मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 179, कुल 649 में से
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दूसरा अध्याय । ३६
होसकते। ब्राह्मण, गायत्रीजप से ही मुक्ति पाताहै, और यज्ञ आदि
करे चाहे न करे। वह गायत्रीद्वारा मैत्र (सूर्य) की उपासना क-
रने से 'मैत्र' कहा जाता है। विवेकी पुरुष को, मन को खींचने
वाले विषयों से, इन्द्रियों को वश में रखना चाहिए, जैसे सारथि
घोड़ों को रखता है ॥ ८५-८८ ॥
एकादशेन्द्रियाण्याहुर्यानि पूर्वे मनीषिणः।
तानि सम्यक् प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ ८६ ॥
श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी।
पायूपस्थं हस्तपादं वाक् चैव दशमी स्मृता ॥ ६० ॥
बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैषां श्रोत्रादीन्यनुपूर्वशः।
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैषां पाय्वादीनि प्रचक्षते ॥ ६१ ॥
पूर्वाचार्यों ने ग्यारह इन्द्रियां कही हैं, उनके नाम ये हैं-कान,
आंख, नाक, जीभ, खाल, गुदा, मूत्रेन्द्रिय, हाथ, पैर और वाणी इन
दश इन्द्रियों में पहली पांच "ज्ञानेन्द्रिय" और पिछली "कर्मेन्द्रिय"
कहलाती हैं ॥ ८६-६१ ॥
एकादशं मनो ज्ञेयं स्वगुणेनोभयात्मकम् ।
यस्मिञ्जिते जितावेतौ भवतः पञ्चकौ गणौ ॥ ६२ ॥
इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयम्।
सन्नियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं नियच्छति ॥ ६३ ॥
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्द्धते ॥ ६४ ॥
यश्चैतान्प्राप्नुयात् सर्वान् यश्चैनान् केवलान् त्यजेत्।
प्रापणात्सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ॥ ६५ ॥
ग्यारहवाँ मन है, वह अपने संकल्प-विकल्परूप गुण से दशों इ-
न्द्रियों को विषयों में प्रवृत्त करता है। इसी मन को रोकने से इतर