न करे। उसको देखकर हर्षित, पुलकित होकर सर्वथा प्रशंसा
करे। यों आदर से किया हुआ भोजन शरीर और प्राणों को बल
देता है नहीं तो दोनों का नाश करता है ॥ ५१-५५ ॥
नोच्छिष्टं कस्यचिद्दद्यान्नाद्याच्चैव तथान्तरा ।
न चैवाध्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टः क्वचिद्व्रजेत् ॥ ५६ ॥
अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम् ।
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ ५७ ॥
उच्छिष्ट-जूंठा अन्न किसी को न दे, भोजन के बीच ठहर ठहर
कर भोजन न करे, अधिक भोजन न करे और जूंठे मुंह कहीं न
जाय । अतिभोजन से आरोग्य और आयु में बाधा होती है, यह
स्वर्ग और धर्म का विरोधी है। लोक में भी अच्छा नहीं माना
जाता, इसलिए अतिभोजन न करना चाहिए ॥ ५६-५७ ॥
ब्राह्मेण विप्रस्तीर्थेन नित्यकालमुपस्पृशेत् ।
कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदाचन ॥ ५८ ॥
अङ्गुष्ठमूलस्य तले ब्राह्मं तीर्थं प्रचक्षते ।
काय मङ्गुलिमूलेऽग्रे दैवं पित्र्यं तयोरधः ॥ ५६ ॥
त्रिराचामेदपः पूर्वं द्विः प्रमृज्यांत्ततो मुखम् ।
खानि चैव स्पृशेदद्भिरात्मानं शिर एव च ॥ ६० ॥
अनुष्णाभिरफेनाभिरद्भिस्तीर्थेन धर्मवित् ।
शौचेप्सुः सर्वदाचामेदेकान्ते प्रागुदङ्मुखः ॥ ६१ ॥
हृद्गाभिः पूयते विप्रः कण्ठगाभिस्तु भूमिपः ।
वैश्योऽद्भिः प्राशिताभिस्तु शूद्रः स्पृष्टाभिरन्ततः ॥ ६२ ॥
ब्राह्मण सदा ब्राह्मतीर्थ से आचमन करे, या प्रजापतितीर्थ

३४ मनुस्मृति ।
और देवतीर्थ से करे परन्तु पितृतीर्थ से कभी आचमन न करे।
अँगूठे के मूल को ब्राह्मतीर्थ कहते हैं । अँगुलीयों के मूलभाग को
प्रजापतितीर्थ अग्रभाग को देवतीर्थ और अँगूठा-तर्जनी के मध्य
भाग को पितृतीर्थ कहते हैं। आचमन के समय तीन वार आचमन
करके दो वार मुख धोवे और आँख, कान, नाक, मुख आदि इन्द्रिय,
हृदय और शिर का जल से स्पर्श करे। धर्मज्ञ पुरुष, पवित्र होने
की इच्छा से, नित्य, एकान्त में पूर्व या उत्तरमुख बैठकर, शीतल
और फेन (झाग) रहित जल से, ब्राह्म आदि तीर्थों से आचमन
करे। यह आचमन जल हृदय तक पहुँच जाने से ब्राह्मण, कण्ठतक
क्षत्रिय, मुख गीला होने से वैश्य और ओठ स्पर्श से शूद्र पवित्र
होता है—अर्थात् इसी हिसाब से जल लेकर अपना अपना आच-
मन करना चाहिए ॥ ५८-६२ ॥
उद्धृते दक्षिणे पाणावुपवीतीत्युच्यते द्विजः ।
सव्ये प्राचीनावीती निवीती कण्ठसज्जने ॥ ६३ ॥
मेखलामजिनं दण्डमुपवीतं कमण्डलुम् ।
अप्सु प्रास्य विनष्टानि गृह्णीतान्यानि मन्त्रवत् ॥ ६४ ॥
बायें कांध पर जनेऊ रखकर, दाहने हाथ को बाहर निकालने
से द्विज 'उपवीती' कहा जाता है। दाहने कांध पर से बायें
तरफ़ लटकाने से 'प्राचीन आवीती' और गले में मालासी पहनने
से 'निवीती' कहा जाता है। यदि मेखला, मृगचर्म, दण्ड,
जनेऊ और कमण्डलु पुराने होजायँ या टूट जायँ तो इनको जल में
फेंककर और अपने गृह्यसूत्र के मन्त्रों को पढ़कर, दूसरा धारण
करना चाहिए ॥ ६३-६४ ॥
केशान्तः षोडशे वर्षे ब्राह्मणस्य विधीयते ।
राजन्यबन्धोर्द्वाविंशे वैश्यस्य द्वयधिके ततः ॥ ६५ ॥
अमन्त्रिका तु कार्येयं स्त्रीणामावृदशेषतः ।
संस्कारार्थं शरीरस्य यथाकालं यथाक्रमम् ॥ ६६ ॥

