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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 747

बोधसागर

(७)

साखी-खोजत खोजत खोजियाँ, हुवा सो गूना गून ॥
खोजत खोजत ना मिला, तब हार कहा बेचून ॥
बेचून जग राँचिया, साई नूर निनार ॥
आखिर केरे वक्त में, किसकी करो दिदार ॥

रमैनी

तुम लाहूंत रचे हो भाई । अगम गम्य तुम कैसे पाई ॥
यह तो एक आदि विसरामा । आगे पाँच आदि निज धामा ॥
तहँते हम फरमाँ ले आये । सब बदफेलको अमल मिटाये ॥
उन फरमान जो हमको दीना । तिनका नाम बेचून तुम लीना ॥
साखी-साहब का घर दूर है, जासु असल फरमान ॥
उनको कहो जो पीर तुम, सोह अमर अस्थान ॥

मुहम्मद वचन-रमैनी

कहै मुहम्मद सुनो कवीरा । तुम कैसे पायो अस्थीरा ॥
लाहूत मेटि जो अगम बतायो । खुद खुदाय हमहूँ नहिं पायो ॥
हम जानें खुद आपै आही । तुम कुदरत कर थापो ताही ॥
हम तो अर्श हाजिरी आयो । तुम तो कुदरतसे ठहराये ॥
तुम्हरे कहे भरम मोहि आयो । खुद खुदाय तुम दूर बतायो ॥
आप सुनाओ खुदकी बानी । आलम दुनियाँ कहो बखानी ॥
लाहूत मुकाम हम निजकर जाना । सो तो तुम कुदरत कर ठाना ॥
हलकी मुलकी बासरी भाई । तीन हुकम अछा फरमाई ॥
साखी-साई सुरशिद पीर है, साँचा जिस फरमान ॥
हलकी मुलकी बासरी, तीन हुकुम कर मान ॥

कबीर वचन-रमैनी

सुनो मुहम्मद कहूं खुदवाणी । खुद खोदायकी कहूं निशानी ॥
कादिर थे तब कुदरत नाही । कुदरत थी कादिरके माहीं ॥