मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय । ४३
जिसको पढ़ानेसे धर्म, धन या सेवा कुछ भी न मिले, उसे विद्या
न पढ़ावे। अच्छा बीज ऊषर में बोना व्यर्थही है। वेदज्ञाता, विद्या
के साथही मरजाय वह अच्छा, पर घोर दुःख के समय भी कुपात्र
में विद्याबीज कभी न बोवे ॥ ११२-११३ ॥
विद्या ब्राह्मणमेत्याह शेवधिस्तेऽस्मि रक्ष माम् ।
असूयकाय मां मा दास्तथा स्यां वीर्यवत्तमा ॥ ११४ ॥
यमेव तु शुचिं विद्यान्नियतब्रह्मचारिणम् ।
तस्मै मां ब्रूहि विप्राय निधिपायाप्रमादिने ॥ ११५ ॥
ब्रह्म यस्त्वननुज्ञातमधीयानादवाप्नुयात् ।
स ब्रह्मस्तेयसंयुक्तो नरकं प्रतिपद्यते ॥ ११६ ॥
विद्या ने ब्राह्मण के पास आकर कहा * मैं तेरी निधि हूं, मेरी
रक्षा कर, मत्सरी पुरुष को मेरे को न दे, ऐसा करने से मैं तुम में
अधिक बलवान् होकर रहूंगी। जो पवित्र, जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी हो
और निधि ( खज़ाना ) के समान मेरी रक्षा करनेवाला हो, उसको
मेरा उपदेश करना। जो कोई पढ़ता हो उससे गुरु के आज्ञा
बिना यदि दूसरा पढ़लेवे, तो वह विद्याचोर, नरकगामी
होता है ॥ ११४-११६ ॥
लौकिकं वैदिकं वापि तथाऽध्यात्मिकमेव च ।
आददीत यतो ज्ञानं तं पूर्वमभिवादयेत् ॥ ११७॥
सावित्रीमात्रसारोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः ।
नायन्त्रितस्त्रिवेदोऽपि सर्वाशी सर्वविक्रयी ॥ ११८ ॥
शय्यासनेऽध्याचरिते श्रेयसा न समाविशेत् ।
शय्यासनस्थश्चैवेनं प्रत्युत्थायाभिवादयेत् ॥ ११९ ॥
- इसी अर्थ की श्रुति है—
' विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिष्टेहमस्मि ।
असूयकायावृजवेऽप्रमत्ताय न मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम् ॥'