दूसरा अध्याय। ३५

दूसरा अध्याय। ३५
वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ।
पतिसेवा गुरौवासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥ ६७ ॥
एष प्रोक्तो द्विजातीनामौपनायनिको विधिः ।
उत्पत्तिव्यञ्जकः पुण्यः कर्मयोगं निबोधत ॥ ६८ ॥
उपनीय गुरुः शिष्यं शिक्षयेच्छौचमादितः ।
आचारमग्निकार्यं च सन्ध्योपासनमेव च ॥ ६९ ॥
ब्राह्मण का गर्भ से सोलहवें वर्ष, क्षत्रिय का बीसवें वर्ष, और
वैश्य का चौबीसवें वर्ष केशान्त-संस्कार कियाजाता है । स्त्रियों
की शरीर-शुद्धि के लिए, सब संस्कार (उपनयन छोड़कर) स-
मय पर क्रम से होते हैं, पर वेदमन्त्रों को न पढ़ना चाहिए ।
विवाह-संस्कार ही स्त्रियों का उपनयन संस्कार है, पतिसेवा ही
गुरुकुल वास है, घर का काम-काज ही हवनकर्म है । यह द्विजों
के द्विजत्व को करनेवाले उपनयन-संस्कार को कहा है, अब उन
के कर्तव्य कर्मों को सुनो ॥ ६५-६९ ॥
अध्येष्यमाणस्त्वाचान्तो यथाशास्त्रमुदङ्मुखः ।
ब्रह्माञ्जलिकृतोऽध्याप्यो लघुवासा जितेन्द्रियः ॥ ७० ॥
ब्रह्मारम्भेऽवसाने च पादौ ग्राह्यौ गुरोः सदा ।
संहत्य हस्तावध्येयं स हि ब्रह्माञ्जलिः स्मृतः ॥ ७१ ॥
शिष्य के यज्ञोपवीत संस्कारके बाद, गुरु पहले शुद्धि, आचार,
प्रातःकाल और सायंकाल हवन और सन्ध्या सिखावे । पढ़नेवाले
शिष्य को, छोटा वस्त्र धारण और शास्त्रविधि से उत्तरमुख
आचमन करके, जितेन्द्रिय होकर, ब्रह्माञ्जलिपूर्वक पढ़ना
चाहिए ॥ ७०-७१ ॥
व्यत्यस्तपाणिना कार्यमुपसंग्रहणं गुरोः ।

३६ · मनुस्मृति ।
सव्येन सव्यः स्प्रष्टव्यो दक्षिणेन च दक्षिणः ॥ ७२ ॥
अध्येष्यमाणं तु गुरुर्नित्यकालमतन्द्रितः ।
अधीष्व भो इति ब्रूयाद्विरामोऽस्त्विति चारमेत् ॥ ७३ ॥
ब्रह्मणः प्रणवं कुर्यादादावन्ते च सर्वदा ।
स्रवत्यनोङ्कृतं पूर्वं पुरस्ताच्च विशीर्यति ॥ ७४ ॥
प्राक्कूलान्पर्युपासीनः पवित्रैश्चैव पावितः ।
प्राणायामैस्त्रिभिः पूतस्तत ओंकारमर्हति ॥ ७५ ॥
वेदाध्ययन के आरम्भ और अन्त में सदा गुरु के चरण छुवे
और हाथ जोड़कर पढ़े, इसीको 'ब्रह्माञ्जलि' कहते हैं । अलग
अलग हाथसे गुरु के पैर छुवे, दहने से दहना और बायेंसे बायाँ ।
गुरु निरालस होकर शिष्य को पहले 'हे शिष्य पढ़ो' कहकर वेद
पढ़ावे और अन्तमें 'विरामोऽस्तु' (पाठ रुक जाय) कहकर विश्राम
करे । वेदाध्ययन के आदि और अन्त में 'ॐ' का उच्चारण सदा
करे । यदि आदि में 'ॐ' न कहे तो विद्या में प्रेम नहीं होता और
अन्त में न कहे तो पढ़ी विद्या भूल जाती है । पूर्वदिशा को कुशा-
सन का अग्रभाग करके, उस पर वेदाध्यायी बैठकर, तीन प्राणा-
याम करके, पवित्रता से, स्वाध्याय करने के पूर्व ॐकार का उच्चा-
रण करे ॥ ७२-७५ ॥
अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः ।
वेदत्रयान्निरदुहद्भूर्भुवः स्वरितीति च ॥ ७६ ॥
त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादंपादम्दूदुहत् ।
तदित्यृचोऽस्याः सावित्र्याः परमेष्ठी प्रजापतिः॥ ७७॥
प्रजापति ने, अकार, उकार, मकार और भूः, भुवः, स्वः, इन
तीन व्याहृतियों को ऋक्, यजु, और साम वेद से दुहकर सार

दूसरा अध्याय । ३७

दूसरा अध्याय । ३७
निकाला है* और तीनों वेदों से, गायत्रीऋचा के एक एक पाद
को दुहा है ॥ ७६ ७७ ॥
एतदक्षरमेतां च जपन्व्याहृतिपूर्विकाम् ।
सन्ध्ययोर्वेदविद्विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ॥ ७८ ॥
सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत्त्रिकं द्विजः ।
महतोऽप्येनसो मासात्त्वचेवाहिविमुच्यते ॥ ७९ ॥
एतयर्चाविसंयुक्तः काले च क्रियया स्वया ।
ब्रह्मक्षत्रियविड्योनिर्गर्हणां याति साधुषु ॥ ८० ॥
वेदज्ञ ब्राह्मण, प्रातः और सायंकाल समय, ॐकार, और भूः,
भुवः, स्वः, इन व्याहृतियों को पूर्व लगाकर गायत्री जपने से,
वेद पढ़ने का फल पाता है । जो द्विज, ग्राम वा नगर के बाहर
एकान्त में, ॐकार, तीन व्याहृति और गायत्री इन तीनों का एक
हजार जप करता है, वह केंचुल से सांप की भांति, महापापों से
छूट जाता है । यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य गायत्री न जपता हो
और समय पर अपनी अग्निहोत्रादि क्रिया न करता हो तो वह
सत्पुरुषों में निन्दा पाता है ॥ ७८-८० ॥
ओंकारपूर्विकास्तिस्रो महाव्याहृतयोऽव्ययाः ।
त्रिपदा चैव सावित्री विज्ञेयं ब्रह्मणो मुखम् ॥ ८१ ॥
योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्त्रीणि वर्षाण्यतन्द्रितः ।
स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान् ॥ ८२ ॥

