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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 776 of 978

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Page 776

७७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७


तस्मात्—अतः—

प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत ॥४॥

प्राण ही ये सब [ पिता आदि ] हैं । वह जो इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार चिन्तन करनेवाला और इस प्रकार जाननेवाला है अतिवादी होता है । उससे यदि कोई कहे कि, 'तू अतिवादी है' तो उसे यही कहना चाहिये कि 'हाँ, अतिवादी हूँ', उसे छिपाना नहीं चाहिये ॥४॥

| प्राणो ह्येवैतानि पित्रादीनि सर्वाणि भवति चलानि स्थिराणि च। स वा एष प्राणविदेवं यथोक्तप्रकारेण पश्यन्फलतोऽनुभवन्नेवं मन्वान उपपत्तिभिश्चिन्तयन्नेवं विजानन्नुपपत्तिभिः संयोज्यैवमेवेति निश्चयं कुर्वन्नित्यर्थः । मननविज्ञानाभ्यां हि सम्भूतः शास्त्रार्थो निश्चितो दृष्टो भवेत् । अत एवं पश्यन्नतिवादी भवति नामाद्याशान्तमतीत्य वदनशीलो भवतीत्यर्थः । | प्राण ही ये सब चर और अचर पिता आदि हैं । वह यह प्राणवेत्ता इस प्रकार उपर्युक्त रीतिसे देखता हुआ अर्थात् फलतः अनुभव करता हुआ¹, इस प्रकार मनन करता हुआ अर्थात् युक्तियोंद्वारा चिन्तन करता हुआ और इस प्रकार जानता हुआ यानी उपपत्तियोंसे संयुक्त करके 'यह ऐसा ही है' इस प्रकार निश्चय करता हुआ, क्योंकि मनन और विज्ञानके द्वारा निष्पन्न हुआ शास्त्रका अर्थ निश्चित देखा जाता है; अतः इस प्रकार देखता हुआ वह अतिवादी होता है; तात्पर्य यह है कि उसका नामसे लेकर आशापर्यन्त सम्पूर्ण तत्त्वोंका अतिक्रमण करके बोलनेका स्वभाव होता है। |


१. यानी स्वरूपतः साक्षात्कार करता हुआ।