छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
About this granth
The Chandogya Upanishad (छान्दोग्योपनिषद्) is an ancient and extensive Upanishad of the Samaveda. The preface to this Gita Press edition places it within the Talavakara Brahmana of the Samaveda, the same branch as the Kena Upanishad, which is why the two share a peace invocation. Its eight chapters set out spiritual knowledge together with the meditations and rites connected with it.
Famous passages include the meditation on Om as the udgitha, the Shandilya vidya, the stories of Satyakama Jabala and Raikva, the doctrine of the five fires, Uddalaka Aruni's teaching 'tat tvam asi' to his son Shvetaketu, the dialogue of Sanatkumara and Narada on the infinite (bhuma), the meditation on the small space in the heart, and the tale of Indra and Virochana learning about the Self from Prajapati. Many of the Brahma Sutras rest on these passages.
This is volume three of the Gita Press, Gorakhpur Upanishad-bhashya series (book code 582), giving the text, Shankara's commentary and a Hindi translation of both. Its imprint records 32,000 copies printed between Samvat 1993 and 2050 and an eighth edition of 5,000 in Samvat 2052. It has 978 pages.
एकादश खण्ड
जलकी अपेक्षा तेजकी प्रधानता
तेजो वावाद्भ्यो भूयस्तद्वा एतद्वायुमागृह्याकाश-
मभितपति तदाहुर्निशोचति नितपति वर्षिष्यति वा
इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाथापः सृजते तदेतदूर्ध्वा-
भिश्च तिरश्चीभिश्च विद्युद्भिराह्रादाश्चरन्ति तस्मा-
दाहुर्विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा इति तेज एव
तत्पूर्वं दर्शयित्वाथापः सृजते तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥
तेज ही जलकी अपेक्षा उत्कृष्टतर है। वह यह तेज जिस समय वायुको निश्चल कर आकाशको सब ओरसे तप्त करता है उस समय लोग कहते हैं—'गर्मी हो रही है, बड़ा ताप है, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज ही पहले अपनेको उद्भूत हुआ दिखलाकर फिर जलकी उत्पत्ति करता है। वह यह तेज ही वर्षाका हेतु है। जब ऊर्ध्वगामी और तिर्यग्गामी विद्युत्के सहित गड़गड़ाहटके शब्द फैल जाते हैं, तब उससे प्रभावित होकर लोग कहते हैं—'बिजली चमकती है, बादल गर्जता है, वर्षा होगी।' इस प्रकार तेज ही पहले अपनेको प्रदर्शित कर फिर जलको उत्पन्न करता है। अतः तेजकी उपासना करो ॥ १ ॥
| तेजो वावाद्भ्यो भूयः, तेजसोऽप्कारणत्वात् । कथ-मप्कारणत्वम् ? इत्याह— यस्मादब्योनिस्तेजस्तस्मा-त्तद्वा एतत्तेजो वायुमा- | तेज ही जलकी अपेक्षा उत्कृष्टतर है, क्योंकि तेज जलका कारण है। वह जलका कारण किस प्रकार है ? यह बतलाते हैं—क्योंकि तेज जलका कारण है इसलिये वह यह |
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७५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७
| ७५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७ |
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| गृह्णावष्टभ्य स्वात्मना निश्चलीकृत्य वायुमाकाशमभितपत्याकाशमभिव्याप्तवत्तपति यदा तदाहुर्लौकिका निशोचति सन्तपति सामान्येन जगन्नितपति देहानतो वर्षिष्यति वा इति । प्रसिद्धं हि लोके कारणमभ्युद्यतं दृष्टवतः कार्यं भविष्यतीति विज्ञानम् । तेज एव तत्पूर्वमात्मानमुद्भूतं दर्शयित्वाथानन्तरमपः सृजतेऽतोऽप्स्रष्टृत्वादूढ्योऽद्भ्यस्तेजः । | तेज जिस समय वायुको आगृहीत—आश्रित कर अर्थात् अपनेद्वारा वायुको निश्चल कर आकाशको अभितप्त करता है—आकाशको सब ओरसे व्याप्त करके संतप्त करता है उस समय लौकिक पुरुष कहते हैं—'जगत् सामान्यरूपसे संतप्त हो रहा है, देहोंमें अत्यन्त ताप है; अतः वर्षा होगी। कारणको अभ्युदित हुआ देखनेवालोंको ऐसी बुद्धि होना कि 'कार्य होगा' लोकमें प्रसिद्ध ही है। [इस प्रकार] तेज ही पहले अपनेको उद्भूत हुआ दिखलाकर फिर उसके पश्चात् जल उत्पन्न कर देता है। इस प्रकार जलका स्रष्टा होनेके कारण जलकी अपेक्षा तेज उत्कृष्टतर है। |
