पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( १९८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १९८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
ततोऽहं पूर्वमेवात्मानमरत्नं समर्प्य एतान् मुञ्चामि । उक्तञ्च-
उसके सेवा करनेपर उन ब्राह्मणोंने सब वस्तु बेचकर बहु मूल्य रत्न
खरीदे । और उनको जंघामें उनके सम्मुखही डालकर अपने देश जानेको
तयार हुए । तब वह ब्राह्मण उनको जाता देख मनमें व्याकुल हुआ, "अहो
यह धन कुछभी हमको न दिया सो मैं इनके साथ जाऊं मार्गमे कहीं विष दे
इनको मारकर सब रत्न ग्रहण करलूं" । ऐसा विचार कर उनके आगे करुणासे
विलाप कर यह बोला,-"भो मित्रो ! तुम मुझ इकलेको छोड़कर जानेको
तयार हुए, सो मेरा मन आपके साथ स्नेहपाशमें बंधा है आपके वियोगसेही
मैं व्याकुल हूं बुद्धि धीरज धारण नहीं करती है । तुम अनुग्रह कर सहायभूत
मुझेभी साथ ले चलो" । उसकेवचन सुन वे करुणासे आर्द्रचित्त हो उसके
साथ ही अपने देशको चले । तब मार्गमें उन पांचोंके पल्लीपुरमें जाते हुए
काक कहने लगे,-"रेरे किरातो ! दौडो दौडो सत्रा लाख रुपयेके धनी जाते
है इनको मारकर धन लेलो" । तब किरातोंने ध्वांक्षवचन सुनकर शीघ्र जाकर
उन ब्राह्मणोंको लगुडप्रहारसे जर्जर करके वस्त्र उतारकर देखा, परन्तु धन
कुछभी न पाया । तब उन किरातोंने कहा,-"भो मुसाफिरो ! पहिले कभी का-
कोंका वचन असत्य नहीं हुआथा । सो तुम्हारे पास कहीं धन है सो दो नहीं
तो सबका वधकर चर्म विदीर्ण कर प्रत्यंग देखकर धन लेलेगे" । तब उनके
ऐसे वचन सुनकर चोर विप्रने मनमें विचारा "जो यह इन ब्राह्मणोंका वध कर
अंगको देख रत्न लेंगे तो मुझकोभी मारेंगे सो पहले मैं अरत्न अपनेको सम-
र्पण कर इनको छुडाऊं । कहा है-
मृत्योर्बिभेषि किं बाल न स भीतं विमुञ्चति ।
अद्य वाब्दशतान्ते वा मृत्युर्वै प्राणिनां ध्रुवः ॥ ४५३ ॥
मूर्ख ! मृत्युसे क्यों डरता है यह डरे हुएको नहीं छोडेगी आज वा सौ
वर्षमें प्राणियोंको मृत्यु अवश्य होगी ॥ ४५३ ॥
तथाच-
तैसेही-
गवार्थे ब्राह्मणार्थे च प्राणत्यागं करोति यः ।
सूर्य्यस्ये मण्डलं भित्वा स याति परमां गतिम् ॥४५४॥
भाषाटीकासमेतम् । ( १९९ )
जो गौ और ब्राह्मणके निमित्त प्राणत्यागन करता है वह सूर्यमडलको
भेदकर परमगतिको जाता है ॥ ४१४ ॥”
इति निश्चित्य अभिहितम्,—“भोः किराताः ! यदि एवं
ततो मां पूर्वं निहत्य विलोकयत । ततः तैस्तथानुष्ठिते
तं धनरहितमवलोक्य अपरे चत्वारोऽपि मुक्ताः । अतोऽहं
ब्रवीमि, “पण्डितोऽपि वरं शत्रुः” इति । अथ एवं संवदतो-
स्तयोः सञ्जीवकः क्षणमेकं पिंगलकेन सह युद्धं कृत्वा तस्य
खरनखरप्रहाराभिहतो गतासुः वसुन्धरापीठे निपपात । अथ
तं गतासुमवलोक्य पिंगलकस्तद्गुणस्मरणाद्र्द्रहृदयः प्रोवाच-
“भोः ! अयुक्तं मया पापेन कृतं सञ्जीवकं व्यापादयता, यतो
विश्वासघातादन्यत् नास्ति पापतरं कर्म । उक्तञ्च-
ऐसा निश्चय कर उसने कहा,—“हे किरातो ! जो ऐसा है तो पहले मुझे
मारकर देखो तब उन्होंने वैसा करके उसको धनरहित देख शेष चारों छोड़-
दिये । इससे मैं कहताहू “पंडितभी शत्रु अच्छा है इत्यादि” । ऐसा उन दोनोंके
कहतेमें सजीवक एकक्षण पिंगलकके साथ युद्ध करके उसके तीक्ष्ण नखप्रहारसे
हत हुआ प्राणरहित हो पृथ्वीपर गिरा । तब उसको प्राणरहित देख पिंगलक
उसके गुण स्मरणसे आर्द्रहृदय हो बोला,—“भो ! सजीवकको मारकर मैंने अयुक्त
पाप किया, कारण कि,विश्वासघातसे अधिक और कोई पापकर्म नही है। कहाहै-
मित्रद्रोही कृतघ्नश्च यश्च विश्वासघातकः ।
ते नरा नरकं यान्ति यावच्चन्द्रादिवाकरौ ॥ ४५५ ॥
मित्रद्रोही, कृतघ्नी और जो विश्वासघाती है वे मनुष्य जबतक सूर्य चन्द्र हैं
तब तक नरकको जाते हैं ॥ ४१९ ॥
' भूमिक्षये राजविनाश एव भृत्यस्य वा बुद्धिमतो विनाशे ।
नो युक्तमुक्तं ह्यनयोःसमत्वं नष्टापि भूमिःसुलभा न भृत्याः॥
भूमिक्षय राजनाश वा बुद्धिमान् भृत्यके नाशमें इनका समत्व कहना युक्त
नहीं हो सक्ता नष्टहुई भूमि सुलभ है पर भृत्य नहीं मिलते ॥ ४१६ ॥
तथा मया सभामध्ये स सदैव प्रशंसितः । तत् किं कथ-
यिष्यामि तेषामग्रतः । उक्तञ्च-