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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( ४७८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ४७८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
ऐसे कह उस पत्रके ऊपर गिरे जबतक नदी उसे (पंडितको) बहा
लेचली तबतक उसे बहता हुआ देख दूसरे पंडितने बाल पकड़कर कहा--
“सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्द्धं त्यजति पण्डितः ।
अर्द्धेन कुरुते कार्य्यं सर्वनाशो हि दुःसहः ॥ ४२ ॥”
सर्वनाश उपस्थित होनेमे पंडित जन आधा त्यागदेते है आधेसेही कार्य
करते है कारण कि सर्वनाश नहीं सहा जाता है ॥ ४२ ॥
इत्युक्त्वा तस्य शिरश्च्छेदो विहितः । अथ तैश्च पश्चात्
गत्वा कश्चिद्ग्राम आसादितः । तेऽपि ग्रामीणैः निमन्त्रिताः
पृथक् पृथक् गृहेषु नीताः । ततः एकस्य सूत्रिका घृतखण्डसं-
युक्ता भोजने दत्ता । ततो विचिन्त्य पंण्डितेन उक्तम्--“यद्दी-
र्घसूत्री विनश्यति”--एवमुक्त्वा भोजनं परित्यज्य गतः। तथा
द्वितीयस्य मण्डका दत्ताः । तेनापि उक्तञ्च--“अतिविस्तार-
विस्तीर्णं तद्भवेन्न चिरायुषम्” । स च भोजनं त्यक्त्वा गतः ।
अथ तृतीयस्य वटिकाभोजनं दत्तम् । तत्रापि पण्डितेन
उक्तम्--“छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति”। एवं तेऽपि त्रयः पण्डि-
ताः क्षुत्क्षामकण्ठा लोकैः हास्यमानाः ततः स्थानात् स्व-
देशं गताः। अथ सुवर्णसिद्धिः आह--“यस्त्वं लोकव्यवहारम्
अजानन् मया वार्य्यमाणोऽपि न स्थितः ततः ईदृशीमवस्थाम्
उपगतः । अतोऽहं ब्रवीमि-
ऐसा कह उसका शिर काट लिया । तब वह पीछे फिर कर किसी ग्राममें
: पहुंचे । उन्हे ग्रामीण निमंत्रित कर पृथक् पृथक् अपने घर लेगये तब एकने
सूत्रघृत खांड़से युक्त भोजनको दिया । तब विचार कर पंडितने कहा--“जो
कि दीर्घसूत्री (आलसी) नष्ट होता है” । ऐसा कह भोजन त्याग कर गया ।
दूसरेने मण्ड (मिष्टान्न) दिया तब उसने कहा “अतिविस्तारसे विस्तीर्ण चिरायुके
निमित्त नहीं होता है” । और वह भी भोजन त्याग कर चलागया । तीसरेने
वटिका (पिष्टी) का भोजन दिया । वहां भी उस पांडेतने कहा--“छिद्र युक्त
(पिष्टक) में बहुत अनर्थ होते हैं”। इस प्रकार वे तीनो पंडित भूखसे व्या-
कुल लोकोंसे हंसीको प्राप्त हुए अपने देशोंको प्राप्त हुए । तब सुवर्णसिद्धि
बोला--“जो कि तू लोकव्यवहारको न जानकर मुझसे निवारण किया हुआ भी
न स्थित हुआ इस कारण ऐसी दशाको प्राप्त हुआ । इससे मैं कहता हूं-

भाषाटीकासमेतम् । ( ४७९ )
अपि शास्त्रेषु कुशला लोकाचारविवर्जिताः ।
सर्वे ते हास्यतां यान्ति यथा ते मूर्खपण्डिताः ॥ ४३ ॥”
कि, शास्त्रमे कुशल भी लोकाचार न जाननेके कारण उन मूर्ख पंडितोकी
समान वे सभी हास्यताको प्राप्त होते हैं ॥ ४३ ॥”
तत् श्रुत्वा चक्रधर आह–“अहो ! अकारणमेतत् ।
यह सुनकर चक्रधर बोला--“अहो ! यह तो अकारण है ।
बहुबुद्धयो विनश्यन्ति दुष्टदैवेन नाशिताः ।
स्वल्पबुद्धयोऽप्येकास्मिन् कुले नन्दन्ति सन्ततम् ॥ ४४ ॥
दुष्ट दैवसे नाशित होकर महाबुद्धिमान् भी नष्ट होते हैं और स्वल्पबुद्धिवाले
भी एक कुलमे निरन्तर आनन्दको प्राप्त होते है ॥ ४४ ॥
उक्तञ्च-
कहा है कि-
अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं
सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति ।
जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः
कृतप्रयत्नोऽपि गृहे न जीवति ॥ ४५ ॥
नहीं रक्षित किया दैवसे रक्षित होकर स्थित रहता है, भली प्रकार रक्षा
किया हुआभी दैवसे हत होनेके कारण नष्ट हो जाता है, वनमे विसर्जन किया
अनाथ भी जीता है, और यत्न करनेपर घरमें भी नही जीता ॥ ४५ ॥
तथाच-
और देखो-
शतबुद्धिः शिरस्थोऽयं लम्बते च सहस्रधीः ।
एकबुद्धिरहं भद्रे क्रीडामि विमले जले ॥ ४६ ॥”
यह शतबुद्धि शिरपर है और यह सहस्रबुद्धि लटकता है हे भद्रे ! मै एक-
बुद्धि हू जो उज्ज्वल जलमें क्रीडा करता हू ॥ ४६ ॥
सुवर्णद्धिः आह,-कथमेतत्” स आह,-
सुवर्णसिद्धि बोला-“यह कैसे?” चक्रधर बोला-