| किञ्चान्यत्तदेतत्तेज एव स्तनयित्नुरूपेण वर्षहेतुर्भवति । कथम् ? ऊर्ध्वाभिश्चोर्ध्वगाभिर्विद्युद्भिस्तिरश्चीभिश्च तिर्यग्गताभिश्च सहाह्रादाः स्तनयनशब्दाश्चरन्ति । तस्मात्तद्दर्शनादाहुर्लौकिका विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा | इसके सिवा [दूसरे प्रकारसे भी] तेज ही बिजलीके रूपमें वर्षाका हेतु होता है। किस प्रकार—ऊर्ध्वा—ऊर्ध्वगामिनी और तिरश्ची—तिर्यग्गामिनी बिजलियोंके सहित 'आह्राद'—गड़गड़ाहटके शब्द फैल जाते हैं; अतः ऐसा देखकर लौकिक पुरुष कहते हैं—'बिजली चमकती है, बादल गर्जता है, वर्षा, होगी' इत्यादि |
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५७
| इत्याद्युक्तार्थम् । अतस्तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥ | वाक्यका अर्थ ऊपर कहा जा चुका है।<br><br>अतः तुम तेजकी उपासना करो ॥ १ ॥ |
स यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्ते तेजस्वी वै स तेजस्वतो लोकान्भास्वतोऽपहततमस्कानभिसिध्यति यावत्तेजसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति । यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवस्तेजसो भूय इति तेजसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
वह जो कि तेजकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है वह तेजस्वी होकर तेजःसम्पन्न, प्रकाशमान और तमोहीन लोकोंको प्राप्त करता है। जहाँतक तेजकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि तेजकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] भगवन् ! क्या तेजसे भी बढ़कर कुछ है ?' [सनत्कुमार—] 'तेजसे बढ़कर भी है ही।' [नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ २ ॥
| तस्य तेजस उपासनफलं तेजस्वी वै भवति । तेजस्वत एव च लोकान्भास्वतः प्रकाशवतोऽपहततमस्कान्वा ह्याध्यात्मिकाज्ञानाद्यपनीततमस्कानभिसिध्यति । ऋज्वर्थमन्यत् ॥ २ ॥ | उस तेजकी उपासनाका फल—वह निश्चय तेजस्वी हो जाता है तथा जो तेजःसम्पन्न ही लोक हैं उन भास्वान्—प्रकाशवान् और अपहततमस्क—बाह्य— [रात्रि आदि] और आध्यात्मिक—अज्ञानादि ऐसे अन्धकारोंसे रहित लोकोंको प्राप्त कर लेता है। शेष सबका अर्थ सरल है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥
द्वादश खण्ड
-: ० :-
तेजसे आकाशकी प्रधानता
आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निराकाशेनाह्वयत्याकाशेन शृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
आकाश ही तेजसे बढ़कर है । आकाशमें ही सूर्य, चन्द्र ये दोनों तथा विद्युत्, नक्षत्र और अग्नि स्थित हैं । आकाशके द्वारा ही एक-दूसरेको पुकारते हैं, आकाशसे ही सुनते हैं, आकाशसे ही प्रतिश्रवण करते हैं, आकाशमें ही रमण करते हैं, आकाशमें ही रमण नहीं करते, आकाशमें ही [ सब पदार्थ ] उत्पन्न होते हैं और आकाशकी ओर ही [सब जीव एवं अङ्कुरादि] बढ़ते हैं । तुम आकाशकी उपासना करो ॥ १ ॥
| आकाशो वाव तेजसो भूयान् । वायुसहितस्य तेजसः कारणत्वाद्व्योम्नो वायुमागृह्येति तेजसा सहोक्तो वायुरिति पृथगिह नोक्तस्तेजसः । कारणं हि लोके कार्याद्भूयो दृष्टम् । यथा घटादिभ्यो मृत्तथाकाशो वायु- | आकाश ही तेजसे बढ़कर है, क्योंकि आकाश वायुसहित तेजका कारण है ‘वायुमागृह्य’ ऐसा कहकर वायुका तेजके साथ वर्णन किया जा चुका है, इसलिये यहाँ तेजसे अलग उसका पृथक् उल्लेख नहीं किया गया। लोकमें कार्यकी अपेक्षा कारण ही उत्कृष्ट देखा गया है, जिस प्रकार कि घटादिकी अपेक्षा मृत्तिका। इसी प्रकार आकाश वायु- |
[खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ ७५९
| शाङ्करभाष्यम् | शाङ्करभाष्यार्थ |
|---|---|