  • शतपथ ब्राह्मण ( ११ । ५ । = ) में लिखा है। प्रजापति ने सृष्टि की
    इच्छा की तो पहले पृथिवी, अन्तरिक्ष और आकाश उत्पन्न हुआ । उसके बाद,
    तीनों लोकों से, क्रम से, अग्नि, वायु और सूर्य ये प्रकाशमान तीन पदार्थ प्रकट
    हुए। फिर इन तीनों से क्रम से ऋक्, साम और यजुर्वेद को उत्पन्न किया।
    अनन्तर, तीनों वेदों का बीजस्वरूप, भूः, भुवः, स्वः, का प्रादुर्भाव हुआ। प्रथमा-
    ध्याय के ( २३ ) श्लोक की टिप्पणी में, वेदोत्पत्ति विषय देखो।

३८ मनुस्मृति ।
एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परंतपः ।
सावित्र्यास्तु परं नास्ति मौनात्सत्यं विशिष्यते ॥ ८३ ॥
क्षरन्ति सर्वा वैदिक्यो जुहोति यजति क्रियाः ।
अक्षरं त्वक्षरं ज्ञेयं ब्रह्म चैव प्रजापतिः ॥ ८४ ॥
ॐकार, तीनों व्याहृति और तीन चरण की गायत्री इनको वेद
का मुख जानना चाहिए । जो पुरुष, निरालस तीन वर्ष तक
गायत्री जप करता है, वह अन्त में वायु तुल्य व्यापक होकर,
परब्रह्म को पहुँचता है। 'ॐ' यह परब्रह्म का वाचक है, प्राणायाम
बड़ा तप है, गायत्री से बढ़कर कोई मन्त्र नहीं है और मौन रहने
से सत्य बोलना उत्तम होता है। वेदोक्त होम, यज्ञ, क्रिया सब
नाशवान् हैं-या उनका स्वर्गादि फलभी नाशवान् है। केवल ॐकार
परब्रह्म-प्रजापतिका रूपही अविनाशी जानना चाहिए ॥८१-८४॥
विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः ।
उपांशु स्याच्छतगुणः साहस्त्रो मानसः स्मृतः ॥ ८५ ॥
ये पाकयज्ञाश्चत्वारो विधियज्ञसमन्विताः ।
सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ८६ ॥
जप्येनैव तु संसिद्ध्येद्ब्राह्मणो नात्र संशयः ।
कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥ ८७ ॥
इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहारिषु ।
संयमे यत्नमातिष्ठेद्विद्वान् यन्तेव वाजिनाम् ॥ ८८ ॥
विधियज्ञ-दर्शपौर्णमास से जपयज्ञ दशगुना श्रेष्ठ है । जिसमें
पास में बैठा भी न सुने ऐसा उपांशुजप सौगुना श्रेष्ठ है और जिस
में ओठ भी न हिलै, ऐसा मानसिक जप हज़ारगुना अच्छा कहा
है। विधियज्ञ और चारों पाकयज्ञ-वैश्वदेव, बलिकर्म, नित्यश्राद्ध
और अतिथिपूजन, जपयज्ञ के सोलहवें भाग के समान भी नहीं

दूसरा अध्याय । ३६

[Header]
दूसरा अध्याय । ३६

होसकते। ब्राह्मण, गायत्रीजप से ही मुक्ति पाताहै, और यज्ञ आदि
करे चाहे न करे। वह गायत्रीद्वारा मैत्र (सूर्य) की उपासना क-
रने से 'मैत्र' कहा जाता है। विवेकी पुरुष को, मन को खींचने
वाले विषयों से, इन्द्रियों को वश में रखना चाहिए, जैसे सारथि
घोड़ों को रखता है ॥ ८५-८८ ॥
एकादशेन्द्रियाण्याहुर्यानि पूर्वे मनीषिणः।
तानि सम्यक् प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ ८६ ॥
श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी।
पायूपस्थं हस्तपादं वाक् चैव दशमी स्मृता ॥ ६० ॥
बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैषां श्रोत्रादीन्यनुपूर्वशः।
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैषां पाय्वादीनि प्रचक्षते ॥ ६१ ॥
पूर्वाचार्यों ने ग्यारह इन्द्रियां कही हैं, उनके नाम ये हैं-कान,
आंख, नाक, जीभ, खाल, गुदा, मूत्रेन्द्रिय, हाथ, पैर और वाणी इन
दश इन्द्रियों में पहली पांच "ज्ञानेन्द्रिय" और पिछली "कर्मेन्द्रिय"
कहलाती हैं ॥ ८६-६१ ॥
एकादशं मनो ज्ञेयं स्वगुणेनोभयात्मकम् ।
यस्मिञ्जिते जितावेतौ भवतः पञ्चकौ गणौ ॥ ६२ ॥
इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयम्।
सन्नियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं नियच्छति ॥ ६३ ॥
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्द्धते ॥ ६४ ॥
यश्चैतान्प्राप्नुयात् सर्वान् यश्चैनान् केवलान् त्यजेत्।
प्रापणात्सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ॥ ६५ ॥
ग्यारहवाँ मन है, वह अपने संकल्प-विकल्परूप गुण से दशों इ-
न्द्रियों को विषयों में प्रवृत्त करता है। इसी मन को रोकने से इतर

