छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
२५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| तथामृतानाममृतानि वेदा ह्यमृताः नित्यत्वात्, तेषामेतानि रोहितादीनि रूपाण्यमृतानि । रसानां रसा इत्यादि कर्मस्तुतिरेषा—यस्यैवंविशिष्टान्यमृतानि फलमिति ॥ ४ ॥ | तथा ये अमृर्तोंके भी अमृत हैं, क्योंकि वेद ही नित्य होनेके कारण अमृत हैं, उनके भी ये रोहितादि रूप अमृत हैं । 'रसानां रसाः' (रसोंके रस) इत्यादि वाक्य कर्मकी स्तुति है; अर्थात् इस वाक्यका ऐसा तात्पर्य है कि जिस रसरूप कर्मके ऐसे अमृतरूप फल हैं [उसके माहात्म्यका कहाँतक वर्णन किया जाय ?] ॥ ४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥
षष्ठ खण्ड
वसुओंके जीवनाश्रयभूत प्रथम अमृतकी उपासना
तद्यत्प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १॥
इनमें जो पहला अमृत है, उससे वसुगण अग्निप्रधान होकर जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते ही हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| तत्तत्र यत्प्रथमममृतं रोहितरूपलक्षणं तद्वसवः प्रातःसवनेशाना उपजीवन्त्यग्निना मुखेनाग्निना प्रधानभूतेनाग्निप्रधानाः सन्त उपजीवन्तीत्यर्थः। अन्नाद्यं रसोऽजायतेतिवचनात्कवलग्राहमश्नन्तीति प्राप्तम्, तत्प्रतिषिध्यते न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्तीति। <br><br> कथं तर्ह्युपजीवन्ति ? इत्युच्यते— <br><br> एतदेव हि यथोक्तममृतं रोहितं रूपं दृष्ट्वोपलभ्य सर्वकरणैरनुभूय | वहाँ इनमें जो रोहितरूपवाला पहला अमृत है उसके उपजीवी प्रातःसवनाधिकारी वसुगण हैं। वे अग्निमुखसे—प्रधानभूत अग्निसे अर्थात् अग्निप्रधान होकर इसके उपजीवी होते हैं। 'अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ' इस वाक्यसे सिद्ध होता है कि वे उसे एक-एक ग्रास लेकर खाते हैं। इसीका 'देवगण न तो खाते हैं और न पीते ही हैं'—इस वाक्यद्वारा प्रतिषेध किया जाता है। <br><br> तो फिर वे किस प्रकार उसके उपजीवी होते हैं ? ऐसा प्रश्न होने-पर कहा जाता है—वे इस उपर्युक्त अमृत अर्थात् रोहितरूपको देखकर—उपलब्ध कर यानी समस्त इन्द्रियों-से इसका अनुभव कर तृप्त हो जाते |