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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 649 में से

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पृष्ठ 188

४८ : मनुस्मृति ।
निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि ।
संभावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते ॥ १४२ ॥
अग्न्याधेयं पाकयज्ञानग्निष्टोमादिकान् मखान् ।
यः करोति वृतो यस्य स तस्यर्त्विगिहोच्यते ॥ १४३ ॥
य आवृणोत्यवितथं ब्रह्मणा श्रवणावुभौ ।
स माता स पिता ज्ञेयस्तं न द्रुह्येतकदाचन ॥ १४४ ॥
उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता ।
सहस्रं तु पितृन्माता गौरवेणातिरिच्यते ॥ १४५ ॥
जो गर्भाधान आदि संस्कार विधि से करता है और अन्न से
पोषण करता है, वह गुरु कहलाता है । जो ब्राह्मण किसीको
वरण लेकर, अग्न्याधेय कर्म, अष्टकादर्श, पौर्णमास आदि पाकयज्ञ
और अग्निष्टोम आदि यज्ञ करता है वह उसका 'ऋत्विज' कह-
लाता है । जो वेद का शुद्ध अध्यापन कराता है वह पिता, माता
के समान मान्य होता है, उसके साथ कभी द्रोह न करे । आचार्य
उपाध्याय से दशगुना, पिता आचार्य से सौगुना और माता
पिता से हज़ारगुना अधिक पूज्य है ॥ १४२-१४५ ॥
उत्पादकब्रह्मदात्रोर्गरीयान्ब्रह्मदः पिता ।
ब्रह्मजन्म हि विप्रस्य प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥ १४६ ॥
कामान्माता पिता चैनं यदुत्पादयतो मिथः ।
संभूतिं तस्य तां विद्याद्यद्योनावभिजायते ॥ १४७ ॥
आचार्यस्त्वस्य यां जातिं विधिवद्वेदपारगः ।
उत्पाद॑यति सावित्र्या सा सत्या साऽजराऽमरा ॥ १४८ ॥
अल्पं वा बहु वा यस्य श्रुतस्योपकरोति यः ।
तमपीह गुरुं विद्याच्छ्रुतोपक्रियया तया ॥ १४६ ॥