४० मनुस्मृति।
इन्द्रियां वश में होजाती हैं। इन्द्रियों के विषयों में फँसने से, अवश्य
दोष होता है, पर उनको वश में रखने से मोक्ष होजाता है। विषय
भोग की इच्छा उसके भोगने से कभी शान्त नहीं होती जैसे घृत से
अग्नि कभी शान्त नहीं होता, बढ़ता ही है। जो पुरुष सब काम-
नाओं को भोगता है और जो उन सब को छोड़ता है, इन दोनों में
उनका छोड़ना ही अच्छा है ॥ ९२-९५ ॥
न तथैतानि शक्यन्ते संनियन्तुमसेवया ।
विषयेषु प्रजुष्टानि यथा ज्ञानेन नित्यशः ॥ ९६ ॥
वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च।
न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित् ॥ ९७ ॥
श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा च यो नरः ।
न हृष्यति ग्लायति वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः ॥ ९८ ॥
विषयों में फँसी इन्द्रियों को, जैसा ज्ञान से वश में किया जास-
कता है, वैसा विषयों के त्याग से नहीं किया जा सकता है। जिस
का मन विषयों में लगा होता है, उसको वेदाध्ययन, दान, यज्ञ, नि-
यम और तप कभी फल नहीं देते। जिसको कोई चीज़ सुनकर, या
छूकर, या देखकर, या खाकर, या सूंघकर हर्ष वा शोक नहीं होता,
उसको जितेन्द्रिय जानना चाहिए ॥ ९६-९८ ॥
इन्द्रियाणां तु सर्वेषां यद्येकं क्षरतीन्द्रियम् ।
तेनास्य क्षरति प्रज्ञा दृतेः पात्रादिवोदकम् ॥ ९९ ॥
वशे कृत्वेन्द्रियग्रामं संनियम्य मनस्तथा ।
सर्वान् संसाधयेदर्थानक्षिएवन् योगतस्तनुम् ॥ १०० ॥
पानी की मशक में छेद होजाने से उसका पानी बाहर निकल
जाता है; ऐसेही यदि इन्द्रियों में से एक भी इन्द्रिय निकल कर वि-
षय में लग जावे तो मनुष्य की बुद्धि में विकार होजाता है । इस
लिए इन्द्रियों को और मन को वश में करके, शरीर को क्लेश न

दूसरा अध्याय। ४१

दूसरा अध्याय। ४१
देकर, अच्छी रीति से, अपने कार्यों का साधन करना
चाहिए ॥ ६६-१०० ॥
पूर्वा सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत्सावित्रीमार्कदर्शनात् ।
पश्चिमां तु समासीनः सम्यगृक्षविभावनात् ॥ १०१ ॥
पूर्वा सन्ध्यां जपंस्तिष्ठन्नैशमेनो व्यपोहति ।
पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ॥ १०२ ॥
न तिष्ठति तु यः पूर्वा नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् ।
स शूद्रवद्बहिष्कार्यः सर्वस्माद्द्विजकर्मणः ॥ १०३ ॥
अपां समीपे नियतो नैत्यकं विधिमास्थितः ।
सावित्रीमप्यधीयीत गत्वारण्यं समाहितः ॥ १०४ ॥
वेदोपकरणे चैव स्वाध्याये चैव नैत्यके ।
नानुरोधोऽस्त्यनध्याये होममन्त्रेषु चैव हि ॥ १०५ ॥
प्रातःकाल सन्ध्या और गायत्रीजप का समय सूर्यदर्शन तक
रहता है और सायंकाल में नक्षत्रदर्शन तक रहता है। प्रातःसन्ध्या
से रात में किया हुआ साधारण दोष और सायंसन्ध्या से दिन में
किया हुआ साधारण दोष दूर होजाता है। जो प्रातःसन्ध्या और
सायंसन्ध्या नहीं करता उसको शूद्र की भांति सब द्विजाति के
कामों से अलग करदेना चाहिए। जलके पास या वन में, एकाग्र
होकर, नित्य कर्म, गायत्रीजप और स्वाध्याय को करे। वेद के छ
अङ्गों को पढ़ने में, नित्य स्वाध्याय में, ब्रह्मयज्ञ और होममन्त्र पढ़ने
में, अनध्याय नहीं माना जाता है ॥ १०१-१०५ ॥
नैत्यके नास्त्यनध्यायो ब्रह्मसत्रं हि तत्स्मृतम् ।
ब्रह्माहुतिहुतं पुण्यमनध्यायवषट्कृतम् ॥ १०६ ॥
यः स्वाध्यायमधीतेऽब्दं विधिना नियतः शुचिः ।
तस्य नित्यं क्षरत्येष पयो दधि घृतं मधु ॥ १०७ ॥

