Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

७२२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

Page 726Permalink
७२२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

और न अमनोज्ञका ही ज्ञान हो सकता। वाणी ही इन सबका ज्ञान कराती है; अतः तुम वाक्‌की उपासना करो ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
वाग्वाव । वागितीन्द्रियं जिह्वामूलादिष्वष्टसु स्थानेषु स्थितं वर्णानामभिव्यञ्जकम् । वर्णाश्च नामेति नाम्नो वाग्भूयसीत्युच्यते । कार्याद्धि कारणं दृष्टं लोके यथा पुत्रात्पिता तद्वत् ।<br><br>कथं च वाङ्नाम्नो भूयसी ? इत्याह—वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयत्ययम्ऋग्वेद इति । तथा यजुर्वेदमित्यादि समानम् । हृदयज्ञं हृदयप्रियम् । तद्विपरीतमहृदयज्ञम् । यद्यदि वाङ्नाभविष्यद्धर्मादि न व्यज्ञापयिष्यद्वागभावेऽध्ययनाभावोऽध्ययनाभावे तदर्थश्रवणाभावस्तच्छ्रवणाभावे धर्मादि'वाग्वाव'—वाक् यह जिह्वामूल आदि* आठ स्थानोंमें स्थित वर्णोंको अभिव्यक्त करनेवाली इन्द्रिय है। वर्ण ही नाम हैं, इसीसे यह कहा जाता है कि नामसे वाक् उत्कृष्ट है। जिस प्रकार पुत्रसे पिता उत्कृष्ट होता है उसी प्रकार लोकमें कार्यसे ही कारणकी उत्कृष्टता देखी जाती है।<br><br>नामकी अपेक्षा वाक् क्यों उत्कृष्ट है सो बतलाते हैं—वाक् ही ऋग्वेदको 'यह ऋग्वेद है' इस प्रकार विज्ञापित करती है। इसी प्रकार यजुर्वेद इत्यादिको भी—ये सब पूर्ववत् समझने चाहिये। तथा हृदयज्ञ—हृदयको प्रिय और उससे विपरीत अहृदयज्ञको भी [ वाक् ही विज्ञापित करती है ]। यदि वाक् न होती तो धर्मादि विज्ञापित न होते। वाक्‌के अभावमें अध्ययनका अभाव हो जाता, अध्ययनके अभावमें उसके अर्थश्रवणका अभाव होता और उसके श्रवणके अभावमें धर्मादिका विज्ञान न

* आदि शब्दसे यहाँ वक्षःस्थल, कण्ठ, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका और तालु--इन सात स्थानोंका ग्रहण होता है।

Page 727Permalink

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७२३


न व्यज्ञापयिष्यन्न विज्ञातमभविष्यदित्यर्थः । तस्माद्वागेवैतच्छब्दोच्चारणेन सर्वं विज्ञापयत्यतो भूयसी वाङ्नाम्नस्तस्माद्वाचं ब्रह्मेत्युपास्स्व ॥ १ ॥होता अर्थात् धर्मादि विज्ञात न होते । अतः शब्दोच्चारणके द्वारा वाक् ही इन सबको विज्ञापित करती है । अतः वाक् नामसे उत्कृष्ट है, अतः तुम वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करो ॥ १ ॥

—: ० :—

स यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्वाचो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो वाचो भूय इति वाचो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥

वह जो वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसकी जहाँतक वाणीकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या वाणीसे भी बढ़कर कुछ है ?' [सनत्कुमार—] 'वाणीसे भी बढ़कर है ही।' [ नारद— ] 'भगवन् ! वह मुझे बतलाइये' ॥२॥

समानमन्यत् ॥ २ ॥शेष व्याख्या पूर्ववत् है ॥ २ ॥

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ॥

—: ० :—

Page 728Permalink

तृतीय खण्ड

—: ० :—

वाक् की अपेक्षा मनकी श्रेष्ठता

मनो वाव वाचो भूयो यथा वै द्वे वामलके द्वे वा कोले द्वौ वाक्षौ मुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नाम च मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते कर्माणि कुर्वीयेत्यथ कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेत्यथेच्छते मनो ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म मन उपास्स्वेति ॥१॥

