पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
(४०) पञ्चतन्त्रम् ।
(४०) पञ्चतन्त्रम् ।
स्वामिप्रसादात्”। पिंगलक आह—“अपि सत्यम्”? । दम-
नक आह—‘किं स्वामिपादानामग्रेऽसत्यं विज्ञाप्यते? । उक्तञ्च—
ऐसा विचारकर पिंगलकके समीप चला, पिंगलकभी उसको आता देख
अपना आकार रक्षित किये हुए पहलेकी समान स्थित भया । दमनकभी पिंग-
लकके धोरे जाकर प्रणामकर स्थित हुआ । पिंगलक बोला—“क्या आपने उस
जीवको देखा?” दमनक बोला—“स्वामीकी कृपासे देखा” । पिंगलक बोला—
“क्या सत्य है?” । दमनक बोला-“क्या स्वामीके चरणोंके सन्मुख असत्य
कहाजाता है ? । कहा भी है कि—
अपि स्वल्पमसत्यं यः पुरो वदति भूभुजाम् ।
देवानाञ्च विनश्येत स द्रुतं सुमहानपि ॥ १३० ॥
जो देवता और राजाके आगे थोडाभी असत्य कहताहै वह महान् भी शीघ्र-
नष्ट होजाताहै ॥ १३० ॥
तथाच—
और देखो—
सर्वदेवमयो राजा मनुना सम्प्रकीर्त्तितः ।
तस्मात्तं देववत्पश्येन्न व्यलीकेन कर्हिचित् ॥ १३१ ॥
मनुजीने कहा है कि, राजामे सब देवता निवास करतेहैं । इस-
कारण उसको सदा देवताओंके समान देखना कभी और प्रकारसे नही॥१३१॥
सर्वदेवमयस्यापि विशेषो नृपतेरयम् ।
शुभाशुभफलं सद्यो नृपाद्देवाद्भवान्तरे ॥ १३२ ॥”
सर्वदेवमय होनेवाले राजामें यह विशेष है कि, राजासे शुभाशुभ फल शीघ्र
मिलताहै और देवताओंसे जन्मान्तरमें फल मिलताहै ॥ १३२ ॥”
पिङ्गलक आह—“सत्यं दृष्टं भविष्यति भवता । न दीनो-
परि महान्तः कुप्यन्ति इति न त्वं तेन निपातितः । यतः—
पिंगलक बोला-“आपने सत्यही देखा होगा , परन्तु दीनोंके ऊपर महान्
क्रोध नहीं करते इस कारण उसने तुझको नहीं मारा । क्योंकि,—
तृणानि नोन्मूलयति प्रभञ्जनो
मृदूनि नीचैः प्रणतानि सर्वतः ।
भाषाटीकासमेतम् । ( ४१ )
स्वभाव एवोन्नतचेतसामयं
महान्महत्स्वेव करोति विक्रमम् ॥ १३३ ॥
पवन मृदु नीचे सब प्रकार प्रणत हुए तृणोंको उन्मूलन नहीं करताहै श्रेष्ठ
चित्तवालोंका यह स्वभावही है वडे पुरुष वडोंमेही विक्रम करतेहैं ॥ १३३ ॥
अपिच-
औरभी-
गण्डस्थलेषु मदवारिषु बद्धराग-
मत्तभ्रमद्भ्रमरपादतलाहतोऽपि ।
कोपं न गच्छति नितान्तबलोऽपि नाग-
स्तुल्ये बले तु बलवान्परिकोपमेति ॥ १३४ ॥ ”
मदके जलवाले गण्डस्थलोंमे प्रीति करनेवाले मतवाले भ्रमण करते
हुए भोरोंके चरणतलसे ताडित होकर भी महाबली हाथी उनपर क्रोध नहीं
करता कारण कि, बलवान् तुल्यबलमे क्रोध करताहै ॥ १३४ ॥”
दमनक आह-“अस्तु एवंस महात्मा वयं कृपणाः तथापि
स्वामी यदि कथयति ततो भृत्यत्वे नियोजयामि ।” पिङ्गलक
आह-“ ( सोच्छ्वासम् ) किं भवान् शक्नोत्येवं कर्तुम्?”। दम-
नक आह-“किमसाध्यं बुद्धेरस्ति । उक्तञ्च-
दमनक बोला-“यही हो क्योंकि, वह महात्मा और हम दीन हैं तोभी यदि
आप कहें तो आपके भृत्यपनमें उसको नियुक्त करूं” । पिंगलक ( विश्वास
लैकर ) बोला-“क्या तुम यह कर सकते हो”? । दमनक बोला-“बुद्धिके सामने
क्या असाध्य है, कहा है-
न तच्छस्त्रैर्न नागेन्द्रैर्न हयैर्न पदातिभिः ।
कार्य्यं संसिद्धिम्भेति यथा बुद्धया प्रसाधितम् ॥१३५॥ ”
कार्य जैसा बुद्धिसे सिद्ध होताहै ऐसा शस्त्र, हाथी, घोडे, पैदलोंसे सिद्ध नहीं
होता, ॥ १३५ ॥ ”
पिङ्गलक आह-“यदि एवं तर्हि अमात्यपदे अध्यारोपि-
तस्त्वम् । अद्यप्रभृति प्रसादनिग्रहादिकं त्वयैव कार्य्यमिति
निश्चयः” । अथ दमनकः सत्वरं गत्वा साक्षेपं तमिदमाह-