४२ मनुस्मृति।
अग्नीन्धनं भैक्षचर्यामधःशय्यां गुरोर्हितम् ।
आसमावर्तनात्कुर्यात्कृतोपनयनो द्विजः ॥ १०८ ॥
आचार्यपुत्रः शुश्रूषुर्ज्ञानदो धार्मिकः शुचिः ।
आप्तःशक्तोऽर्थदःसाधुः स्वोऽध्याप्योदशधर्मतः॥१०६॥
नापृष्टः कस्यचिद्ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः ।
जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत् ॥ ११० ॥
अधर्मेण च यः प्राह यश्चाधर्मेण पृच्छति ।
तयोरन्यतरः प्रैति विद्वेषं वाऽधिगच्छति ॥ १११ ॥
नित्य कर्म में अनध्याय नहीं माला जाता, क्योंकि वह ब्रह्मयज्ञ
कहा जाता है। उसमें ब्रह्माहुति का होम, पुण्यफल है और अन-
ध्याय में वषट्कार-वेदाध्ययन के समाप्ति का शब्द किया जाता है।
जो ब्रह्मचारी, एक साल तक नियम से पवित्र होकर स्वाध्याय क-
रता है उसको स्वाध्याय, दूध, दही, घी और मधु बरसाता है।
ब्रह्मचारी, उपनयन के बाद समावर्तन-अर्थात् वेद पढ़कर घर लौटने
तक, गुरुकुल में, होम के लिए लकड़ी बटोरे, भिक्षा लावे, भूमि
पर सोवे और गुरुसेवा किया करे । आचार्यपुत्र, सेवक, ज्ञान-
दाता, धर्मपरायण, पवित्र, प्रामाणिक, पढ़ने योग्य, धनदाता, सदा-
चारी और अपनी जाति-सम्बन्धी इन दशोंको धर्मार्थ पढ़ाना चा-
हिए। बिना पूछे किसीसे न बोले और जो अन्याय से पूछे उससे
भी न बोले, ऐसे मौके पर चतुरको जानकर भी अनजान सा रहना
चाहिए। क्योंकि, जो अधर्म से पूछताहै या जो उत्तर देता है, उन
में एक मरजाता है या आपस में विरोध होताहै ॥ १०६-१११ ॥
धर्मार्थौ यत्र न स्यातां शुश्रूषा वापि तद्विधा ।
तत्र विद्या न वक्तव्या शुभं बीजमिवोषरे ॥ ११२ ॥
विद्ययैव समं कामं मर्त्तव्यं ब्रह्मवादिना ।
आपद्यपि हि घोरायां न त्वेनमिरिणे वपेत् ॥ ११३ ॥

दूसरा अध्याय । ४३

दूसरा अध्याय । ४३

जिसको पढ़ानेसे धर्म, धन या सेवा कुछ भी न मिले, उसे विद्या
न पढ़ावे। अच्छा बीज ऊषर में बोना व्यर्थही है। वेदज्ञाता, विद्या
के साथही मरजाय वह अच्छा, पर घोर दुःख के समय भी कुपात्र
में विद्याबीज कभी न बोवे ॥ ११२-११३ ॥
विद्या ब्राह्मणमेत्याह शेवधिस्तेऽस्मि रक्ष माम् ।
असूयकाय मां मा दास्तथा स्यां वीर्यवत्तमा ॥ ११४ ॥
यमेव तु शुचिं विद्यान्नियतब्रह्मचारिणम् ।
तस्मै मां ब्रूहि विप्राय निधिपायाप्रमादिने ॥ ११५ ॥
ब्रह्म यस्त्वननुज्ञातमधीयानादवाप्नुयात् ।
स ब्रह्मस्तेयसंयुक्तो नरकं प्रतिपद्यते ॥ ११६ ॥
विद्या ने ब्राह्मण के पास आकर कहा * मैं तेरी निधि हूं, मेरी
रक्षा कर, मत्सरी पुरुष को मेरे को न दे, ऐसा करने से मैं तुम में
अधिक बलवान् होकर रहूंगी। जो पवित्र, जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी हो
और निधि ( खज़ाना ) के समान मेरी रक्षा करनेवाला हो, उसको
मेरा उपदेश करना। जो कोई पढ़ता हो उससे गुरु के आज्ञा
बिना यदि दूसरा पढ़लेवे, तो वह विद्याचोर, नरकगामी
होता है ॥ ११४-११६ ॥
लौकिकं वैदिकं वापि तथाऽध्यात्मिकमेव च ।
आददीत यतो ज्ञानं तं पूर्वमभिवादयेत् ॥ ११७॥
सावित्रीमात्रसारोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः ।
नायन्त्रितस्त्रिवेदोऽपि सर्वाशी सर्वविक्रयी ॥ ११८ ॥
शय्यासनेऽध्याचरिते श्रेयसा न समाविशेत् ।
शय्यासनस्थश्चैवेनं प्रत्युत्थायाभिवादयेत् ॥ ११९ ॥

  • इसी अर्थ की श्रुति है—
    ' विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिष्टेहमस्मि ।
    असूयकायावृजवेऽप्रमत्ताय न मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम् ॥'

४४ मनुस्मृति।
ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आयति ।
प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान्प्रतिपद्यते ॥ १२०॥
जिससे लौकिक विषय, या वैदिक क्रिया या ब्रह्मविद्या को सीखे
उसको पहले प्रणाम करना चाहिए। जो केवल गायत्री जानता हो,
जितेन्द्रिय हो वह ब्राह्मण मान्य होता है। और जो तीनों वेदोंका भी
ज्ञाता हो पर भक्ष्याभक्ष्य का विचार न रखता हो, सब निषिद्ध
चीज़ें बेंचता हो वह माननीय नहीं होता । जिस शय्या और आसन
पर, अपने से श्रेष्ठ-बड़ा बैठता हो उस पैर कभी न बैठे। स्वयं
आसान वा शय्या पर बैठा हो तब कोई पूज्य आवे तो उठकर
प्रणाम करना चाहिए । गुरु या किसी श्रेष्ठ के आने पर युवा
पुरुष के प्राण संभ्रम से ऊपर चढ़ते हैं, फिर उठकर प्रणाम आदि
करने पर वे प्राण स्वस्थ होते हैं । इसलिए अवश्य स्वागत
करना चाहिए ॥ ११७-१२० ॥
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।
चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥ १२१ ॥
अभिवादात्परं विप्रो ज्यायांसमभिवादयन् ।
असौ नामाहमस्मीति स्वं नाम परिकीर्तयेत् ॥ १२२ ॥
नामधेयस्य ये केचिदभिवादं न जानते ।
तान्प्राज्ञोऽहमिति ब्रूयात् स्त्रियः सर्वास्तथैव च ॥१२३॥
भोः शब्दं कीर्तयेदन्ते स्वस्य नाम्नोऽभिवादने ।
नाम्नां स्वरूपभावो हि भोभावऋषिभिः स्मृतः ॥१२४॥
आयुष्मान् भव सौम्येति वाच्यो विप्रोऽभिवादने ।
अकारश्चास्य नाम्नोऽन्ते वाच्यः पूर्वाक्षरः प्लुतः ॥ १२५ ॥
जो पुरुष बड़ों की सेवा और उनको प्रणाम करता है उसकी
आयु, विद्या, यश और बल ये चारों बढ़ते हैं। वृद्ध को प्रणाम
करता हुआ विप्र, 'मैं अमुक नाम हूं' ऐसा कहे। जो प्रणम्य ...