मन ही वाणीसे उत्कृष्ट है। जिस प्रकार दो आँवले, दो बेर अथवा दो बहेड़े मुट्ठीमें आ जाते हैं उसी प्रकार वाक् और नामका मनमें अन्तर्भाव हो जाता है। यह पुरुष जिस समय मनसे विचार करता है कि 'मन्त्रोंका पाठ करूँ' तभी पाठ करता है, जिस समय सोचता है 'काम करूँ' तभी काम करता है, जब विचारता है 'पुत्र और पशुओंकी इच्छा करूँ' तभी उनकी इच्छा करता है और जब ऐसा संकल्प करता है कि 'इस लोक और परलोककी कामना करूँ' तभी उनकी कामना करता है। मन ही आत्मा है, मन ही लोक है और मन ही ब्रह्म है; तुम मनकी उपासना करो ॥ १ ॥

मनो मनस्यनविशिष्टमन्तःकरणं वाचो भूयः। तद्धि मनस्यनव्यापारवद्वाचं वक्तव्ये प्रेरयति। तेन वाङ्मनस्यन्तर्भवति। यच्च यस्मिन्नन्तर्भवति तत्तस्यमन—मननशक्तिविशिष्ट अन्तःकरण वाणीसे उत्कृष्ट है। वह मननव्यापारयुक्त मन ही वाणीको वक्तव्य विषयमें प्रेरित करता है। अतः वाक् मनके अन्तर्गत है, और जो जिसके अन्तर्गत होता है,
Page 729Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७२५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
व्यापकत्वात्ततो भूयो भवति । यथा वै लोके द्वे वामलके फले द्वे वा कोले बदरफले द्वौ वाक्षौ बिभीतकफले मुष्टिरनुभवति मुष्टिस्ते फले व्याप्नोति मुष्टौ हि ते अन्तर्भवतः । एवं वाचं च नाम चामलकादिवन्मनोऽनुभवति ।उसकी अपेक्षा वह व्यापक होनेके कारण, बड़ा होता है । लोकमें जिस प्रकार दो आँवलों; दो कोलों—बेरों अथवा दो अक्षों—बहेड़ेके फलों—को मुट्ठी अनुभव करती है—उन फलोंको मुट्ठी व्याप्त कर लेती है अर्थात् वे मुट्ठीके अन्तर्गत हो जाते हैं, उसी प्रकार उन आँवले आदिके समान वाणी और नाम—इन दोनोंको मन अनुभव करता है ।
स यदा पुरुषो यस्मिन्काले मनसान्तःकरणेन मनस्यति मनस्यनं विवक्षाबुद्धिः कथम् ? मन्त्रानधीयीयोच्चारयेयमित्येवं विवक्षां कृत्वाथाधीते तथा कर्माणि कुर्वीयेति चिकीर्षाबुद्धिं कृत्वाथ कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छेयेति प्राप्तीच्छां कृत्वा तत्प्राप्त्युपायानुष्ठानेनाथेच्छते पुत्रादीन्प्राप्नोतीत्यर्थः । तथेमं च लोकममुं चोपायेनेच्छेयेतिवह (यह) पुरुष जब—जिस समय मन-अन्तःकरणसे मनस्यन (कुछ कहनेकी इच्छा) करता है, मनस्यन-का अर्थ है विवक्षा-बुद्धि (कुछ कहनेकी इच्छा या विचार) किस प्रकार ? यह बताते हैं—'मैं मन्त्रोंका पाठ—उच्चारण करूँ,' इस प्रकार बोलनेकी इच्छा करके वह पाठ करता है; 'मैं कर्म करूँ,' ऐसी चिकीर्षाबुद्धि करके कर्म करता है; तथा 'मैं पुत्र और पशुओंकी इच्छा करूँ,' इस प्रकार उनकी प्राप्तिकी इच्छा करके उनकी प्राप्तिके उपायका अनुष्ठान कर उनकी इच्छा करता है अर्थात् उन पुत्रादिको प्राप्त कर लेता है । इसी प्रकार 'मैं इस लोक और परलोक-को उपायद्वारा [ प्राप्त करना ]