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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

मुहम्मदबोध (नवम तरंग)

श्रीजगद्गुरवे नमः

अथ श्रीबोधसागरे

नवमस्तरंगः

मुहम्मदबोध

★

धर्मदास--वचन

साखी-धर्मदास विनती करे, कृपा करहुं गुरुदेव ॥

नबी महम्मद जस भये, सो सब कहिये भेव

सत्यकबीर वचन-चौपाई

धर्मदास पूछ्यो भल बानी । सो सब कथा कहँ सहिदानी ॥

जेहि औसुर मुहम्मद औतारा । धरम आपनो जगत पसारा ॥

मारि काटि निज धर्म चलायो । जाते जीव बहुत दुख पायो ॥

परम पुरुष दिल दायो आयी । मुक्ता मणि कहँ कह्यो बुझायी ॥

मुक्तामणि संसार सिधाओ । काल कष्टते जीव बचाओ ॥

विगसी कमल उठी असबानी । मुक्तामनि सुनियो तुम ज्ञानी ॥

भवमें जाओ जीवके काजा । जीवन कष्ट देत यमराजा ॥

मुक्तामणि चले शीस नवायी । तेही क्षण भव प्रकटे आयी ॥

साखी-दोसौ युग कलि युग गयो, तब आयो संसार ॥

बहुतक जीव चितायऊ, कोइ कोइ हंस हमार ॥

चौपाई

ऐसे बहुत दिन गयो सिरायी । सिंचल द्रीपमें पहुंच्यो जायी ॥

तब वह मिले मुहम्मद पीरा । जिन सब हुकुम कीन तागीरा ॥

( ६ )

मुहम्मदबोध

तहाँ जाय हम कीन सलामा । मात रहे अलमस्त इलामा ॥
नजर दिदार जो कीन हमारी । मत्त गयन्द करे असवारी ॥
कहु भाई तुम कहैं भरमाये । कहाँ ते आये कहाँ को जाये ॥
नाहक को नहिं साहब राजी । पढ़ि कुरान पूछो तुम काजी ॥
हुए हैरान नजर नहिं आये । किया नसीहत अल्ला फरमाये ॥

मुहम्मद वचन

साखी—कहाँ ते आये पीर तुम, क्यों कर किया पयान ॥
कौन शक्सका हुक्म है, किसका है फरमान ॥

रमैनी

पीर मुहम्मद सखुन जो खोला । अल्ला हमसे परदै बोला ॥
हम अहदी अल्ला फरमाना । वतन लाहूत मोर अस्थाना ॥
उन भेजे रूह बारह हजार । उम्मतके हम हैं सरदारा ॥
तिस कारण जो हम चलि आये । सोवत थे सब जीव जगाये ॥
जीव खाबमें परो भुलाये । तिस कारन फरमान ले आये ॥
तुम बूझो सो कौन हो भाई । अपनो ईस्म कहो सखुझाई ॥
साखी—दूरकी बाते जो करौ, करते रोजा नमाज ॥
सो पहुँचे लाहूतको, खोवे कुलकी लाज ॥

कबीर वचन

कहैं कबीर सुनो हो पीरा । तुम लाहूत करो तागीरा ॥
तुम भूले सो मरम न पाया । दे फरमान तुम्हें भरमाया ॥
फिर फिर आव फिर फिर जाई । बद अमली किसने फरमाई ॥
लाहूत मुकाम बीचको भाई । बिन तहकीक असल ठहराई ॥
तुम ऐसे उनके बहुतेरे । ले फरमान जाव तुम डेरे ॥

१ नाम । २ इसका वर्णन ग्रन्थ सारमें देखो । ३ स्थान ४ जाँच ।

बोधसागर

(७)

साखी-खोजत खोजत खोजियाँ, हुवा सो गूना गून ॥
खोजत खोजत ना मिला, तब हार कहा बेचून ॥
बेचून जग राँचिया, साई नूर निनार ॥
आखिर केरे वक्त में, किसकी करो दिदार ॥

रमैनी

तुम लाहूंत रचे हो भाई । अगम गम्य तुम कैसे पाई ॥
यह तो एक आदि विसरामा । आगे पाँच आदि निज धामा ॥
तहँते हम फरमाँ ले आये । सब बदफेलको अमल मिटाये ॥
उन फरमान जो हमको दीना । तिनका नाम बेचून तुम लीना ॥
साखी-साहब का घर दूर है, जासु असल फरमान ॥
उनको कहो जो पीर तुम, सोह अमर अस्थान ॥