दूसरा अध्याय। ४५

दूसरा अध्याय। ४५
पुरुष आशीर्वाद देने का क़ायदा न जानते हों, उनको प्रणाम
समय में 'मैं हूं' इतना ही कहे और स्त्रियों को भी प्रणाम करते
हुए यही कहना चाहिए। अभिवादन-प्रणाम करने के समय,
अपने नाम के अन्त में 'भोः' कहे जैसा- 'देवदत्तशर्माहमस्मि
भोः'। प्रणम्य पुरुष के नाम के स्थान में 'भोः' यह सम्बोधन
ऋषियों ने कहा है। अर्थात् प्रणम्य का नाम न कहकर 'भोः'
कहना चाहिए। विप्र प्रणाम करे तो आशीर्वाद में 'आयुष्मान्
भव सौम्य' ऐसा कहे। और उसके नाम के अन्त में अकार को
अगर व्यञ्जनान्त नाम हो तो उसके पहले अक्षर का प्लुत-ऊंचा
उच्चारण करे *॥ १२१-१२५ ॥
यो न वेत्त्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम् ।
नाभिवाद्यः स विदुषा यथा शूद्रस्तथैव सः ॥ १२६ ॥
ब्राह्मणं कुशलं पृच्छेत्क्षत्रबन्धुमनामयम् ।
वैश्यं क्षेमं समागम्य शूद्रमारोग्यमेव च ॥ १२७ ॥
जो ब्राह्मण, प्रणाम-आशीर्वाद की रीति न जानता हो उसको
प्रणाम न करना चाहिए। क्योंकि वह शूद्र के समान है। आपस
में मिलने पर ब्राह्मण से 'कुशल' क्षत्रिय से 'अनामय' वैश्य
से 'क्षेम' और शूद्र से 'आरोग्य' पूछना चाहिए ॥ १२६-१२७ ॥
अवाच्यो दीक्षितो नाम्ना यवीयानपि यो भवेत् ।
भो भवत्पूर्वकं त्वेनमभिभाषेत धर्मवित् ॥ १२८ ॥
परपत्नी तु या स्त्री स्यादासंबंधा च योनितः ।
तां ब्रूयाद्भवतीत्येव सुभगे भगिनीति च ॥ १२६ ॥
मातुलांश्च पितृव्यांश्च श्वशुरानृत्विजो गुरून् ।
असावहमिति ब्रूयात् प्रत्युत्थाय यवीयसः ॥ १३० ॥

  • यह सब प्रणाम, आशीर्वाद की रीति संस्कृतभाषा में करने की लिखी गई है।
    प्रायः वेदपाठी-ब्रह्मचारी गुरुकुल में इन नियमों का पालन करतेगे ।

४६ मनुस्मृति ।
मातृष्वसा मातुलानी श्वश्रूरथ पितृष्वसा ।
संपूज्या गुरुपत्नीवत्समास्ता गुरुभार्यया ॥ १३१ ॥
भ्रातुर्भार्योपसंग्राह्या सवर्णाऽन्वहन्वपि ।
विप्रोष्य तूपसंग्राह्या ज्ञातिसम्बन्धियोषितः ॥ १३२ ॥
यज्ञादि में दीक्षित ब्राह्मण उमर में छोटा हो तो भी उसका नाम
न लेवे, उसको 'भोः' 'भवान्' कहकर पुकारना वा कुछ कहना
चाहिए। जो दूसरे की स्त्री हो, या जिससे सम्बन्ध न हो उससे
आप, सुभगे, वहन कहकर बोलना । मामा, पिता का भाई, श्वशुर,
ऋत्विज और गुरु ये यदि उमर में छोटे हों, तो भी, मिलने पर
उठकर अपना नाम ज़ाहिर करना चाहिए। मौसी, मामी, सास
और बुआ, ये सब गुरु-स्त्री के समान पूज्य हैं। ज्येष्ठ भाई की
सवर्णा स्त्री से रोज प्रणाम आदि करना चाहिए। और जाति,
सम्बन्धी स्त्रियों को पितृकुल या मातृकुल में, विदेश से आने पर
प्रणाम करना चाहिए ॥ १२८-१३२ ॥
पितुर्भगिन्यां मातुश्च ज्यायस्यां च स्वसर्यपि ।
मातृवद्वृत्तिमातिष्ठेन्माता ताभ्यो गरीयसी ॥ १३३ ॥
दशाब्दाख्यं पौरसख्यं पञ्चाब्दाख्यं कलाभृताम् ।
त्र्यब्दपूर्वं श्रोत्रियाणां स्वल्पेनापि स्वयोनिषु ॥ १३४ ॥
पिता की वहन, माता की वहन और बड़ी वहन माता के समान
आदर योग्य हैं, पर माता इन सब से श्रेष्ठ है। एक नगर का
निवासी उमर में दश वर्ष का, नाच, गान जाननेवाला उमर में
पाँच वर्ष का, वेदज्ञ तीन वर्ष का और सम्बन्धी थोड़े ही दिनका,
ये सब समान अवस्था के माने जाते हैं ॥ १३३-१३४ ॥
ब्राह्मणं दशवर्षं तु शतवर्षं तु भूमिपम् ।
पितापुत्रौ विजानीयाद्ब्राह्मणस्तु तयोः पिता ॥१३५॥

