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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

( ३८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

( ३८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
जानेमें भयसे व्याकुलमन होकर पिंगलक विचार करने लगा कि, “देखो मैंने
अच्छा नहीं किया जो इसके विश्वासको प्राप्त होकर मैंने अपना भेद कह दिया।
जो कदाचित् यह दमनक दोनों तरफका बनकर मेरे ऊपर दुष्टबुद्धि होजायं
कारण कि, यह अधिकारसे भ्रष्ट है। कहाहै कि-
ये भवन्ति महीपस्य सम्मानिताविमानिताः ।
यतन्ते तस्य नाशाय कुलीना अपि सर्वदा ॥ १२२ ॥

  • जो राजाके पहले सम्मानपात्र होकर पीछे तिरस्कृत होते हैं, चाहे वे कुलीन
    भी हों तोभी उसके नाशके निमित्त यत्न करते हैं ॥ १२२ ॥
    तत् तावदस्य चिकीर्षितं वेत्तुमन्यत् स्थानान्तरं गत्वा
    प्रतिपालयामि । कदाचित् दमनकः तमादाय मां व्यापाद-
    यितुमिच्छति । उक्तञ्च-
    सो तबतक इसकी इच्छा देखनेको दूसरे स्थानमें जाकर स्थित रहूं, कदाचित्
    दमनक उसको साथ लाकर मुझे मरवा डालनेकी इच्छा करताहै क्या कहाहै कि-
    न बध्यन्ते ह्यविश्वस्ता बलिभिर्दुर्बला अपि ।
    विश्वस्तास्त्वेव बध्यन्ते बलवन्तोपि दुर्बलैः ॥ १२३ ॥
    किसीका विश्वास न करनेवाले दुर्बलभी बलवानोंसे नहीं बंधते हैं और
    विश्वास करनेसे बलवान्‌ही दुर्बलोंसे बंधजातेहैं ॥ १२३ ॥
    बृहस्पतेरपि प्राज्ञो न विश्वासे व्रजेन्नरः ।
    य इच्छेदात्मनो वृद्धिमायुष्यञ्च सुखानि च ॥ १२४ ॥
    बुद्धिमान् तो बृहस्पतिके विश्वासमेंभी न जाय जो अपनी आयुवृद्धि और
    सुखकी इच्छा करता हो ॥ १२४ ॥
    शपथैः सन्धितस्यापि न विश्वासे व्रजेद्दिषोः ।
    राज्यलाभोद्यतो वृत्रः शक्रेण शपथैर्हतः ॥ १२५ ॥
    शपथसे सन्धान किये शत्रुके विश्वासमें न जाय, देखो विश्वाससेही राज्यलो-
    भसे उद्यत हुए वृत्रको इन्द्रने मार डाला ॥ १२५ ॥
    न विश्वासं विना शत्रुर्दैवानामपि सिद्ध्यति ।
    विश्वासात्त्रिदशेन्द्रेण दितेर्गर्भो विदारितः ॥ १२६ ॥”

[Header]: भाषाटीकासमेतम् । (३९)

विश्वासके बिना तो देवताभी शत्रुको सिद्ध नहीं कर सकते, विश्वाससेही
इन्द्रने दितिका गर्भनाश कर दिया ॥ १२६ ॥"
एवं सम्प्रधार्य स्थानान्तरं गत्वा दमनकमार्गमवलोकयन्
एकाकी तस्थौ । दमनकोऽपि सञ्जीवकसकाशं गत्वा वृषभोऽ-
यमिति परिज्ञाय हृष्टमना व्यचिन्तयत् । "अहो ! शोभन-
मापतितम् अनेन एतस्य सन्धिविग्रहद्वारेण मम पिंगलको
वश्यो भविष्यति इति । उक्तञ्च-
ऐसा विचारकर अन्यस्थानमें जाय दमनककी बाट देखता हुआ इकल्ला स्थित
रहा । दमनकभी सजीवकके निकट जाकर यह बैल है ऐसा जानकर प्रसन्न हो
विचारने लगा "आहा ! यह तो अच्छी बात हुई । इसके साथ उसकी संधि
विग्रह होनेसे पिंगलक मेरे वशीभूत हो जायगा । कहाभी है-
न कौलीन्यान्न सौहार्दान्नृपो वाक्ये प्रवर्त्तते ।
मन्त्रिणां यावदभ्येति व्यसनं शोकमेव च ॥ १२७ ॥
कुलीनता और सुहृदतासे राजा मंत्रियोंके वाक्यमें प्रवृत्त नहीं होताहै जबतक
कि, उसको व्यसन और शोककी प्राप्ति नहीं होती ॥ १२७ ॥
सदैववापद्गतो राजा भोग्यो भवति मन्त्रिणाम् ।
अत एव हि वाञ्छन्ति मन्त्रिणः सापदं नृपम् ॥ १२८ ॥
आपत्तिमें प्राप्त हुआ राजा मन्त्रियोंको सदा भोग्य होताहै, इसकारण मंत्री
राजाको आपत्तियुक्त रहनेकीही इच्छा करतेहैं ॥ १२८ ॥
यथा नेच्छति नीरोगः कदाचित्सुचिकित्सकम् ।
तथापद्रहितो राजा सचिवं नाभिवाञ्छति ॥ १२९ ॥"
जैसे निरोगी कभी वैद्यकी इच्छा नहीं करता, इसी प्रकार आपत्तिरहित राजा
कभी मंत्रीकी इच्छा नहीं करता ॥ १२९ ॥"
एवं विचिन्तयन् पिंगलकाभिमुखः प्रतस्थे । पिंगलकोऽपि
तमायान्तं प्रेक्ष्य स्वाकारं रक्षन् यथापूर्वमवस्थितः । दम न-
कोऽपि पिंगलकसकाशं गत्वा प्रणम्य उपविष्टः । पिंगलक
आह-"किं दृष्टं भवता तत् सत्त्वम्"? । दमनक आह-"दृष्टं
१ देखो भागवतपर हमारी टीका ।