| सहितस्य तेजसः कारणमिति ततो भूयान् । कथम् ? आकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ तेजोरूपौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निश्च तेजोरूपाण्याकाशेऽन्तः । यच्च यस्यान्र्तवर्ति तदल्पं भूय इतरत् ।<br><br>किञ्चाकाशेनाह्वयति चान्यमन्य आहूतश्चेतर आकाशेन शृणोत्यन्योक्तं च शब्दमन्यः प्रतिशृणोत्याकाशे रमते क्रीडत्यन्योन्यं सर्वस्तस्तथा न रमते चाकाशे वध्वादिवियोग आकाशे जायते न मूर्ते नावष्टब्धे । तथाकाशमभिलक्ष्याङ्कुरादि जायते न प्रतिलोमम् । अत आकाशमुपास्स्व ॥ १ ॥ | सहित तेजका कारण है, इसलिये उससे बड़ा है। किस प्रकार बड़ा है—आकाशमें ही तेजःस्वरूप सूर्य और चन्द्रमा—ये दोनों हैं तथा आकाशके भीतर ही तेजोमय विद्युत्, नक्षत्र और अग्नि हैं। जो जिसके भीतर होता है वह छोटा होता है और दूसरा उससे बड़ा होता है।<br><br>इसके सिवा आकाशसे ही एक व्यक्ति दूसरेको पुकारता है; किसीके द्वारा पुकारे जानेपर आकाशसे ही दूसरा पुरुष श्रवण करता है तथा दूसरेके कहे हुए शब्दको आकाशके द्वारा ही अन्य पुरुष श्रवण करता है। सब लोग आकाशमें ही एक दूसरेके साथ रमण—क्रीडा करते हैं और स्त्री *आदिका वियोग हो जानेपर आकाशमें ही (खेदका अनुभव करते हुए) रमण नहीं करते। आकाशमें ही जीव उत्पन्न होता है, मूर्त पदार्थमें या अवरुद्ध स्थानमें नहीं तथा आकाशको लक्ष्य करके ही अङ्कुरादि उत्पन्न होते हैं, विपरीत दशामें नहीं। इसलिये तुम आकाशकी उपासना करो ॥ १ ॥ |
* 'स्त्री आदि' शब्दसे यहाँ सम्पूर्ण भोग्य वस्तुएँ उपलक्षित हैं। तात्पर्य यह है कि भोग्य पदार्थके प्राप्त होनेपर जो आनन्द होता है उसका भोग आकाशमें ही होता है और उसका वियोग होनेपर जो खेद होता है उसकी अनुभूति भी आकाशमें ही होती है।
७६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७
७६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७
स य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्त आकाशवतो वै स लोकान्प्रकाशवतोऽसम्बाधानुरुगायवतोऽभिसिध्यति यावदाकाशस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आकाशाद्भूय इत्याकाशाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
वह जो कि आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है वह आकाशवान्, प्रकाशवान्, पीड़ारहित और विस्तारवाले लोकोंको प्राप्त करता है। जहाँतक आकाशकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन् ! क्या आकाशसे बढ़कर भी कुछ है?' [ सनत्कुमार—] 'आकाशसे बढ़कर भी है ही।' [ नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ २ ॥
| फलं शृण्वाकाशवतो वै विस्तारयुक्तान् स विद्वाँल्लोकान् प्रकाशवतः प्रकाशाकाशयोर्नित्यसम्बन्धात्प्रकाशवतश्च लोकान् सम्बाधान् सम्बाधनं सम्बाधः सम्बाधोऽन्योऽन्यपीडा तद्रहितानसम्बाधानुरुगायवतो विस्तीर्णगतीन्विस्तीर्णप्रचाराँल्लोकानभिसिध्यति। यावदाकाशस्येत्याद्युक्तार्थम् ॥ २ ॥ | [ इसका ] फल सुनो—वह विद्वान् आकाशवान् यानी विस्तारयुक्त लोकोंको तथा 'प्रकाशवान्'—क्योंकि प्रकाश और आकाशका नित्य सम्बन्ध है अतः प्रकाशयुक्त लोकोंको, 'असम्बाध'—सम्बाधनका नाम सम्बाध और सम्बाध परस्परकी पीड़ाको कहते हैं, उससे रहित असम्बाध और 'उरुगायवान्'—विस्तीर्ण गतिवाले अर्थात् विस्तृत प्रचारवाले लोकोंको प्राप्त होता है। 'यावदाकाशस्य' आदि वाक्यका अर्थ पहले कहे हुएके समान है ॥२॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१२॥
त्रयोदश खण्ड
आकाशकी अपेक्षा स्मरणका महत्त्व
स्मरो वावाकाशाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि बहव आसीरन्न स्मरन्तो नैव ते कञ्चन शृणुयुर्न मन्वीरन्न विजानीरन्यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन्स्मरेण वै पुत्रान्विजानाति स्मरेण पशून्स्मरमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
स्मर (स्मरण) ही आकाशसे बढ़कर है। इसीसे यद्यपि बहुत-से लोग [एक स्थानपर] बैठे हों तो भी स्मरण न करनेपर वे न कुछ सुन सकते हैं, न मनन कर सकते हैं और न जान ही सकते हैं। जिस समय वे स्मरण करते हैं उसी समय सुन सकते हैं, उसी समय मनन कर सकते हैं और उसी समय जान सकते हैं। स्मरण करनेसे ही पुरुष पुत्रोंको पहचानता है और स्मरणसे ही पशुओंको। तुम स्मरकी उपासना करो ॥ १ ॥