दूसरा अध्याय । ४७

दूसरा अध्याय । ४७
वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या भवति पञ्चमी ।
एतानि मान्यस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम् ॥ १३६ ॥
पञ्चानां त्रिषु वर्णेषु भूयांसि गुणवन्ति च ।
यत्र स्युः सोऽत्र मानार्हः शूद्रोऽपि दशमींगतः ॥१३७॥
दश वर्ष के ब्राह्मण को, सौ वर्ष का भी क्षत्रिय पिता माने और
अपने को पुत्र माने। धन, कुटुम्ब, आयु, कर्म और विद्या ये पाँच
मानके स्थान हैं। इनमें, पहले से दूसरा क्रम से अधिक मान्य होता
है। तीनों वर्णों में जो इन पाँच बातों में बढ़ा हो वही जगत् में
माननीय है और दशवीं अवस्था में ( ६० वर्ष में ) शूद्र भी मान
योग्य होता है ॥ १३५-१३७ ॥
चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः ।
स्नातकस्य च राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च ॥ १३८॥
तेषां तु समवेतानां मान्यौ स्नातकपार्थिवौ ।
राजस्नातकयोश्चैव स्नातको नृपमानभाक् ॥ १३६॥
उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद्द्विजः ।
सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्य प्रचक्षते ॥ १४० ॥
एकदेशं तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुनः ।
योऽध्यापयति वृत्त्यर्थमुपाध्यायः स उच्यते ॥ १४१ ॥
गाड़ी में बैठा, नब्बे वर्ष से अधिक उमर का वृद्ध, रोगी, शिर
पर बोझा लिए, स्त्री, वेदपाठी, ब्रह्मचारी, राजा और विवाह में
वर, इनको देखकर मार्ग छोड़ देना चाहिए। ये सब जहां इकट्ठे
हों वहां स्नातक ब्राह्मण, जिसका वेदपाठ होगया है, और राजा
अधिक मान्य होता है। इन दोनों में भी राजा स्नातक का मान
करे। जो अपने शिष्य का उपनयन करके उसे साङ्गवेद पढ़ाता
है वह 'आचार्य' कहलाता है। जो ब्राह्मण वेद या उसके अङ्गों को
जीविका के लिए पढ़ाता है, वह 'उपाध्याय' कहलाता है॥१३८-१४१॥

४८ : मनुस्मृति ।
निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि ।
संभावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते ॥ १४२ ॥
अग्न्याधेयं पाकयज्ञानग्निष्टोमादिकान् मखान् ।
यः करोति वृतो यस्य स तस्यर्त्विगिहोच्यते ॥ १४३ ॥
य आवृणोत्यवितथं ब्रह्मणा श्रवणावुभौ ।
स माता स पिता ज्ञेयस्तं न द्रुह्येतकदाचन ॥ १४४ ॥
उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता ।
सहस्रं तु पितृन्माता गौरवेणातिरिच्यते ॥ १४५ ॥
जो गर्भाधान आदि संस्कार विधि से करता है और अन्न से
पोषण करता है, वह गुरु कहलाता है । जो ब्राह्मण किसीको
वरण लेकर, अग्न्याधेय कर्म, अष्टकादर्श, पौर्णमास आदि पाकयज्ञ
और अग्निष्टोम आदि यज्ञ करता है वह उसका 'ऋत्विज' कह-
लाता है । जो वेद का शुद्ध अध्यापन कराता है वह पिता, माता
के समान मान्य होता है, उसके साथ कभी द्रोह न करे । आचार्य
उपाध्याय से दशगुना, पिता आचार्य से सौगुना और माता
पिता से हज़ारगुना अधिक पूज्य है ॥ १४२-१४५ ॥
उत्पादकब्रह्मदात्रोर्गरीयान्ब्रह्मदः पिता ।
ब्रह्मजन्म हि विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥ १४६ ॥
कामान्माता पिता चैनं यदुत्पादयतो मिथः ।
संभूतिं तस्य तां विद्याद्यद्योनावभिजायते ॥ १४७ ॥
आचार्यस्त्वस्य यां जातिं विधिवद्वेदपारगः ।
उत्पाद॑यति सावित्र्या सा सत्या साऽजराऽमरा ॥ १४८ ॥
अल्पं वा बहु वा यस्य श्रुतस्योपकरोति यः ।
तमपीह गुरुं विद्याच्छ्रुतोपक्रियया तया ॥ १४६ ॥