मुहम्मद वचन-रमैनी

कहै मुहम्मद सुनो कवीरा । तुम कैसे पायो अस्थीरा ॥
लाहूत मेटि जो अगम बतायो । खुद खुदाय हमहूँ नहिं पायो ॥
हम जानें खुद आपै आही । तुम कुदरत कर थापो ताही ॥
हम तो अर्श हाजिरी आयो । तुम तो कुदरतसे ठहराये ॥
तुम्हरे कहे भरम मोहि आयो । खुद खुदाय तुम दूर बतायो ॥
आप सुनाओ खुदकी बानी । आलम दुनियाँ कहो बखानी ॥
लाहूत मुकाम हम निजकर जाना । सो तो तुम कुदरत कर ठाना ॥
हलकी मुलकी बासरी भाई । तीन हुकम अछा फरमाई ॥
साखी-साई सुरशिद पीर है, साँचा जिस फरमान ॥
हलकी मुलकी बासरी, तीन हुकुम कर मान ॥

कबीर वचन-रमैनी

सुनो मुहम्मद कहूं खुदवाणी । खुद खोदायकी कहूं निशानी ॥
कादिर थे तब कुदरत नाही । कुदरत थी कादिरके माहीं ॥

( ८ )

मुहम्मदबोध

ख्वार सभीको चीन्हो भाई । असल रुहको देउँ बताई ॥
असल रुहकि दीदार जो पावे । पावे निज मुसलमान कहावे ॥
हो आवाज जहां परदा पोशी । है वह मर्द कि है वह जोशी ॥
जब लग तरुत नजर नहिं आवे । दिल विश्वास कौन विधि पावे ॥
जब खुद की खबर न पावे । तब लग कुदरत भ्रम ठहरावे ॥
हाल माशूक नजर जो आवे । एक निगाह दीदार जो पावे ॥
चार वेद अक्षर निरमाई । चार अंश ताके सुत भाई ॥
एकअंश चौभाग जो कीना । ताते एक गुप्त कर लीना ॥
एक अंशते गुप्त छिपाई । तीन अंश संसार पठाई ॥
अंशाहि अंश भेद नहिं दीना । यह अचरज अक्षरने कीना ॥
जो तुम कहा हमारा मानो । तो हम तुमते निर्णय ठानो ॥
साखी—यह प्रपञ्च बेचूनका, तुमते कहा न भेव ॥
आप सो रत होइ वैठा, तुम चार करत हो सेव ॥

मुहम्मद वचन

कहैं मुहम्मद सुन खुद अहदी । इल्म लद्दुब्रूी कहु बुनियादी ॥
जब नहिं पिण्ड ब्रह्माण्ड अस्थूला । तब ना हतो सृष्टिको मूला ॥
तादनकी कहिय उपतानी । आदि अन्त और मध्य निशानी ॥
साखी—बुजरुग हकीकत सब कहो, किस विधि भया प्रकाश ॥
जब हम जाने आदिको, तो हमहूँ बाँधे आश ॥

कबीर वचन

सुनो मुहम्मद सांचे पीरा । समरथ हुकुम खुद आदि कबीरा ॥
अब हम कहैं सुनो चितलायी । आदि अन्त सब कहों बुझायी ॥
प्रथमैं समरथ आदि अकेला । उनके संग हता नहिं चेला ॥
साखी—वाहिद थे तब आपमें, सकल हतो तेहि माहैं ॥
ज्यों तरुवरके बीजमें, पुष्प पात फल छाहैं ॥

बोधसागर

( ९ )

बौपाई

आठों अंस त्रिदेव समेता । उत्पत्ति जगतकीन प्रभु एता ॥
तीनों दिन त्रैलोकको राज् । तिनवसपरि जिव भयेअकाज् ॥
तिन पुनि एक जुक्ति चित दीना । प्रथम ज्ञान चार जो कीना ॥
प्रथम क्षुद्रजो ज्ञान उपजाई । ध्यान अंशको तौन पठाई ॥
दूसर ज्ञान वाचा है भाई । राज अंशको तौन पठाई ॥
तीसर ज्ञान जो अनुभव कीना । धर्म राय को लेखा दीना ॥
चौथे ब्रह्मज्ञान उपजाई । माय अंश सो ध्यान लगाई ॥
पंचवा ज्ञान सहज की डोरी । सब जीवनकी बंदी छोरी ॥
जहाँसे चार ज्ञान जो आवा । सोई कला निरंजन पावा ॥
निरंजन भये राज अधिकारी । तिनके चार अंश सेवकारी ॥
चार ज्ञानते चारो वेदा । तिनते चारो भये कतेबा ॥
मूल कुरान वेद की वानी । सो कुरान तुम जगमें आनी ॥
हक् कुरान जो तुमको दीना । हद्दहुकम तुम आपन कीना ॥
चार कतेब के चारो अंशा । तिनके कहो भिन्न भिन बंशा ॥
वेद पढावत ब्रह्मा आये । ऋग वेद को नाम लखाये ॥
दूसर यजुरवेदकी वानी । राजनीति सो कीन बखानी ॥
तीसर सामवेदकी बानी । यज्ञ होम तिन कीन बखानी ॥
चौथ अथर्वन गुप्त छपाये । तौन हुकम तुम जगमें आये ॥
ऐकै मूल कुरानमें चारी । चार बीर तुम हो सरदारी ॥
जम्बूर किताब दाऊदने पाई । नासूत मोकाम रहै ठहराई ॥
तौरेत कीताब मूसाने पाई । मलकूत मोकाम रहै ठहराई ॥
इंजील किताब ईसाने पाई । जंबरूत मोकाम रहे ठहराई ॥
फुरकानकिताब नबी तुम पाई । लौहूतमोकाम रहे लौलाई ॥
कुरान वेहदको मरम न पावे । बिनदेखे विश्वास क्या आवै ॥

