पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
Panchatantra (with Commentary – All Five Tantras)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( १५० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १५० ) पञ्चतन्त्रम् ।
असमर्थ पुरुषोंका क्रोध अपने नाशके ही निमित्त होताहै अत्यन्त जलती
हुई कसेरी अपने निकटकोही जलातीहै ॥ ३५३ ॥
तथाच-
और देखो-
अविदित्वात्मनः शक्तिं परस्य च समुत्सुकः ।
गच्छन्नभिमुखो नाशं याति वह्नौ पतंगवत् ॥ ३५४ ॥”
जो उत्कंठित हो अपनी शक्ति और परकी शक्ति विनाजाने सम्मुख जाताहै
वह अग्निमें पतंगकी समान नष्ट होजाताहै ॥ ३५४ ॥”
टिट्टिभ आह-“प्रिये ! मामैवं वद् येषामुत्साहशक्तिः
भवति ते स्वल्पा अपि गुरून् विक्रमन्ते । उक्तञ्च-
टिट्टिभ बोला, - “प्रिये ! ऐसा मत कहो जिनको उत्साहशक्ति होतीहै वे
स्वल्पभी बडे बडोंपर आक्रमण करते हैं। कहाहै-
विशेषात्परिपूर्णस्य याति शत्रोरमर्षणः ।
आभिमुख्यं शशाङ्कस्य यथाद्यापि विधुन्तुदः ॥ ३५५ ॥
क्रोधी शत्रु विशेषकर परिपूर्णकेही सम्मुख जातेहैं जैसे राहु अर्थातक
चन्द्रमाके सम्मुख ॥ ३५५ ॥
तथाच-
औरभी देखो-
प्रमाणादाधिकस्यापि गण्डश्याममदच्युतेः ।
पदं मूर्ध्नि समाधत्ते केसरी मत्तदन्तिनः ॥ ३५६ ॥
प्रमाणसेभी अधिक, गण्डस्थलमें श्याम, मदत्यागनेवाले मत्त हाथीके सिरपर
सिंह चरण रखता है ॥ ३५६ ॥
तथाच-
तैसेही-
बालस्यापि रवेः पादाः पतन्त्युपरि भूभृताम् ।
तेजसा सहजातानां वयः कुत्रोपयुज्यते ॥ ३५७ ॥
बालक सूर्यकी किरणों पर्व्वतोंके ऊपर गिरती हैं तेजके साथ उत्पन्न हुओंकी
अवस्था नहीं देखीजातीहै ॥ ३५७ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( १५१)
हस्ती स्थूलतरः स चाङ्कुशवशः किं हस्तिमात्रोऽङ्कुशः
दीपे प्रज्वलिते प्रणश्यति तमः किं दीपमानं तमः ।
वज्रेणापि शताः पतन्ति गिरयः किं वज्रमात्रो गिरि-
स्तेजो यस्य विराजते स बलवान्स्थूलेषु कः प्रत्ययः ३५८
हाथी महास्थूलहै वह अंकुशके वशमेंहै क्या अंकुश हाथीकी समान है ? दीप-
कके ज्वलित होनेमें अंधकार नाश होताहै क्या दीपक अंधकारकी समान है ?
वज्रसे सैकड़ों पर्वत गिरजाते हैं क्या वज्र पर्वतकी समान है ? तेज जिसमे है
वही बलवान् है मोटे शरीरवालोंमें क्या विश्वास है ॥ ३५८ ॥
तदनया चञ्च्वास्य सकलं तोयं शुष्कस्थलतां नयामि” ।
टिट्टिभी आह-“भोः कान्त ! यत्र जाह्नवी नवनदीशतानि
गृहीत्वा नित्यमेव प्रविशति तथा सिन्धुश्च, तत्कथं त्वमष्टा-
दशनदीशतीः पूर्य्यमाणं तं विप्रुषवाहिन्या चञ्च्वा शोषयि-
ष्यसि ? । तत् किमश्रद्धेयेन उक्तेन” । टिट्टिभ आह-“प्रिये !
सो इस चोचसे इसका सम्पूर्ण जल सुखा डालूंगा” टिट्टिभी बोली,–“भो
स्वामिन् ! जहा गगा नदी नौसौ नदियोंको लेकर नित्यही प्रवेश करती है तथा
सिन्धु नदभी, सो किस प्रकार तू अठारहसौ नदियोंसे पूर्यमाण उस सागरको
जलकण वहन करनेवाली चोचसे सुखासकेगा ? सो अश्रद्धेय वचनोंसे क्या
लाभ है” टिट्टिभ बोला,–“प्रिये !
अनिर्वेदः श्रियो मूलं चञ्चुर्मे लोहसन्निभा ।
अहोरात्राणि दीर्घाणि समुद्रः किं न शुष्यति ॥ ३५० ॥
निर्वेदका नहोना (उद्योग) लक्ष्मीका मूल है मेरी चोच लोहनिर्मितसी है दिन
रात दीर्घहै समुद्र क्यों न सूखेगा ॥ ३५९ ॥
दुराधिगमः परभागो यावत्पुरुषेण पौरुषं न कृतम् ।
जयति तुलामधिरूढो भास्वानपि जलदपटलानि॥३६०॥
परायाभाग कठिनतासे मिलताहै, परन्तु तभीतक, जबतक कि,-पुरुष पुरुषार्थ
नहीं करताहै तुला (सक्रमण)में प्राप्त हुआ सूर्यभी मेघसमुहको जीतताहै ॥ ३६०॥”
टिट्टिभ्याह-“यदि त्वयावश्यं समुद्रेण सह वैरानुष्ठानं
कार्यं तदन्यानपि विहंगानाहूय सुहृज्जनसहित एवं समाचर ।
उक्तञ्च-