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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

(८८) पञ्चतन्त्रम् ।

(८८) पञ्चतन्त्रम् ।
सायुधमात्मानमाकाशे दर्शयामि । कदाचित् मां वासुदेवं
मन्यमानास्ते साशंका राज्ञो योद्धृभिः हन्यन्ते । उक्तञ्च-
इस प्रकार बहुत विचार कर एकान्तमें रानीसे कहा-"देवि ! जानो
तो जो यह कंचुकी कहते हैं। उसपर कालने क्रोध किया है जो ऐसा करताहै"
देवीभी यह वचन सुनकर व्याकुलहो शीघ्र कन्याके अन्तःपुरमें जाय खंडित
अधर नखोंसे चिन्हित शरीरके अवयववाली अपनी कन्याको देखती हुई बोली-
"हे पापे ! कुलकलंककारिणी ! यह क्या चरित्र दूषण किया, कौन यह
कालका देखा हुआ तेरे समीप आताहै ? सो मेरे आगे सत्य कह" । इस प्रकार
क्रोधके वेगसे निष्ठुर कहती हुई अपनी मातासे राजपुत्री भय लज्जासे शिर झुकाये
बोली-"माता ! साक्षात् नारायण प्रतिदिन गरुडपर चढ रात्रिमें आतेहैं । यदि
मेरा वाक्य असत्य मानो तो अपनी नेत्रोंसे गूढतर अर्धरात्रमें रमाकान्त भगवान्को
देखो" । यह वचन सुन वह भी प्रहसितवदन होकर सब अंगसे पुलिकित शरीर
हो शीघ्र जाकर राजासे बोली-"देव ! भाग्यसेही बढतेहो । नित्यही अर्धरात्रिमें
भगवान् नारायण कन्याके निकट आतेहैं । और उन्होंने गान्धर्वविवाहसे उससे
विवाह किया । सो आज हम और तुम रात्रिमें झरोखोंमें बैठकर अर्धरात्रमें देखें
कारण कि, मनुष्योंके साथ वह वार्ता नहीं करते" । यह सुन प्रसन्नहुए राजाको
वह दिन सौ वर्षकी समान बीता । फिर रात्रिमें एकान्तमें प्राप्तहोकर रानीके
सहित राजा झरोखेमें बैठकर आकाशमें दृष्टि लगाये जबतक बैठा कि, उसी
समय गरुडपर चढे, शंख, चक्र, गदा, पद्म हाथमें लिये, यथोक्त चिन्होंसे
युक्त, आकाशसे उतरते हुए, नारायणको देखा । तब अमृतके पूरसे प्लावितकी
समान अपने आपको मानताहुआ उससे बोला-"प्रिये ! हमसे अधिक कोई धन्य
नहीं जिसकी कन्याको नारायण भजतेहैं । सो हमारे सब मनोरथ सफल हुए ।
अब जामाताके प्रभावसे सब पृथ्वीको अपने वश करूंगा" यह विचार सबही
सीमाधिपतियोंके साथ मर्यादाका अतिक्रम करता भया वे उसको मर्यादा अति-
क्रमसे वर्तते देखकर सब मिलकर उसके साथ विग्रह करतेहुए, इसी समय राजा
दवीके मुखसे अपनी कन्याको कहलाताहुआ-"पुत्रि ! तुमसी कन्या होनेपरभी
और भगवान् नारायणसें जामाताहोनेमें भी यह क्या उचितहै कि, सब राजा मेरे
साथ विग्रहकरें । सो आज यह अपने स्वामीसे कहना कि, वह मेरे शत्रुओंको

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मारें" । तब उसने उस कौलिकको विनयपूर्वक रात्रिमें कहा- "भगवन् ! आपसे
जामाता स्थित होनेमें मेरे पिता शत्रुओंसे तिरस्कृत होतेहैं, सो युक्त नहींहै, सो
कृपाकर उनको मारो" । कौलिक बोला-"सुभगे ! तुम्हारे पिताके वे शत्रु क्या
पदार्थ हैं, सो विश्वास रख क्षणमात्रमें उन सबको सुदर्शनचक्रसे तिलवत् खण्ड
खण्ड कर दूंगा" । तब कुछ समय बीतनेपर सबदेश शत्रुओंने नष्टकर वह राजा
परकोट मात्र अवशिष्ट किया (परकोटमात्र बचा ) तोभी वासुदेवरूपधारी
कौलिकको न जानकर वह राजा नित्यही विशेष कपूर अगर कस्तूरी आदि
सुगन्धित द्रव्योंसे नानाप्रकार वस्त्र पुष्प भक्ष्य पेय आदि पदार्थ भेजकर कन्याके
मुखसे कहलाताभया-"भगवन् ! कल प्रभात काल अवश्यही स्थान भग होगा,
कारण कि, अब घास इन्धन आदिकाभी क्षय हुआहै और सम्पूर्ण जन प्रहारसे
जर्जरित देहहुए युद्ध करनेको असमर्थहैं और बहुत मरगये सो यह जानकर इस
समय जो उचितहो सोकरो" । यह सुन कौलिकभी विचार करने लगा कि-
"स्थानभग होनेसे अवश्य इसका मेरे साथ वियोग होगा, इसकारण गरुडपर चढ
आयुधसहित अपनेको आकाशमे दिखाऊ, कदाचित मुझे वासुदेव जानकर वे
डरे हुए राजाके योद्धाओंसे मारे जाय । कहा भी है-
निर्विषेणापि सर्पेण कर्त्तव्या महती फणा ।
विषं भवतु मा भूयात्फटाटोपो भयंकरः ॥ २२५ ॥
निर्विष सर्पकोभी महाफणा नी चाहिये विष हो या नही फणाटोप भय-
कर है ॥ २२५ ॥
अथ यदि मम स्थानार्थमुद्यतस्य मृत्युः भविष्यति तदपि
सुन्दरतरम् । उक्तञ्च-
सो यदि मेरी इस स्थानके लिये मृत्यु हो तोभी अच्छाहै । कहाहै-
गवामर्थे ब्राह्मणार्थे स्वाम्यर्थे स्त्रीकृतेऽथवा ।
स्थानार्थे यस्त्यजेत्प्राणांस्तस्य लोकाः सनातनाः ॥२२६।
गौ, ब्राह्मण, स्वामी, स्त्री और स्थानके निमित्त जो प्राणोंका त्यागन करतेहैं
उनके लिये सनातन लोकहैं ॥ २२६ ॥
चन्द्रे मण्डलसंस्थे विगृह्यते राहुणा दिनाधीशः ।
शरणागतेन सार्द्धं विपदपि तेजस्विनां श्लाघ्या ॥ २२७॥''