( १० )

मुहम्मदबोध

चार मोकाम किताब है चारी । पंचये नाम अर्चित सँवारी ॥
तहँते आइ रूह बारह हजारी । तहाँ अर्चित गुप्त व्योहारी ॥
साखी-पीर औलिया था किया, यह सब उरले तीर ॥
समरथ का घर दूर है, तिनको खोजो पीर ॥

❁ मारफत

चौपाई

औवलमोकाम नासूत ठेकाना । दुजामोकाममलकूतजोजाना ॥
सेउम मोकाम जबरूत ठेकाना । चहारूममोकामलाहूतजोजाना ॥
पंचये मोकामहाहूत अस्थाना । छठे मोकाम सोहं जो माना ॥
हफतुम मोकाम बानी अस्थाना । अठये मोकाम अंकूर ठेकाना ॥
नवये मुकाम आहूत निशानी । दसये मोकाम पुरुषरजधानी ॥

बेतुक

औवल शरी अत् १ । तरीकत् २ । हकीकत् ३ । मारफत् ४ ।
मरोवत् ५ । ध्यान दोरहिअत् ६ । जुलफकार चन्द्र गेटा ७ ।
हुकुमसुरतद ८ । देयना कासो यही अत् ९ । सचपावेसमरथकाय
१० । अंकार ओंकार कलिमा नवी सजुपावै देखा हद् बैहद्

मुहम्मद वर्चन

तुम कब्बीर भेद अधिकाये । खुद समरथकी खबरि जो ल्याये ॥
अब तुमको हम बूझैं अत् । सो कहिये खुद अहदी संत् ॥
को तुम आहु केहांते आये । क्यों तुम अपने बर्ण छिपाये ॥
सात सुरति समरथ निरमाई । यह अस्थान रहो की जाई ॥
यती मारफत कहु दुरवेशा । हम मानैं तुमरो उपदेशा ॥
सात सुरति केहि माहि समाई । जिव बोधे सो कह चलिजाई ॥
समरथ गम तुमु साँच कबीरा । समरथ भेद कहो मति धीरा ॥

  • इस विषय में लिखे हुये मुकामों का वर्णन पुस्तकके अन्तमें देखो ।

बोधसागर

(११)

साखी-मेरे शंका बाढिया, थाके वेद कुरान ॥
वाहिद कैसे पाइये, समरथको मक्कान ॥

सत्यकबीर बचन

सुनो मुहम्मद कहों बुझाई । जो खुद आदि अस्थान है भाई ॥
जो जो हुकुम समरथ फरमाई । सो सो हुकुम हम आनि चलाई ॥
सुर नर मुनिको टेरि सुनाये । तुमको बहुत बार समुझाये ॥
तुमपर मोह अक्षरने डारा । तेहि कारण आये संसारा ॥
सोलह असंख जुग जबै सिराई । सोलह असंख उतपति मिटि जाई ॥
सात सुरति तब लोकहि जाई । जिव बोधो तेहि माह समाई ॥
सात सुन्य तजि ते अस्थाना । ते सब मिटे होय घमसाना ॥
वेद कतेवकि छोडो आशा । वेदकतेव अक्षर प्रकाशा ॥
तीन बार तुम जगमें आये । फिर फिर अक्षरने भरमाये ॥
अक्षर चीन्हिके छोडो भाई । तीन अंश अक्षर निरमाई ॥
ब्रह्मकि सृष्टि आपको कीना । जीव वृष्टि तीरथ व्रत दीना ॥
माया वृष्टि ईश्वरी जानो । सबमें आतम एक समानो ॥
साखी-खोजो खुद समरथको, जिन किया सब फरमान ॥
पीर मुहम्मद तहाँ चलो, सोई अमर अस्थान ॥

मुहम्मद बचन

पीर मुहम्मद मुख तब मोरा । कछु नहिं चलै तुम्हारी जोरा ॥
अक्षर हुकमको मेटनहारा । चार वेद जिन कीन पसारा ॥