दूसरा अध्याय । ४६

दूसरा अध्याय । ४६
पैदा करनेवाला पिता और वेदाध्यापक गुरु में, गुरु श्रेष्ठ है ।
क्योंकि वह ब्रह्मजन्म का दाता है, उसी से लोक, परलोक में स्थिर
सुख मिलता है। माता और पिता कामवश होकर जो बालक
पैदा करता है, वह जिस योनि से जाता है, उसी प्रकार उसके
हाथ, पैर अङ्ग होजाते हैं। परन्तु वेदविशारद आचार्य, गायत्री
उपदेश से जो बालक की जाति उत्पन्न करता है वह जाति सत्य,
अजर और अमर है । जो उपाध्याय वेद पढ़ाकर, जिसका थोड़ा
वा बहुत उपकार करता है, उसको भी गुरु के समान जानना
चाहिए ॥ १४६-१४६ ॥
ब्राह्मस्य जन्मनः कर्ता स्वधर्मस्य च शासिता ।
बालोऽपि विप्रो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः ॥ १५० ॥
अध्यापयामास पितॄन् शिशुराङ्गिरसः कविः ।
पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्य तान् ॥ १५१ ॥
ते तमर्थमपृच्छन्त देवानागतमन्यवः ।
देवाश्चैतान्समंत्योचुर्न्याय्यं वः शिशुरुक्तवान् ॥ १५२ ॥
ब्रह्म-वेद पढ़ाने योग्य जन्म देनेवाला और स्वधर्म की शिक्षा
देनेवाला ब्राह्मण यदि बालक हो तो भी वह धर्मानुसार बूढ़ों के
पिता समान है। अङ्गिरा मुनि के पुत्र ने थोड़ी उमर में अपने
चाचा, मामा आदि को वेद पढ़ाया और धर्मबुद्धि से उनको 'हे
लड़को' ऐसा पुकारा था । उस पर वे लोग क्रोध से देवताओं
से इसका अर्थ पूँछा, तब उन्हों ने कहा कि बालक ने उचित रीति
से तुमको पुकारा है ॥ १५०-१५२ ॥
अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः ।
अज्ञं हि बालमित्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ॥ १५३ ॥
न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥ १५४ ॥

५० मनुस्मृति ।
विप्राणां ज्ञानतो ज्यैष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः ।
वैश्यानां धान्यधनतः शूद्राणामेव जन्मतः ॥१५५॥
न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः ।
यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ॥ १५६ ॥
अज्ञानी ही बालक है और मन्त्रदाता ही पिता है। इसलिए
अज्ञमूर्ख को बालक और मन्त्रदाता को पिता कहते हैं। न बहुत
उमर से, न सफेद बालों से, न धन से, न सम्बन्ध-रिश्तेदारी में
बड़ाई होने से ब्राह्मण की बड़ाई है, किन्तु जो वेद-विशारद है
वही श्रेष्ठ है, यह ऋषियों ने नियम किया है। ब्राह्मणों का ज्ञान से,
क्षत्रियों का पराक्रम से, वैश्यों का धन-धान्य से और शूद्रों का
जन्म-उमर से बड़ाई होती है। शिर के बाल पक जाने से कोई
वृद्ध नहीं होता, किन्तु जो युवा पुरुष भी वेद-विशारद है उसको
भी देवताओं ने वृद्ध कहा है ॥ १५३-१५६ ॥
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः ।
यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति ॥ १५७॥
यथा षण्ढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौर्गवि चाफला ।
यथा चाज्ञेऽफलं दानं तथा विप्रोऽनृचोऽफलः ॥ १५८॥
अहिंसयैव भूतानां कार्यं श्रेयोऽनुशासनम् ।
वाक् चैव मधुराश्लक्ष्णा प्रयोज्या धर्ममिच्छता ॥ १५९॥
यस्य वाङ्मनसी शुद्धे सम्यग्गुप्ते च सर्वदा ।
स वै सर्वमवाप्नोति वेदान्तोपगतं फलम् ॥ १६० ॥
जैसा काठ का हाथी और चमड़ा का मृग, वैसा विना पढ़ा
ब्राह्मण है। ये तीनों नाममात्र को रखते हैं पर किसी काम के
नहीं हैं। जैसा स्त्रियों में नपुंसक पुरुष निष्फल, गौ के लिए दूसरी
गौ निष्फल, अज्ञानी को दान निष्फल है, वैसा विना वेद पढ़ा

दूसरा अध्याय । ५१

दूसरा अध्याय । ५१
ब्राह्मण निष्फल है-क्योंकि श्रौत-स्मार्त कर्मों के अयोग्य होता है।
किसी के चित्त को दुखाकर धर्मशिक्षा न देनी चाहिए । मधुर
और कोमल वाणी बोलनी चाहिए । जिसका वाणी और मन
शुद्ध है, दोषों से रहित है, उसको वैदिक कर्मों का पूरा फल
मिलता है ॥ १५७-१६० ॥
नारन्तुदः स्यादातोंऽपि न परद्रोहकर्मधीः ।
ययास्योद्विजते वाचा नालोक्यां तामुदीरयेत् ॥ १६१ ॥
संमानाद्ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव ।
अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा ॥ १६२ ॥
सुखं ह्यवमतः शेते सुखं च प्रतिबुध्यते ।
सुखं चरति लोकेऽस्मिन्नवमन्ता विनश्यति ॥ १६३ ॥
बहुत दुखी होने पर भी किसी को मर्मभेदी वचन न कहे ।
जिसमें दूसरे का अनभल हो ऐसी बात न विचार करे और
जिससे लोग घबड़ावें, उस अहित करनेवाली बात को न कहे ।
सन्मान से विष के तरह नित्य डरा करे और अपमान का अमृत
के तरह सदा चाह रक्खे । इस लोक में अपमान से जो दुःख नहीं
मानता वह सुख से सोता है, सुख से जागता है। सुख से विचरता
है और उसका अपमान करनेवाला नष्ट होजाता है ॥ १६१-१६३ ॥
अनेन क्रमयोगेन संस्कृतात्मा द्विजः शनैः ।
गुरौ वसन् संचिनुयाद्ब्रह्माधिगमिकं तपः ॥ १६४ ॥
तपोविशेषैर्विविधैर्व्रतैश्च विधिचोदितैः ।
वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना ॥ १६५ ॥
वेदमेव सदाभ्यस्येत्तपस्तप्यन् द्विजोत्तमः ।
वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते ॥ १६६ ॥