| स्मरो वावाकाशाद्भूयः । स्मरणं स्मरोऽन्तःकरणधर्मः । स आकाशाद्भूयानिति द्रष्टव्यं लिङ्गव्यत्ययेन । स्मर्तुः स्मरणे हि सत्याकाशादि सर्वमर्थवत्, स्मरणवतो | स्मर ही आकाशसे बढ़कर है। स्मरणका नाम 'स्मर' है, यह अन्तःकरणका धर्म है। वह आकाशकी अपेक्षा 'भूयान्' (बढ़कर) है—ऐसा लिङ्गपरिवर्तन करके* समझना चाहिये। स्मरण करनेवालेकी स्मृति होनेपर ही आकाशादि सब सार्थक |
※ मूल श्रुति में 'भूयः' यह नपुंसकलिंग है। किंतु 'स्मर' शब्द पुल्लिंग है, अतः उसका विशेषण होनेके कारण 'भूयः' के स्थानमें 'भूयान्' ऐसा पुँल्लिङ्ग पाठ कर लेना चाहिये।
७६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| भोग्यत्वात् । असति तु स्मरणे सदप्यसदेव, सत्त्वकार्याभावात् । नापि सत्त्वं स्मृत्यभावे शक्यमाकाशादीनामवगन्तुमित्यतः स्मरणस्याकाशाद्भूयस्त्वम् । <br><br> दृश्यते हि लोके स्मरणस्य भूयस्त्वं यस्मात्, तस्माद्यद्यपि समुदिता बहव एकस्मिन्नासीरन्नुपविशेयुः, ते तत्रासीना अन्योन्यभाषितमपि न स्मरन्तश्चेत्स्युः, नैव ते कञ्चन शब्दं शृणुयुः, तथा न मन्वीरन्, मन्तव्यं चेत्स्मरेयुस्तदा मन्वीरन्, स्मृत्यभावान्न मन्वीरन्; तथा न विजानीरन् । यदा वाव ते स्मरेयुर्मन्तव्यं विज्ञातव्यं श्रोतव्यं च, अथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन् । तथा स्मरेण वै—मम पुत्रा एते—इति पुत्रान्विजानाति, स्मरेण पशून् । अतो | होते हैं, क्योंकि वे स्मृतिमान्के ही योग्य हैं । स्मृतिके न होनेपर तो विद्यमान वस्तु भी अविद्यमान ही है, क्योंकि उसकी सत्ताके कार्यका अभाव है । स्मृतिका अभाव होनेपर आकाशादिकी सत्ताका ज्ञान भी नहीं हो सकता । इसीसे स्मरणकी आकाशसे उत्कृष्टता है । <br><br> क्योंकि लोकमें स्मृतिकी उत्कृष्टता देखी जाती है, इसलिये यद्यपि बहुत-से लोग एक स्थानपर बैठे हों वे एक-दूसरेसे भाषण करते हुए भी, यदि स्मृतियुक्त नहीं होते तो कोई शब्द श्रवण नहीं कर सकते । इसी प्रकार मनन भी नहीं कर सकते । यदि वे मन्तव्य विषयका स्मरण करते तो मनन कर सकते थे, अतः स्मृतिका अभाव होनेके कारण मनन भी नहीं कर सकते और न जान ही सकते हैं । जिस समय वे मन्तव्य, विज्ञातव्य अथवा श्रोतव्य विषयका स्मरण करते हैं तभी उसे सुन सकते, मनन कर सकते और जान सकते हैं । इसी प्रकार स्मरण करनेसे ही 'ये मेरे पुत्र हैं' इस प्रकार पुत्रोंको जानते हैं और स्मरणसे ही पशुओंको । |
| खण्ड ११] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७६३ |
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| भूयस्त्वात्स्मरमुपास्स्वेति ॥१॥ | अतः उत्कृष्ट होनेके कारण तुम स्मरणकी उपासना करो ॥ १ ॥ |
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</div>स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत्स्मरस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः स्मराद्भूय इति स्मराद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
वह जो कि स्मरकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है, उसकी जहाँतक स्मरकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि स्मरकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । [ नारद—] 'भगवन् ! क्या स्मरसे भी श्रेष्ठ कुछ है ?' [ सनत्कुमार—] 'स्मरसे भी श्रेष्ठ है ही।' [ नारद—] 'भगवान् मेरे प्रति उसका वर्णन करें' ॥२॥
| उक्तार्थमन्यत् ॥२॥ | शेष सबका अर्थ पूर्वोक्तके समान है ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१३॥
चतुर्दश खण्ड
—: ० :—
स्मरणसे आशाकी महत्ता
आशा वाव स्मराद्भूयस्याशेद्धो वै स्मरो मन्त्रानधीते कर्माणि कुरुते पुत्रांश्च पशूूंश्चेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छत आशामुपास्स्वेति ॥ १ ॥
आशा ही स्मरणकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। आशासे दीप्त हुआ स्मरण ही मन्त्रोंका पाठ करता है, कर्म करता है, पुत्र और पशुओंकी इच्छा करता है तथा इस लोक और परलोककी कामना करता है। तुम आशाकी उपासना करो ॥ १ ॥