कबीर बचन

मुनिये सखुन मुहम्मद पीरा । हम खुद अहदी आदि कबीरा ॥
मेटो अक्षरको बिस्तारा । मेटो निरंजन सकल पसारा ॥
मेटो अंचितकी रजधानी । मेटो ब्रह्मा वेद निशानी ॥
चौदह जमको बांधि नचावों । मृत अंधा मगहर ले आवों ॥

(१२)

मुहम्मद बोध

धर्मरायते झगर पसारा । निरंजन बांधि रसातल डारा ॥
वेद कतेबको अमल मिटावों । घर घर सार शब्द फैलावों ॥
समर्थ हुकम चले सब माही । व्यापै सत्य असत्य उठिजाही ॥

मुहम्मद वचन

पीर मुहम्मद बोले वानी । अगम भेद काहू नहीं जानी ॥
सुनाकान नहीं आखिन देखा । बिन देखे को करे विवेखा ॥
जो नहीं देखो अपने नैना । कैसे मानो गुरुको वैना ॥
जो तुम खुद अहदी है आये । हुकम हजूर फरमानले आये ॥
जौन राहसे तुम चलिआवो । सोई राह मोकहैं बतलावो ॥
हँसनको अस्थान चिन्हावो । समर्थको मोहिलोक देखावो ॥
साखी-हँसनको अस्थान लखि, तब मानो परमान् ॥

जो समर्थको हुकम है, सो मेरे परवान् ॥

कबीर वचन

सुनो मुहम्मद कहों बुझाई । साहेब तुमको देऊँ बताई ॥
चले सैल को दोनो पीरा । एक मुहम्मद एक कबीरा ॥

मोकाम १

भूमिते छत्तिस सहस ऊँचाई । मानसरोवर तहाँ कहाई ॥
तहाँ नासूत आहि मोकामा । नबी कबीर पहुँच तेहि धामा ॥
तहाँ दाऊद पर्यंवर होई । जम्बूर किताब पठे तहाँ सोई ॥
तहाँ सलामालेक सोई कीना । दस्तावोस उनहु उठि लीना ॥

मोकाम

तहवाँते पुनि कीन पयाना । चौविस सहस वैकुंठ प्रमाना ॥
तहवाँ पहुँच बैठे ऋषि बासा । देव सबै बैठे तेहि पास ॥
वह वैकुंठ विष्णु अस्थाना । मलकूत मोकाम मूसाको जाना ॥
मूसा पैगम्बर पढ़ै किताबा । उसका नाम तौरैत किताबा ॥
सलामालेक तहाँ हम कीना । दस्तावोस उनहु उठि लीना ॥

बोधसागर

( १३ )

मोकाम ३

वैकुण्ठ ते आगे लायो डोरी । सुमेरते सुन्य अठारह कोरी ॥
येतो अथर सुन्य अस्थाना । जबरूत मोकाम ईसाको जाना ॥
ईसा पैगम्बर पढै किताबा । उसका नाम इंजील किताबा ॥
सलामालेक तहाँ हम कीना । दस्ता बोस उनहु उठि लीना ॥
तहँवा बैठि विस्वंबर राई । वही पीर तो वही खुदाई ॥
उहँते अथर सून्य है भाई । ताकी शोभा कही न जाई ॥

मोकाम ४

महाशून्यको लागी डोरी । ग्यारह पलैंग तहाँ ते सोरी ॥
लाहूत मोकाम कहावै सोई । जो देखे बहुते सुख होई ॥
मुस्तफा पैगंबर बैठे तहाँ । फुरकान किताब पढत थे जहाँ ॥
सलामालेक तहाँ हम कीना । दस्ताबोस उनहु उठि लीना ॥
दखत हो मुहम्मद अस्थाना । तुम बेचून कहो यही ठेकाना ॥
वारो फिरिशते सलामालेक कीना । तब हम आगेका पग दीना ॥

मोकाम ५

तहँते चले अचित ठेकाना । एक असंख्य सुन्य परमाना ॥
हाहूत मोकामको वही ठेकाना । आगे हैं सोहं बंधाना ॥

मोकाम ६

तीन असंख्य शून्य परमानी । बाहूत मोकाम सो कहो बखानी ॥
नबी कबीर चले तेहि आगे । मूल सुरति बैठे अनुरागे ॥

मोकाम ७

पांच असंख्य सुन्न विचआही । सात मोकाम कहत है ताही ॥

मोकाम ८

इच्छा सुरतिके पहुँचे द्रीपा । चार असंख्य है लोक समीपा ॥
ताको नाम राहूत मोकामा । नबी कबीर पहुँचे तेहि ठामा ॥

( १४ )

मुहम्मदबोध

मोकाम ९

तहाँते सहज द्रौप परमाना । दोय असंख तहाँते जाना ॥
ताहि मोकाम नाम आहूता । सोभा ताकी देख बहूता ॥

