कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १० )
मुहम्मदबोध
चार मोकाम किताब है चारी । पंचये नाम अर्चित सँवारी ॥
तहँते आइ रूह बारह हजारी । तहाँ अर्चित गुप्त व्योहारी ॥
साखी-पीर औलिया था किया, यह सब उरले तीर ॥
समरथ का घर दूर है, तिनको खोजो पीर ॥
❁ मारफत
चौपाई
औवलमोकाम नासूत ठेकाना । दुजामोकाममलकूतजोजाना ॥
सेउम मोकाम जबरूत ठेकाना । चहारूममोकामलाहूतजोजाना ॥
पंचये मोकामहाहूत अस्थाना । छठे मोकाम सोहं जो माना ॥
हफतुम मोकाम बानी अस्थाना । अठये मोकाम अंकूर ठेकाना ॥
नवये मुकाम आहूत निशानी । दसये मोकाम पुरुषरजधानी ॥
बेतुक
औवल शरी अत् १ । तरीकत् २ । हकीकत् ३ । मारफत् ४ ।
मरोवत् ५ । ध्यान दोरहिअत् ६ । जुलफकार चन्द्र गेटा ७ ।
हुकुमसुरतद ८ । देयना कासो यही अत् ९ । सचपावेसमरथकाय
१० । अंकार ओंकार कलिमा नवी सजुपावै देखा हद् बैहद्
मुहम्मद वर्चन
तुम कब्बीर भेद अधिकाये । खुद समरथकी खबरि जो ल्याये ॥
अब तुमको हम बूझैं अत् । सो कहिये खुद अहदी संत् ॥
को तुम आहु केहांते आये । क्यों तुम अपने बर्ण छिपाये ॥
सात सुरति समरथ निरमाई । यह अस्थान रहो की जाई ॥
यती मारफत कहु दुरवेशा । हम मानैं तुमरो उपदेशा ॥
सात सुरति केहि माहि समाई । जिव बोधे सो कह चलिजाई ॥
समरथ गम तुमु साँच कबीरा । समरथ भेद कहो मति धीरा ॥
- इस विषय में लिखे हुये मुकामों का वर्णन पुस्तकके अन्तमें देखो ।