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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 752

(१२)

मुहम्मद बोध

धर्मरायते झगर पसारा । निरंजन बांधि रसातल डारा ॥
वेद कतेबको अमल मिटावों । घर घर सार शब्द फैलावों ॥
समर्थ हुकम चले सब माही । व्यापै सत्य असत्य उठिजाही ॥

मुहम्मद वचन

पीर मुहम्मद बोले वानी । अगम भेद काहू नहीं जानी ॥
सुनाकान नहीं आखिन देखा । बिन देखे को करे विवेखा ॥
जो नहीं देखो अपने नैना । कैसे मानो गुरुको वैना ॥
जो तुम खुद अहदी है आये । हुकम हजूर फरमानले आये ॥
जौन राहसे तुम चलिआवो । सोई राह मोकहैं बतलावो ॥
हँसनको अस्थान चिन्हावो । समर्थको मोहिलोक देखावो ॥
साखी-हँसनको अस्थान लखि, तब मानो परमान् ॥

जो समर्थको हुकम है, सो मेरे परवान् ॥

कबीर वचन

सुनो मुहम्मद कहों बुझाई । साहेब तुमको देऊँ बताई ॥
चले सैल को दोनो पीरा । एक मुहम्मद एक कबीरा ॥

मोकाम १

भूमिते छत्तिस सहस ऊँचाई । मानसरोवर तहाँ कहाई ॥
तहाँ नासूत आहि मोकामा । नबी कबीर पहुँच तेहि धामा ॥
तहाँ दाऊद पर्यंवर होई । जम्बूर किताब पठे तहाँ सोई ॥
तहाँ सलामालेक सोई कीना । दस्तावोस उनहु उठि लीना ॥

मोकाम

तहवाँते पुनि कीन पयाना । चौविस सहस वैकुंठ प्रमाना ॥
तहवाँ पहुँच बैठे ऋषि बासा । देव सबै बैठे तेहि पास ॥
वह वैकुंठ विष्णु अस्थाना । मलकूत मोकाम मूसाको जाना ॥
मूसा पैगम्बर पढ़ै किताबा । उसका नाम तौरैत किताबा ॥
सलामालेक तहाँ हम कीना । दस्तावोस उनहु उठि लीना ॥