मोकाम १०

साखी-पहुँचे जायके लोक जहाँ, सन्त असंख दस लाख ॥
सो मोकाम जाहूतका, दस मोकाम यह भाख ॥

चौपाई

सलामा लेक तहाँ हम कीना । दस्ताबोस उनहु उठिलीना ॥
तहाँते अमरलोकको छोरा । नबी कवीर पहुँच तेहि ठौरा ॥
अमरलोकके हंस सब आये । तिनकी सोभा कही न जाये ॥
भरि भरि अंक मिले तहाँ आये । देखि मुहम्मद रहे खुलाये ॥
सब मिलि हंस गये पुनि तहाँवा । साहेब तखत पै बैठे जहाँवा ॥
जगर मगर छतर उजियारा । आम धनी का कहो बिहारा ॥
असंख भानु पुरुष उजियारा । अमरलोकको कहो विस्तारा ॥
सकल हंस तहाँ दरशन पाई । तिनकी सोभा बरनि न जाई ॥
तहाँवा जाय बंदगी कीना । नबी भये जो बहुत अधीना ॥

मुहम्मदवचन

चूक हमार बकस कर दीजै । जो तुम कहो सोई हम कीजै ॥

पुरुषवचन

कहु मुक्तामनि बेगि तुम आये । दूसर कौन सँग ले आये ॥

मुक्तामनि वचन

तब हम बचन पुरुषसे कीना । दोउ कर जोर बंदगी कीना ॥
तुम जो राज निरञ्जन दीना । तापर हुकुम अक्षरको कीना ॥
दोऊ अंश दोऊ दीन चलाये । तामें मृष्टि पकड़ि खुलाये ॥
तामैं एक सो हम ले आये । सो तो तुम्हरे कदम दिखाये ॥

बोधसागर

( १५ )

नबी मुहम्मद बन्दगी कीना । हशन पाय भये लौलीना ॥
तहाँते फिर मृत्युलोक चलि आये । निजमान कहे पानहु पाये ॥
तुम आपना कौल भरि देहो । पीछे पान जीवको पैहो ॥
साखी-शब्द भरोसे नामके, दिया नवीको पान ।
तब हम सांचे मानि हैं, जब फिर मिलोगे आन ॥

कबीरवचन--चौपाई

तुम अपने फरमान चलाई । खुद को भेद तुम धरो छिपाई ॥
जो यह भेद तुम प्रकट करिहौ । तौ तुम कौल के बाहर परिहौ ॥
चारो कलमा प्रकट भाखो । पचवाँ कलमा गुप्त जो राखो ॥
पचवाँ कलमा इल्म फकीरी । जाके पढे कुम्भ हो दूरी ॥
हम काशीको जात हैं भाई । तबलो तुम अपने कौल बजाई ॥
तुम पर दाय़ा समर्थ केरी । पाँचों कलमा दिलमें फेरी ॥
साखी-हम काशी को जात हैं, तुम मक्के अस्थान ॥
हम रामानन्द गुरु करें, तुम देओ जगत फरमान ॥
फरमान जगतको दीजिये, उलटी अदल चलाय ॥
तुम कलमाका हुक्म ले, निर्भय निशान बजाय ॥

इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदास संवादे मुहम्मद

बोध वर्णनोनाम नवमस्तरंगः

अथ ग्रन्थसागर

★

यद्यपि साधारणतः देखनेमें यह ग्रंथ भी मुसलमानी धर्म के प्रवर्तक मुहम्मदको कबीर साहिबके बोध देनेका देख पड़ता है तथापि इसका भी अर्थ आध्यात्मिक है क्यों कि, मुहम्मद साहब के जीवन चरित्र में लिखा है कि इनके माता पिता

( १६ )

मुहम्मद बोध

दोनोंही ईश्वरबिमुख मूर्तिपूजक थे उन्हींसे उनकी उत्पत्ति हुई थी । इसका आशय यह है कि, प्रकृतिपुरुष जब संसारमुख होते हैं तब ही अन्तःकरण विशिष्ट होकर चैतन्य जीव नाम धारी होता है । अर्थात् मुहम्मदसे आशय है अन्तःकरण विशिष्ट चैतन्य अर्थात् जीवसे ॥

फिर मुहम्मद साहबके उत्पन्न होते ही उनकी माताकी मृत्यु होगयी थी और पिता तो प्रथमही मर चुका था इस कारण उनके जन्म लेनेके पश्चात् उनकी फूफूने उनका पोषण पालन किया था उसीने अपने गोद में उन्हे लिया था इसका आशय यह है कि, जब जीव अन्तःकरण विशिष्ट होता है तब पुरुष प्रकृतिका तो अभाव होजाता है अर्थात् स्वरूप विस्मृति होती है और देहकी प्राप्ति होती है और देहही द्वारा अन्तःकरण बड़ा होता है ।