| आशा वाव स्मराद्भूयसी।<br><br>आशाप्राप्तवस्त्वाकाङ्क्षा, आशा तृष्णा काम इति यामाहुः पर्यायैः, सा च स्मराद्भूयसी।<br><br>कथम् ? आशया ह्यन्तःकरणस्थया स्मरति स्मर्तव्यम्। आशाविषयरूपं स्मरन्नसौ स्मरो भवत्यत आशेद्ध, आशयाभिवर्धितः स्मरभूतः स्मरन्नृगादीन्मन्त्रान- | आशा ही स्मरणसे बढ़कर है।<br><br>आशा--अप्राप्त वस्तुकी इच्छाका नाम आशा है; जिसका तृष्णा और काम इन पर्याय शब्दोंसे भी निरूपण किया जाता है। वह स्मरकी अपेक्षा बढ़कर है।<br><br>सो किस प्रकार ?—अन्तःकरणमें स्थित हुई आशासे ही मनुष्य स्मरणीय विषयका स्मरण करता है। आशाके विषयके रूपका स्मरण करनेसे यह स्मृतिको प्राप्त होता है। अतः आशासे दीप्त---आशासे वृद्धिको प्राप्त हुआ स्मृतिभूत वह स्मरण करता हुआ ऋगादि मन्त्रोंका |
खण्ड १४]
शाङ्करभाष्यार्थ
७६५
| धीतेऽधीत्य च तदर्थं ब्राह्मणेभ्यो विधींश्च श्रुत्वा कर्माणि कुरुते तत्फलाशयैव पुत्रांश्च पशूंश्च कर्मफलभूतानिच्छतेऽमिवाञ्छत्याशयैव तत्साधनान्यनुतिष्ठति । इमं च लोकमाशेद्ध एव स्मरँल्लोकसंग्रहहेतुभिरिच्छते । अमुं च लोकमाशेद्धः स्मरंस्तत्साधनानुष्ठानेनेच्छतेऽत आशारशनावबद्धं स्मराकाशादि नामपर्यन्तं जगच्चक्रीभूतं प्रतिप्राणि । अत आशायाः स्मरादपि भूयस्त्वमित्यत आशामुपास्स्व ॥ १ ॥ | अध्ययन करता है तथा उनका अध्ययन कर और ब्राह्मणोंके मुखसे उनका अर्थ एवं विधि श्रवण कर उनके फलकी आशासे ही कर्म करता है तथा कर्मके फलभूत पुत्र और पशुओंकी इच्छा-कामना करता है एवं आशासे ही उनके साधनोंका अनुष्ठान करता है। आशासे समृद्ध हुआ ही वह लोकसंग्रहरूप हेतुओंसे इस लोकका स्मरण करता हुआ इसको इच्छा करता है तथा आशासे समृद्ध हुआ ही वह परलोककी, उसके साधनोंका अनुष्ठान करते हुए इच्छा करता है । इस प्रकार आशारूप रस्सीसे बँधा हुआ यह स्मर एवं आकाशसे लेकर नामपर्यन्त जगत् प्रत्येक प्राणीमें चक्रकी भाँति घूम रहा है। इसलिये आशा स्मरकी अपेक्षा भी उत्कृष्ट है; अतः तुम आशाकी उपासना करो ॥ १ ॥ |
स य आशां ब्रह्मेत्युपास्त आशायास्य सर्वे कामाः समृध्यन्त्यमोघा हास्याशिषो भवन्ति यावदाशाया गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आशां ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आशाया भूय इत्याशाया वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवन्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
७६६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७
७६६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७
वह जो कि आशाको 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसकी सब कामनाएँ आशासे समृद्ध होती हैं । उसकी प्रार्थनाएँ सफल होती हैं । जहाँतक आशाकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि आशाकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या आशासे बढ़कर भी कुछ है ?' [ सनत्कुमार— ] 'आशासे बढ़कर भी है ही।' [ नारद— ] 'भगवान् मुझे वह बतलावें' ॥ २ ॥
| यस्त्वाशां ब्रह्मेत्युपास्ते शृणु तस्य फलम् । आशया सदोपासितयास्योपासकस्य सर्वे कामाः समृध्यन्ति समृद्धिं गच्छन्ति । अमोघा हास्याशिषः प्रार्थनाः सर्वा भवन्ति यत्प्रार्थितं सर्वं तदवश्यं भवतीत्यर्थः । यावदाशाया गतमित्यादि पूर्ववत् ॥२॥ | जो पुरुष आशाकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसका फल श्रवण करो । सर्वदा उपासना की हुई आशासे उसके उपासककी सब कामनाएँ समृद्ध अर्थात् उन्नतिको प्राप्त हो जाती हैं और उसकी सब आशा-प्रार्थनाएँ सफल होती हैं । तात्पर्य यह है कि जो कुछ उसका प्रार्थित होता है वह अवश्य सिद्ध होता है । 'यावदाशाया गतम्'इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥
पञ्चदश खण्ड
आशासे प्राणका प्राधान्य
| नामोपक्रममाशान्तं कार्य-कारणत्वेन निमित्तनैमित्तिकत्वेन चोत्तरोत्तरभूयस्तयावस्थितं स्मृतिनिमित्तसद्भावमाशारशनापाशैर्विपाशितं सर्वं सर्वतो बिसमिव तन्तुभिर्यस्मिन्प्राणे समर्पितम्, येन च सर्वतोव्यापिनान्तर्बहिर्गतेन सूत्रे मणिगणा इव सूत्रेण ग्रथितं विधृतं च स एषः— | नामसे लेकर आशापर्यन्त जो कार्यकारण एवं निमित्त-नैमित्तिक रूपसे उत्तरोत्तर बढ़कर स्थित है तथा जिसका सद्भाव स्मृतिके निमित्त-रूपसे सिद्ध होता है उस आशारूप जालसे तन्तुसे कमलनालके समान सब ओरसे जकड़ा हुआ यह सम्पूर्ण जगत् जिस प्राणमें समर्पित है तथा बाहर-भीतर व्याप्त हुए जिस सर्वगत सूत्र (प्राण) के द्वारा सूतमें मणियों [मनकों] के समान यह सब गूँथा हुआ और विधृत है। वह यह— |
