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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 649 में से

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पृष्ठ 173

दूसरा अध्याय । ३३
करके फिर आचमन और जल के हाथ से आँख, कान, नाक का
स्पर्श करना चाहिए। अन्न को आदर से ग्रहण करे, उसकी निन्दा
न करे। उसको देखकर हर्षित, पुलकित होकर सर्वथा प्रशंसा
करे। यों आदर से किया हुआ भोजन शरीर और प्राणों को बल
देता है नहीं तो दोनों का नाश करता है ॥ ५१-५५ ॥
नोच्छिष्टं कस्यचिद्दद्यान्नाद्याच्चैव तथान्तरा ।
न चैवाध्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्टः क्वचिद्व्रजेत् ॥ ५६ ॥
अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम् ।
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ ५७ ॥
उच्छिष्ट-जूंठा अन्न किसी को न दे, भोजन के बीच ठहर ठहर
कर भोजन न करे, अधिक भोजन न करे और जूंठे मुंह कहीं न
जाय । अतिभोजन से आरोग्य और आयु में बाधा होती है, यह
स्वर्ग और धर्म का विरोधी है। लोक में भी अच्छा नहीं माना
जाता, इसलिए अतिभोजन न करना चाहिए ॥ ५६-५७ ॥
ब्राह्मेण विप्रस्तीर्थेन नित्यकालमुपस्पृशेत् ।
कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदाचन ॥ ५८ ॥
अङ्गुष्ठमूलस्य तले ब्राह्मं तीर्थं प्रचक्षते ।
काय मङ्गुलिमूलेऽग्रे दैवं पित्र्यं तयोरधः ॥ ५६ ॥
त्रिराचामेदपः पूर्वं द्विः प्रमृज्यांत्ततो मुखम् ।
खानि चैव स्पृशेदद्भिरात्मानं शिर एव च ॥ ६० ॥
अनुष्णाभिरफेनाभिरद्भिस्तीर्थेन धर्मवित् ।
शौचेप्सुः सर्वदाचामेदेकान्ते प्रागुदङ्मुखः ॥ ६१ ॥
हृद्गाभिः पूयते विप्रः कण्ठगाभिस्तु भूमिपः ।
वैश्योऽद्भिः प्राशिताभिस्तु शूद्रः स्पृष्टाभिरन्ततः ॥ ६२ ॥
ब्राह्मण सदा ब्राह्मतीर्थ से आचमन करे, या प्रजापतितीर्थ