आगे चल कर मुहम्मदसाहबने चौदह विवाह किये हैं सो जीवका चौदह इन्द्रियों के साथ अहंभाव करना है ।

आगे चल कर चालीस वर्षकी अवस्थामें मुहम्मद साहबको पैगम्बरी मिली है सो जब यह जीव पाँच ज्ञानेन्द्री, पाँच कर्मेन्द्री पच्चीस प्रकृति और पंचप्राणका विचार करके उससे आपको अलग जानने लगता है तब यह मोक्षअधिकारी होता है यही पैगम्बरी मिलना है ।

पैगम्बरी मिलने पर मुहम्मद साहबने जिहाद करके काफिरों को मारना आरम्भ किया था । और काफिरोंके उत्पन्न करने पर मक्का छोड़कर मदीनाको गये थे । सो जब यह जीव अधिकारी होकर विषयमुख इन्द्रियों को साहिव मुख होनेके लिये उनका निरोध करता है तब इन्द्रियाँ बहुत उत्पात मचाती हैं तब जीव प्रवृत्तिरूप मक्कानगरको छोड़कर निवृत्तिरूप मदीनामें जाता है ।

बोध सागर

(१७)

अर्थात् प्रवृत्तिसे उदासीन होकर निवृत्ति को धारण करता है। और आसुरी सम्पत्ति रूप काफिरों को दैवी सम्पत्ति रूप फौज की सहायतासे मारता है।

इससे भी आगे बढ़कर मुहम्मद साहब मेआराज को जाते हैं। इस मेआराजके विषयमें अनेक मत भेद हैं। जिनका वर्णन स्वामी प्रमानन्दजीने कबीरमन्शूरमें बहुत उत्तम रीतिसे किया है पाठकोंके जाननेके लिये उर्दू कबीर मन्शूरसे अनुवाद करके यहाँ लिखताहूँ। स्वामी प्रमानन्दजीने प्रमाणके लिये मुसलमानी किताबोंके अरबी प्रमाण दिये हैं किन्तु उन प्रमाणोंका हिन्दी पाठकों को कुछ उपयोग न होनेसे केवल उनका आशय दिखा दिया है।

मुहम्मद साहबके हमेआराजका वर्णन

मुहम्मद साहबके मेआराजके विषयमें मुसलमानोंका भिन्न २ मत है। जो उनके हदीस और किताबोंसे प्रगट है।

तारीख मुहम्मदी में लिखा है कि, जब मुहम्मद साहबको पैगम्बरी करते बारह वर्ष बीत गये अर्थात् उनकी बावन वर्षकी अवस्था हुई तब एक रातको-जिबराईल और मेकाईल जो फिरिस्तों के मुखियों में से हैं मुहम्मद साहब के पास आये और उनका साना (कलेजा) चीर कर उसमें से सब पाप और बुरे संकल्पों को धोकर शुद्ध कर दिया और जब उनका हृदय (अंतःकरण) शुद्ध होगया तब उन्हें एक ऐसे जानवर पर जिसका शिर तो मनुष्योंका था और नीचेका धड विच्छी के समान था सवार कराकर खुदाके पास लेगये जिबराईल ने तो रिकाब और मेकाईलने उसका बाग पकड़ा। इस प्रकारसे वह रवाना हुए। चलते २ वे सबसे पहले बैतअकसा अर्थात् बड़े हैकल अर्थात् एक बड़े भारी वृत्तके निकट पहुँचे। वहाँ बहुतसे फिरिश्ते

(१८)

मुहम्मद बोध

मुहम्मद साहबको प्रणाम करनेको आये जहाँ वह बुराक बाँधकर जब भीतर गये तब वहाँ सब पैगम्बरोंकी आत्मा को देखा। फिरा एक सीढ़ी आकाशसे उतरी अरबी भाषामें जिसे मेसआराज कहते हैं फिर मुहम्मद साहब बुराकपर सवार होकर उस सीढ़ी के मार्ग से ऊपर को चढ़े। जब प्रथम आकाश पर पहुँचे तब वहाँका द्वार जिबराईल ने खुलवाया और सब भीतर गये। भीतर पहुँचने पर देखा कि, हजरत आदम बै हुए हैं और उनके बाई ओर नरकका द्वार खुला हुआ है और दहिनी ओर स्वर्गका। नरककी ओर देख कर हजरत आदम रोते हैं और स्वर्ग की ओर देखकर हँसते हैं। इस प्रकार से प्रत्येक आकाश पर होते हुए जिबराईल मुहम्मद साहब को जब सदरह के द्वार पर ले गये तब वहाँसे जिबराईल पीछे हो लिये। आगे चल कर एक सुनहले पर्व के निकट पहुँच कर जिबराईल ने कहा कि इससे आगे हम नहीं जा सकते आप स्वयम् जाइये। फिर वहाँ से मुहम्मद साहब ने अकेले सत्तर मंजिल पार किया। सत्तर पर्व पार होकर बुराक भी ठहर गया और वहाँ से एक पक्षी जिसे जफ जफ कहते हैं आया और उस पर चढ़ कर मुहम्मद साहब खुदाके पास गये और वहाँ उन्हों ने खुदा से बहुत कुछ वार्तालाप किया और अपने धर्मके सब नियम उनको वहाँहीसे मिले जिसको लेकर वह लौट कर अपने स्थान पर चले आये। इस स्थान पर लिखा है कि यह सब बातें इतनी जलदी हुई थीं कि, मुहम्मद साहेब के बुराक पर सवार होकर जाते समय एक कटोराको धक्का लगा था जो पानी से भरा हुआ था। सो धक्का लगतेही वह टेढ़ा हो गया था। मुहम्मद साहेब इतनी जल्दी लौटकर आये कि उस कटोरे का पानी अभीतक गिरने नहीं पाया था और