प्राणो वा आशाया भूयान्यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन्प्राणे सर्वँसमर्पितम्। प्राणःप्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति। प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥ १ ॥
प्राण ही आशासे बढ़कर है। जिस प्रकार रथचक्रकी नाभिमें अरे समर्पित रहते हैं उसी प्रकार इस प्राणमें सारा जगत् समर्पित है। प्राण प्राण (अपनी शक्ति) के द्वारा गमन करता है; प्राण प्राणको देता है और प्राणके लिये ही देता है। प्राण ही पिता है; प्राण
७६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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माता है, प्राण भाई है, प्राण बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है ॥ १ ॥
| प्राणो वा आशाया भूयान्<br><br>कथमस्य भूयस्त्वम् ? इत्याह दृष्टान्तेन समर्थयंस्तद्भूयस्त्वम्—यथा वै लोके रथचक्रस्यारा रथनाभौ समर्पिताः सम्प्रोताः सम्प्रवेशिता इत्येतत्; एवमस्मिँल्लिङ्गसङ्घातरूपे प्राणे प्रज्ञात्मनि दैहिके मुख्ये यस्मिन् परा देवता नामरूपव्याकरणायादर्शादौ प्रतिबिम्बवज्जीवेनात्मनानुप्रविष्टा । यश्च महाराजस्येव सर्वाधिकारीश्वरस्य । "कस्मिन्न्वहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति स प्राणमसृजत" [प्र० उ० ६ । ३] इति श्रुतेः । यस्तु च्छायेवानुगत ईश्वरम्, "तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पितो | प्राण ही आशासे बढ़कर है। इसकी उत्कृष्टता किस प्रकार है ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर दृष्टान्तद्वारा उसकी उत्कृष्टताका समर्थन करते हुए [सनत्कुमारजी-] कहते हैं—लोकमें जिस प्रकार रथके पहियेके अरे रथकी नाभिमें समर्पित-सम्प्रोत अर्थात् सम्यक् प्रकारसे प्रवेशित रहते हैं उसी प्रकार लिङ्ग संघातस्वरूप¹ इस प्राण यानी प्रज्ञात्मामें² अर्थात् दैहिक मुख्य प्राणमें, जिसमें कि परादेवताने नामरूपकी अभिव्यक्ति करनेके लिये दर्पणादिमें प्रतिबिम्बके समान जीवरूपसे प्रवेश किया है, जो महाराजके सर्वाधिकार के समान ईश्वरका सर्वाधिकारी है, जैसा कि "किसके उत्क्रमण करनेपर मैं उत्क्रमण करूँगा तथा किसके स्थित होनेपर स्थित होऊँगा—ऐसा ईक्षण करके उसने प्राणकी रचना की" इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है तथा जो छायाके समान ईश्वरका अनुगामी |
१—व्यष्टिलिंगदेहोंका समुदायरूप समष्टिसूत्रात्मा।
२—उपाधि प्राण और उपाधिमान् आत्माको एकता मानकर यह विशेषण दिया गया है।
खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थं ७६९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः स एष प्राण एव प्रज्ञात्मा" (कौ०उ० ३।८) इति कौषीतकिनाम् । अत एवमस्मिन्प्राणे सर्वं यथोक्तं समर्पितम् ।<br><br>अतः स एष प्राणोऽपरतन्त्रः प्राणेन स्वशक्त्यैव याति नान्यकृतं गमनादिक्रियास्वस्य सामर्थ्यमित्यर्थः । सर्वं क्रियाकारकफलभेदजातं प्राण एव न प्राणाद्बहिर्भूतमस्तीति प्रकरणार्थः । प्राणः प्राणं ददाति । यद्ददाति तत्स्वात्मभूतमेव । यस्मै ददाति तदपि प्राणायैव । अतः पित्राद्याख्योऽपि प्राण एव ॥ १ ॥ | है, जैसा कि कौषीतकी ब्राह्मणोपनिषद्की श्रुति है कि “जिस प्रकार रथके अरोंमें नेमि अर्पित है और रथकी नाभिमें अरे अर्पित हैं इसी प्रकार यह भूतमात्रा प्रज्ञामात्रामें अर्पित हैं और प्रज्ञामात्रा प्राणमें अर्पित है । वह यह प्राण ही प्रज्ञात्मा है ।” इसीसे इस प्राणमें ही उपर्युक्त सब समर्पित हैं ।<br><br>अतः वह यह परतन्त्र प्राण प्राणसे अर्थात् अपनी शक्तिसे ही गमन करता है । तात्पर्य यह है कि गमनादि क्रियाओंमें जो इसका सामर्थ्य है वह किसी अन्यके कारण नहीं है । सम्पूर्ण क्रिया, कारक और फलरूप भेदसमुदाय प्राण ही है, प्राणसे बाहर इनमें कोई नहीं है—ऐसा इस प्रकरणका तात्पर्य है । प्राण प्राण ( शक्ति ) प्रदान करता है; वह जो कुछ देता है उसका स्वात्मभूत ही है, जिसे देता है वह दान भी प्राणके लिये ही होता है । अतः पितृ आदि नामवाला भी प्राण ही है ॥ १ ॥ |
