कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबाधसागर
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परे स्थान सोहंका हंस छत्तीस तहँवा विराजै । नूरका महल
और नूरकी भूमि है तहाँ आनन्द सो द्रन्द्व भाजै । करत कल्लोल
बहु भाँतिसे संग यक हंस सोहंगके समाजै ॥ ४ ॥ हंस जब
जात षट् चक्रको वेधिके सातमुखकाममें नजर फेरा । सोहंगके
परे सुरति इच्छा कहीं सहसवामन जहँ हंस हेरा । रूपकी राशिते
रूप उनको बना नहीं उपमा इन्दु जौनिवेरा । सुरतिसे भेटिकै
शब्दको टेकि चढ़ि देखि मुखकाम अंकूर केरा ॥ ५ ॥ शून्यके
बीचमें विमल वैकुण्ठ जहाँ सहज अस्थान है गैव केरा । नवो
मुखकाम यह हंस जब पहुँचिया पलक विलंब ह्राँ कियो डेरा ।
तहाँसे डोरि मकरतार ज्यों लागिया ताहि चढ़ि हंस गो दै
दरेरा ॥ भये आनन्दसे फंद सब छोडिया पहुँचिया जहाँ सत्य-
लोक मेरा ॥ ६ ॥ हंसिनी हंस सब गाय बजायकै साजिकै कलश
वहि लेन आये । युगन युग बीछुरे मिले तुम आहकै प्रेम करि
अङ्गसो अँग लाये । पुरुषने दर्श जब दीन्हिया हंसको तपनी बहु
जनमकी तब नशाये । पलटिकै रूप जब एकसे कीन्हिया मनहुँ
तब भानु षोडश उगाये ॥ ७ ॥ पुहुपके द्वीप पीयूष भोजन करै
शब्दकी देह जब हंस पायी पुहुपके सेहरा हंस औ हंसिनी
सच्चिदानन्द शिर छत्रछायी । दिपैं बहु दामिनी दमक बहु
भाँति की जहाँ घन शब्दको घमंड लायी । लगे जहाँ वरषने
गरज घन घोरिकै उठत तहँ शब्द धुनि अति सोहायी ॥ ८ ॥
सुन सोह हंस तहँ यूथके यूथ है एकही नूर यक रङ्ग रागै ।
करत विहार मन भामिनी मुक्तिमें कर्म औ भर्म सब दूरि भागै ।
रङ्ग और भूप कोइ परखि आवै नहीं करत कल्लोल बहु भाँति
पागे । काम औ क्रोध मद लोभ अभिमान सब छोड़ि पाखण्ड
सत शब्द लागे ॥ ९ ॥ पुरुषके वदनकी कौन महिमा कहौँ