बोधसागर

( ११ )

उसको उन्होंने आकर सीधा करके शेष पानी को गिरने से बचाया । किन्तु ऊपरोक्त सत्तर पदों जिनको मुहम्मद साहबने अकेलेही पार किया था उनमें से एक २ की दूरी इतनी थी कि, पाँचसौ वर्ष तक वेग पूर्वक चलने से पूरा होता था ऐसे सत्तर पदों को मुहम्मद साहब ने पार किया । और इधर लौट कर आने पर क्षण मात्रा से अधिक समय नहीं लगा । मुसलमानी धर्मते इसी वृत्तान्त को मुहम्मद साहबका मेआराज होना कहते हैं । इसी विषयमें मुसलमानी धर्मके बडे २ पण्डितोंमें बहुत मतभेद है । कोई तो कहता है कि, मुहम्मद साहबने स्वप्न देखा था, कोई कहता है केवल संकरूप से वहाँ पहुँचे थे, कोई कहता है केवल प्रथम भूमिका (बैतुलअकसा) तक गये थे, कोई कहता है कि, अन्तरहृष्टिसे मुहम्मदसाहेब वहाँ पहुँचे, कोई कहता है केवल जिबराईलको देखा खुदाको नहीं देखा, कोई कहता है पाँच-भौतिक शरीर सहितही मुहम्मद साहेब आसमानपर गये और इसी प्रत्यक्षकी हृष्टिसे खुदाको देखा । विस्तार भयसे अधिक मतभेदका लिखना छोड़कर यथार्थ आशयकी ओर झुकता हूँ ।

पैगम्बरी मिलनेके बारहवें वर्षके पश्चात् मुहम्मदसाहबको मेआराज हुआ था उसका आशय है कि, जब मुमुक्षु श्रवण मनन निदिध्यासन द्वारा बारह महावाक्यका विचार कर लेता है तब यह मोक्ष का अधिकारी होता है । और ५२ वर्षसे आशय है ५२ अक्षरसे सो जब यह ५२ अक्षर के वृत्त से बाहर होता है अर्थात् शब्द जालसे निकलता है तब इसको सच्चे सद्गुरु की शरणकी प्राप्ति होती है । जहाँ शुद्ध बुद्धि रूप जिबराईल जो शुद्ध सतोषुण से प्राप्त होती है और शुद्ध संतोष रूप में कार्दल जो रजोगुण की शुद्धता से मिलता है इसके साथ

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मुहम्मदबोध

होता है । और तमोगुण की शुद्धता से उत्पन्न हुए शौर्य ( धीरता ) रूप बुराकपर सवार होकर गुरुकी शिक्षा द्वारा यह ज्ञान की भूमिकाओंको पूर्ण करता हुआ यथार्थ पद को प्राप्त होता है । और यथार्थ पदको प्राप्त होकर जीवन मुक्त अवस्था से अन्य जीवों को उपदेश देकर काल जालसे छुडाता है ।

इस मुहम्मद बोध ग्रन्थ के यथार्थ आशय को पारखी आत्मविद गुरु अधिकार प्रति अनेक रूपकों में समझाते हैं और इसको आध्यात्मिकही अर्थ से ग्रहण करने के लिये दश मुकामी रेखताका भी प्रमाण है । सो यहाँ दशमुकामी रेखता लिख देता हूँ ।