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</div>७७० | छान्दोग्योपनिषत् | [ अध्याय ७
| ७७० | छान्दोग्योपनिषत् | [ अध्याय ७ |
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| कथं पित्रादिशब्दानां प्रसिद्धार्थोत्सर्गेण प्राणविषयत्वमिति उच्यते । सति प्राणे पित्रादिषु पित्रादिशब्दप्रयोगात्तदुत्क्रान्तौ च प्रयोगाभावात् । कथं तत् ? इत्याह— | 'पितृ' आदि शब्दोंके प्रसिद्ध अर्थका त्याग करके उनका प्राणविषयक होना कैसे सम्भव है ! ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता है-- क्योंकि प्राण रहनेपर ही पिता आदिके लिये 'पितृ' आदि शब्दका प्रयोग किया जाता है, उसके उत्क्रमण करनेपर इस प्रकारका प्रयोग भी नहीं होता । किस प्रकार है ? यह बतलाते हैं— |
स यदि पितरं वा मातरं वा भ्रातरं वा स्वसारं वाचार्यं वा ब्राह्मणं वा किञ्चिद्भृशमिव प्रत्याह धिक्त्वास्त्वित्येवैनमाहुः पितृहा वै त्वमसि मातृहा वै त्वमसि भ्रातृहा वै त्वमसि स्वसृहा वै त्वमस्याचार्यहा वै त्वमसि ब्राह्मणहा वै त्वमसीति ॥ २ ॥
यदि कोई पुरुष अपने पिता, माता, भ्राता, भगिनी, आचार्य अथवा ब्राह्मणके लिये कोई अनुचित बात कहता है तो [ उसके समीपवर्ती लोग ] उससे कहते हैं—'तुझे धिक्कार है, तू निश्चय ही पिताका हनन करनेवाला है, तू तो माताका वध करनेवाला है, तू तो भाईको मारनेवाला है, तू तो बहिनकी हत्या करनेवाला है, तू तो आचार्यका घात करनेवाला है, तू निश्चय ही ब्रह्मघाती है' ॥ २ ॥
| स यः कश्चित्पित्रादीनामन्यतमं यदि तं भृशमिव तदननुरूपमिव किञ्चिद्वचनं त्वङ्कारा- | जो कोई कि पिता आदिमेंसे किसीके प्रति यदि कोई 'भृशमिव'--उनके अननुरूप कोई त्वंकारादि (अरे-तू आदि) से युक्त वचन बोलता |
खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थ ७७१
| दियुक्तं प्रत्याह तदैनं पार्श्वस्था आहुर्विवेकिनो धिक्त्वास्तु धिगस्तु त्वामित्येवम्। पितृहा वै त्वं पितुर्हन्तेत्यादि ॥ २ ॥ | है तो उसके समीपवर्ती विचारशील लोग उससे 'धिक्त्वास्तु'—तुझे धिक्कार है—ऐसा कहते हैं। 'तू निश्चय ही पितृहा—पिताका हनन करनेवाला है' इत्यादि ॥ २ ॥ |
अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणाञ्छूलेन समासं व्यतिषंदहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहासीति न मातृहासीति न भ्रातृहासीति न स्वसृहासीति नाचार्यहासीति न ब्राह्मणहासीति ॥ ३ ॥
किंतु जिनके प्राण उत्क्रमण कर गये हैं उन पिता आदिको यदि वह शूलसे एकत्रित और छिन्न-भिन्न करके जला दे तो भी उससे 'तू पितृहा है' 'तू मातृहा है' 'तू भ्रातृहा है' 'तू बहिनकी हत्या करनेवाला है' 'तू आचार्यका घात करनेवाला है' अथवा 'तू ब्रह्मघाती है' ऐसा कुछ नहीं कहते ॥ ३ ॥
| अथैनानेवोत्क्रान्तप्राणांस्त्यक्तदेहानथ यद्यपि शूलेन समासं समस्य व्यतिषन्दहेद्यत्यस्य सन्दहेदेवमप्यतिक्रूरं कर्म समास-व्यासादिप्रकारेण दहनलक्षणं तद्देहसम्बद्धमेव कुर्वाणं नैवैनं ब्रूयुः पितृहेत्यादि। तस्मादन्वयव्यतिरेकाभ्यामवगम्यत एतत्पित्राद्याख्योऽपि प्राण एवेति ॥ ३॥ | किंतु प्राण निकल जानेपर—देहका त्याग कर देनेपर इन्हींको यदि वह शूलसे समास—एकत्रित करके व्यतिषन्दहन करे अर्थात् छिन्न-भिन्न करके जलावे; उनके देहसे सम्बद्ध समास-व्यासादि क्रमसे दहन करारूप ऐसा अत्यन्त क्रूर कर्म करनेपर भी उससे 'तू पितृहा है' इत्यादि नहीं कहते। अतः अन्वय-व्यतिरेकसे यह ज्ञात होता है कि यह पिता आदि नाम-वाला भी प्राण ही है ॥ ३ ॥ |
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छा० उ० २५—
७७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
७७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| तस्मात्— | अतः— |
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प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत ॥४॥
प्राण ही ये सब [ पिता आदि ] हैं । वह जो इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार चिन्तन करनेवाला और इस प्रकार जाननेवाला है अतिवादी होता है । उससे यदि कोई कहे कि, 'तू अतिवादी है' तो उसे यही कहना चाहिये कि 'हाँ, अतिवादी हूँ', उसे छिपाना नहीं चाहिये ॥४॥
