मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 175, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय। ३५
वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ।
पतिसेवा गुरौवासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥ ६७ ॥
एष प्रोक्तो द्विजातीनामौपनायनिको विधिः ।
उत्पत्तिव्यञ्जकः पुण्यः कर्मयोगं निबोधत ॥ ६८ ॥
उपनीय गुरुः शिष्यं शिक्षयेच्छौचमादितः ।
आचारमग्निकार्यं च सन्ध्योपासनमेव च ॥ ६९ ॥
ब्राह्मण का गर्भ से सोलहवें वर्ष, क्षत्रिय का बीसवें वर्ष, और
वैश्य का चौबीसवें वर्ष केशान्त-संस्कार कियाजाता है । स्त्रियों
की शरीर-शुद्धि के लिए, सब संस्कार (उपनयन छोड़कर) स-
मय पर क्रम से होते हैं, पर वेदमन्त्रों को न पढ़ना चाहिए ।
विवाह-संस्कार ही स्त्रियों का उपनयन संस्कार है, पतिसेवा ही
गुरुकुल वास है, घर का काम-काज ही हवनकर्म है । यह द्विजों
के द्विजत्व को करनेवाले उपनयन-संस्कार को कहा है, अब उन
के कर्तव्य कर्मों को सुनो ॥ ६५-६९ ॥
अध्येष्यमाणस्त्वाचान्तो यथाशास्त्रमुदङ्मुखः ।
ब्रह्माञ्जलिकृतोऽध्याप्यो लघुवासा जितेन्द्रियः ॥ ७० ॥
ब्रह्मारम्भेऽवसाने च पादौ ग्राह्यौ गुरोः सदा ।
संहत्य हस्तावध्येयं स हि ब्रह्माञ्जलिः स्मृतः ॥ ७१ ॥
शिष्य के यज्ञोपवीत संस्कारके बाद, गुरु पहले शुद्धि, आचार,
प्रातःकाल और सायंकाल हवन और सन्ध्या सिखावे । पढ़नेवाले
शिष्य को, छोटा वस्त्र धारण और शास्त्रविधि से उत्तरमुख
आचमन करके, जितेन्द्रिय होकर, ब्रह्माञ्जलिपूर्वक पढ़ना
चाहिए ॥ ७०-७१ ॥
व्यत्यस्तपाणिना कार्यमुपसंग्रहणं गुरोः ।