दशमुकामी रेखता

चला जब लोकको शाक सब त्यागिया हंसको रूप सतगुरु बनायी । भृगु ज्यों कीटको पलटि भृङ्गै किया आप समरङ्ग दै ले उड़ायी । छोडि नासूत मलकूतको पहुंचिया विष्णुकी ठाकुरी दीख जायी । इन्द्र कुबेर जहाँ रंभको नृत्य है देव तेतीस कोटि रहायी ॥ १ ॥ छोडि वैकुंठको हंस आगे चला शून्यमें ज्योति जगमग गायी । ज्योति परकाशमें निरखि निस्तत्त्वको आप निर्भय हुआ भय मिटायी । अलख निर्गुण जेहि वेद स्तुति करै तिनहूँ देव को हैं पिताई । भगवान तिनके परे श्वेत मूरति धरे भागको आन तिनको रहायी ॥ २ ॥ चार मुकाम पर खंड सोरह कहै अंडको छोर ह्यां ते रहायी । अंडके परे स्थान अचित को निरखिया हंस जब उहाँ जायी । सहस औ द्वादशै रुह है सङ्गमें करत कछोल अनहद बजायी तासुके बदनकी कौन महिमा कहौं भासती देह अति नूर छायी ॥ ३ ॥ महल कंचन बने मणिक तामें जडे बैठ तहै कलश अखंड छोजै । अचितके

बाधसागर

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परे स्थान सोहंका हंस छत्तीस तहँवा विराजै । नूरका महल
और नूरकी भूमि है तहाँ आनन्द सो द्रन्द्व भाजै । करत कल्लोल
बहु भाँतिसे संग यक हंस सोहंगके समाजै ॥ ४ ॥ हंस जब
जात षट् चक्रको वेधिके सातमुखकाममें नजर फेरा । सोहंगके
परे सुरति इच्छा कहीं सहसवामन जहँ हंस हेरा । रूपकी राशिते
रूप उनको बना नहीं उपमा इन्दु जौनिवेरा । सुरतिसे भेटिकै
शब्दको टेकि चढ़ि देखि मुखकाम अंकूर केरा ॥ ५ ॥ शून्यके
बीचमें विमल वैकुण्ठ जहाँ सहज अस्थान है गैव केरा । नवो
मुखकाम यह हंस जब पहुँचिया पलक विलंब ह्राँ कियो डेरा ।
तहाँसे डोरि मकरतार ज्यों लागिया ताहि चढ़ि हंस गो दै
दरेरा ॥ भये आनन्दसे फंद सब छोडिया पहुँचिया जहाँ सत्य-
लोक मेरा ॥ ६ ॥ हंसिनी हंस सब गाय बजायकै साजिकै कलश
वहि लेन आये । युगन युग बीछुरे मिले तुम आहकै प्रेम करि
अङ्गसो अँग लाये । पुरुषने दर्श जब दीन्हिया हंसको तपनी बहु
जनमकी तब नशाये । पलटिकै रूप जब एकसे कीन्हिया मनहुँ
तब भानु षोडश उगाये ॥ ७ ॥ पुहुपके द्वीप पीयूष भोजन करै
शब्दकी देह जब हंस पायी पुहुपके सेहरा हंस औ हंसिनी
सच्चिदानन्द शिर छत्रछायी । दिपैं बहु दामिनी दमक बहु
भाँति की जहाँ घन शब्दको घमंड लायी । लगे जहाँ वरषने
गरज घन घोरिकै उठत तहँ शब्द धुनि अति सोहायी ॥ ८ ॥
सुन सोह हंस तहँ यूथके यूथ है एकही नूर यक रङ्ग रागै ।
करत विहार मन भामिनी मुक्तिमें कर्म औ भर्म सब दूरि भागै ।
रङ्ग और भूप कोइ परखि आवै नहीं करत कल्लोल बहु भाँति
पागे । काम औ क्रोध मद लोभ अभिमान सब छोड़ि पाखण्ड
सत शब्द लागे ॥ ९ ॥ पुरुषके वदनकी कौन महिमा कहौँ

( २२ )

मुहम्मदबोध

जगत्में ऊपमाय कछु नाहिं पायी । चन्द्र औ सूर गण ज्योति
लगै नहीं एकही नक्ख परकाश भाई । पान परवान जिन
बंशका पाइया पहुँचिया पुरुषके लोक जायी । कहैं कब्बीर
यहि भांति सो पाइहौ सत्य की राह सो प्रकट गायी ॥ १० ॥

देह नासूत स्वरे मलकूत और जीव जवरूतको रुह बखानै ॥
अरबी में लाहूत कहै जेहि निराकार मानिके मंजिल ठानै ॥
आगे हाहूत लाहूत है बाहूत खुद खाविन्द जाहूत जानै ॥
सोई श्री राम पन्नाइ सबै जग नाहि पन्नाह यह अता गानै ॥

इस प्रकारसे सत्यके खोजियोंको तो ऐसे ग्रन्थोंका आध्या-
त्मिक अर्थही ग्रहण करने योग्य है । और स्थूल अर्थ तो स्थूल
बुद्धिवाले पक्षपातियोंके लिये ही छोड देना उचित है ।

इति

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