| प्राणो ह्येवैतानि पित्रादीनि सर्वाणि भवति चलानि स्थिराणि च। स वा एष प्राणविदेवं यथोक्तप्रकारेण पश्यन्फलतोऽनुभवन्नेवं मन्वान उपपत्तिभिश्चिन्तयन्नेवं विजानन्नुपपत्तिभिः संयोज्यैवमेवेति निश्चयं कुर्वन्नित्यर्थः । मननविज्ञानाभ्यां हि सम्भूतः शास्त्रार्थो निश्चितो दृष्टो भवेत् । अत एवं पश्यन्नतिवादी भवति नामाद्याशान्तमतीत्य वदनशीलो भवतीत्यर्थः । | प्राण ही ये सब चर और अचर पिता आदि हैं । वह यह प्राणवेत्ता इस प्रकार उपर्युक्त रीतिसे देखता हुआ अर्थात् फलतः अनुभव करता हुआ¹, इस प्रकार मनन करता हुआ अर्थात् युक्तियोंद्वारा चिन्तन करता हुआ और इस प्रकार जानता हुआ यानी उपपत्तियोंसे संयुक्त करके 'यह ऐसा ही है' इस प्रकार निश्चय करता हुआ, क्योंकि मनन और विज्ञानके द्वारा निष्पन्न हुआ शास्त्रका अर्थ निश्चित देखा जाता है; अतः इस प्रकार देखता हुआ वह अतिवादी होता है; तात्पर्य यह है कि उसका नामसे लेकर आशापर्यन्त सम्पूर्ण तत्त्वोंका अतिक्रमण करके बोलनेका स्वभाव होता है। |
१. यानी स्वरूपतः साक्षात्कार करता हुआ।
खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थे ७७३
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| तं चेद्ब्रूयुस्तं यद्येवमतिवादिनं सर्वदा सर्वैः शब्दैर्नामाद्याशान्तमतीत्य वर्तमानं प्राणमेव वदन्त्येवं पश्यन्तमतिवदनशीलमतिवादिनं ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य हि जगतः प्राण आत्माहमिति ब्रुवाणं यदि ब्रूयुरतिवाद्यसीति । बाढमतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत । कस्माद्ध्यसावपह्नुवीत यत्प्राणं सर्वेश्वरमयमहमस्मीत्यात्मत्वेनोपगतः ॥ ४ ॥ | उससे यदि कहें, अर्थात इस प्रकार अतिवदन करनेवाले यानी जो ऐसा देखता है कि सब लोग सर्वदा सम्पूर्ण शब्दोंद्वारा नामसे लेकर आशापर्यन्त तत्त्वोंका अतिक्रमण करके स्थित हुए प्राणका ही वर्णन करते हैं उस अतिवदनशील अतिवादीसे, जो 'मैं ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्का प्राण यानी आत्मा हूँ' ऐसा कहनेवाला है, यदि कहें कि 'तू अतिवादी है' तो उसे यही कहना चाहिये कि 'हाँ, मैं अतिवादी हूँ' उसे छिपाना नहीं चाहिये। जो सर्वेश्वर प्राणको 'यह मैं हूँ' इस प्रकार आत्मभावसे प्राप्त हो गया है वह किस प्रकार उस (अतिवादित्व) को छिपावेगा ? [ अर्थात् उसके लिये अपने अतिवादित्वको छिपानेका कोई प्रयोजन नहीं है ] ॥ ४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥
षोडश खण्ड
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सत्य ही जानने योग्य है
| स एष नारदः सर्वातिशयं प्राणं स्वमात्मानं सर्वात्मानं श्रुत्वा नातः परमस्तीत्युपरराम । न पूर्ववत्किमस्ति भगवः प्राणाद्भूय इति पप्रच्छयतः । तमेवं विकारानृतब्रह्मविज्ञानेन परितुष्टमकृतार्थं परमार्थसत्यातिवादिनमात्मानं मन्यमानं योग्यं शिष्यं मिथ्याग्रहविशेषाद्विप्रच्यावयन्नाह भगवान्सनत्कुमारः । एष तु वा अतिवदति यमहं वक्ष्यामि न प्राणविद्वतिवादी परमार्थतः । नामाद्यपेक्षं तु तस्यातिवादित्वम् । यस्तु भूमाख्यं सर्वातिक्रान्तं तत्त्वं परमार्थसत्यं वेद सोऽतिवादीत्यत आह— | वे नारदजी सबसे उत्कृष्ट अपने आत्मा प्राणको ही सर्वात्मा सुनकर यह समझकर कि इससे परे और कुछ नहीं है, शान्त हो गये, क्योंकि पूर्ववत् उन्होंने ऐसा प्रश्न नहीं किया कि 'भगवन् ! प्राणसे बढ़कर क्या है ?' इस प्रकार विकाररूप मिथ्या ब्रह्मके ज्ञानसे संतुष्ट हुए, अकृतार्थ तथा अपनेको परमार्थसत्यातिवादी माननेवाले उस योग्य शिष्यको उस मिथ्याग्रहविशेषसे च्युत करते हुए, भगवान् सनत्कुमारने कहा—'मैं जिसका आगे वर्णन करूँगा वही अतिवदन करता है, परमार्थतः प्राणवेत्ता अतिवादी नहीं है । उसका अतिवादित्व तो नामादिकी अपेक्षासे ही है । किंतु अतिवादी तो वही है जो भूमासंज्ञक सर्वातीत परमार्थसत्य तत्त्वको जानता है ।' इसी आशयसे वे कहते हैं— |
एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानोति सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सत्यं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